अध्यापकों को टीचिंग के नए गुर सिखा रहा है 'गुरुजी'

- शिवानंद के अथक प्रयासों का फल है 'गुरुजी'- 'गुरुजी' एक ऐसा गेमीफाइड प्लेटफर्म है जो शिक्षण में अध्यापकों की मदद कर रहा है। -विदेशों तक पहुंचना गुरुजी को पहुंचाना है शिवानंद का लक्ष्य।

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पिछले दो दशकों में दुनियाभर में शिक्षा को लेकर काफी चर्चा हुई इसे बेहतर बनाने की दिशा में भी कई प्रयास किए गए। भारत में भी शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर बहुत ज्यादा जोर दिया जा रहा है। शिक्षा को और बेहतर बनाने की दिशा में भी कई महत्वपूर्ण कदम सरकार उठा रही है साथ ही कई स्वयंसेवी संगठन भी इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं। ऐसा ही एक प्रयास समाजसेवी शिवानंद सालगेन भी कर रहे हैं।

शिवानंद ने महसूस किया कि आज की शिक्षा व्यवस्था की लच्चर होती हालत के लिए हम केवल अध्यापकों को ही दोष नहीं दे सकते। अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए सरकार और शिक्षण संस्थानों दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा। तभी हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था बेहतर होगी। उसके बाद शिवानंद और उनके साथियों ने इस दिशा में रिसर्च करनी शुरु की। यह लोग कई स्कूलों में गए और अध्यापकों से बात की। टीचिंग मैथर्ड के बारे में विस्तार से चर्चा की। काफी जानकारियां लेने और इस दिशा में काफी सोच विचार के बाद उन्होंने 'गुरुजी' को लॉच किया। शिवानंद गुुरुजी के सहसंस्थापक हैं।

'गुरुजी' एक ऐसा गेमीफाइड प्लेटफर्म है जिसकी मदद से अध्यापकों को अपने विषय को और बेहतर व रोचक तरीके से पढ़ाने में मदद मिल रही है। यह टूल शिक्षकों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है। यह टूल एड्रॉयड और टेबलेट बेस्र्ड सल्यूशन है। जिसमें शिक्षकों को एक विषय चुनना होता है और उसके बाद पूरा लेसन प्लान सामने आ जाता है। इस लेसन प्लान में लिखित शिक्षण सामग्री के अलावा चित्र, ऑडियो व विडियो भी शामिल होते हैं। यह टीचर के ऊपर निर्भर करता है कि वह बच्चों को किस टूल के साथ ज्यादा अच्छी तरह एक्सप्लेन करना चाहते हैं। इससे टीचर्स का काम तो आसान हो ही रहा है साथ ही बच्चों को भी शिक्षा का एक अलग व रोचक अनुभव मिल रहा है।

गुरुजी का लक्ष्य उन स्कूलों तक पहुंचना है जहां बहुत ज्यादा गरीब बच्चे पढ़ रहे हैं। शिवानंद चाहते हैं कि गुरुजी उस जगह तक पहुंचे जहां तकनीक कभी नहीं पहुंची। जहां अंग्रेजी नहीं बोली जाती। शिवानंद मानते हैं कि यदि वे इस कार्य में यानी ऐसी जगहों तक अपनी सेवाएं दे पाने में सफल हो जाते हैं तो पूरे भारत में उन्हें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

अपने इस कार्यक्रम को और ज्यादा व्यापक बनाने के लिए शिवानंद ने सन 2012 में बांदी पुरी, कर्नाटक और मधुमलाई तमिलनाडु से अपने पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की। तमिलनाडु में इन्होंने 50 स्कूलों में काम किया। जहां इन्होंने विभिन्न बच्चों और टीचर्स के साथ मिलकर कई वर्कशॉप कीं। इसके अलावा इन्होंने अपने कंटेंट का एनजीओ, टीचर्स और सरकार की मदद से कन्नड और तमिल भाषा में अनुवाद कराया।

यह प्रोजेक्ट बहुत सफल रहा। इसकी सफलता के दो कारण थे। एक तो टीचर्स ने आसानी से नई तकनीक को अपनाया और दूसरा कारण यह रहा कि यह इतना सरल और उपयोगी था कि शिक्षकों को इसके इस्तेमाल करने की आदत पड़ गई। उसके बाद में गुरुजी ने महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पॉडिचेरी में भी अपने कार्यक्रम किए और हजार से ज्यादा शिक्षकों से यह संपर्क में रहे।

गुरुजी का जो कंटेंट है उसे छह पैमानों पर परख कर तैयार किया गया है। जिसमें ढांचागत सोच यानी स्टक्चर्ड थिंकिंग, रीजनिंग, समस्या का समाधान, कम्यूनिकेशन, कोलेबरेशन और रचनात्मकता शामिल है। शिवानंद बताते हैं कि एक किताब आपको बताती है कि आपको क्या पढऩा और समझना है। लेकिन कैसे? यह किताब नहीं बताती। जबकि छह पैरामीटर पर बनाया गया यह कंटेंट टीचर्स की मदद करता है कि वे कैसे छात्रों तक विषय को आसानी से समझाने में सफल हो सकते हैं।

इनके एक प्रोजेक्ट 'स्कूल इन द क्लाउडÓ को 2013 में टेड प्राइज अवार्ड से नवाजा गया। स्कूल इन द क्लाउड प्रोजेक्ट एक इनोवेटिव प्रोजेक्ट रहा है जो सेल्फ स्टडी का बहुत ही प्रभावशाली तरीका है।

शिवानंद मानते हैं कि शिक्षा स्वयं से होनी चाहिए। इसके लिए हमें ऐसी कोई तकनीक चाहिए जिसके माध्यम से छात्र खुद ही शिक्षा ग्रहण कर सकें। हालाकि अध्यापक भी उतने ही जरूरी हैं क्योंकि वे छात्रों को प्रोत्साहित करते हैं तथा शिक्षा को सुगम बनाने में छात्रों की मदद करते हैं।

अभी तक गुरुजी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि वे स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति को बढ़ा पाए। इनकी टीम अगले साल तक हजार और स्कूलों में पहुंचना चाहती है। साथ ही यह लोग इंटरनेशनल मार्किंट मुख्यत: अफ्रीका में दस्तक देना चाहते हैं।

अब तक गुरुजी अपने सभी कामों को करने के लिए अनुदान और लोकल एनजीओ से मिल रही आर्थिक मदद से अपने कार्यक्रम चला रहे हैं। जिससे यह लोग काम तो कर पा रहे हैं लेकिन इन्हें कोई मुनाफा नहीं हो रहा है। लेकिन भविष्य के लिए योजनाएं बनाने और उन्हें कार्यरूप देने के लिए इन्हें पैसे की जरूरत है इसलिए अब गुरुजी का विचार है कि वे कुछ ऐसे कार्य भी करेंगे जिससे इन्हें आर्थिक मुनाफा हो ताकि वे गुरुजी को और विस्तार दे सकें।