अजंता-एलोरा के पास बसेगा जापानी शैली का गांव

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महाराष्ट्र सरकार का अजंता-एलोरा की गुफाओं के पास एक जापानी शैली का गांव निर्मित करने की योजना है। इसका निर्माण जापान के वाकायामा की प्रांतीय सरकार (डब्ल्यूपीजी) के साथ मिलकर संयुक्त रूप से किया जाएगा ताकि जापानी पर्यटकों को आकषिर्त किया जा सके।

महाराष्ट्र के पर्यटन मंत्री जयकुमार जीतेंद्र सिंह रावल ने कल यहां एक बैठक में कहा कि बौद्ध धर्म ने दोनों देशों भारत और जापान को बनाया है और सदियों से दोनों के बीच करीबी रिश्ता रहा है। उनका प्रस्ताव है कि अजंता-एलोरा के पास जापानी शैली के गांव की स्थापना की जाए ताकि जापान से पर्यटकों को आकषिर्त किया जा सके।

इस संबंध में महाराष्ट्र सरकार ने डब्ल्यूपीजी के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जाइका) अजंता-एलोरा विकास चरण तीन का वित्तपोषण कर रही है।

फोटो -विकीपिडिया
फोटो -विकीपिडिया

उल्लेखनीय है कि अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के चित्रों की चमक हज़ार से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी आधुनिक समय से विद्वानों के लिए आश्चर्य का विषय है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं को इन चित्रों में अभिव्यक्त किया गया है। चावल के मांड, गोंद और अन्य कुछ पत्तियों तथा वस्तुओं का सम्मिश्रमण कर आविष्कृत किए गए रंगों से ये चित्र बनाए गए। लगभग हज़ार साल तक भूमि में दबे रहे और 1819 में पुन: उत्खनन कर इन्हें प्रकाश में लाया गया। हज़ार वर्ष बीतने पर भी इनका रंग हल्का नहीं हुआ, ख़राब नहीं हुआ, चमक यथावत बनी रही। कहीं कुछ सुधारने या आधुनिक रंग लगाने का प्रयत्न हुआ तो वह असफल ही हुआ। रंगों और रेखाओं की यह तकनीक आज भी गौरवशाली अतीत का याद दिलाती है।

यूनेस्‍को द्वारा 1983 से विश्‍व विरासत स्‍थल घोषित किए जाने के बाद अजंता और एलोरा की कला के उत्‍कृष्‍ट नमूने माने गए हैं और इनका भारत में कला के विकास पर गहरा प्रभाव है। रंगों का रचनात्‍मक उपयोग और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के उपयोग से इन गुफाओं की तस्‍वीरों में अजंता के अंदर जो मानव और जंतु रूप चित्रित किए गए हैं, उन्‍हें कलात्‍मक रचनात्‍मकता का एक उच्‍च स्‍तर माना जा सकता है। ये शताब्दियों से बौद्ध, हिन्‍दू और जैन धर्म के प्रति समर्पित है। ये सहनशीलता की भावना को प्रदर्शित करते हैं, जो प्राचीन भारत की विशेषता रही है।

(पीटीआई के सहयोग के साथ)