कारगिल युद्ध की जिस यूनिट में शहीद हुए थे पिता उसी यूनिट में कमीशंड हुआ लेफ्टिनेंट बेटा

19 साल बाद हुआ सपना साकार...

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हितेश उसी बटालियन में तैनात होंगे जिसमें उनके बहादुर पिता ने देश की सेवा करते हुए अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी। पासिंग आउट परेड से निकलने के बाद ही हितेश ने अपने पिता बच्चन सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके पिता की याद में मुजफ्फरनगर के सिविल लाइंस इलाके में एक स्मृति स्थल बनवाया गया है।

हितेश कुमार अपनी मां के साथ (फोटो साभार- फेसबुक)
हितेश कुमार अपनी मां के साथ (फोटो साभार- फेसबुक)
 बच्चन सिंह की बटालियन में तैनात रहे रिशिपाल ने कहा, 'वे एक बहादुर सैनिक थे। जब तोलोलिंग में हमारी बटालियन पर हमा हुआ तो उनके सिर में गोली लगी थी और युद्ध में ही वे शहीद हो गए।' 

हितेश कुमार की उम्र उस वक्त सिर्फ 6 साल थी जब राजपूताना राइफल्स की दूसरी बटालियन में तैनात उनके लांस नायक पिता लड़ते हुए शहीद हो गए थे। यह 12 जून 199 की रात थी। उस वक्त हितेश की उम्र में तो काफी छोटे थे, लेकिन उनके इरादे काफी बड़े। उन्होंने फैसला कर लिया था कि वे भी सेना में जाएंगे। पिता के शहीद हो जाने के 19 साल बाद हितेश को देहरादून में स्थित भारतीय सैन्य अकादमी की पासिंग आउट परेड में सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशंड मिल गया।

हितेश उसी बटालियन में तैनात होंगे जिसमें उनके बहादुर पिता ने देश की सेवा करते हुए अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी। पासिंग आउट परेड से निकलने के बाद ही हितेश ने अपने पिता बच्चन सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके पिता की याद में मुजफ्फरनगर के सिविल लाइंस इलाके में एक स्मृति स्थल बनवाया गया है। हितेश ने इस मौके पर कहा, 'पिछले 19 सालों से मैं सेना में शामिल होने के सपने देखा करता था। मेरी मां का भी सपना था कि मैं सेना में जाऊं और देश की सेवा करूं। अब ये सपना सच हो गया है।'

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट्स के मुताबिक हितेश का छोटा भाई हेमंत भी सेना में जाने की तैयारी कर रहा है। हितेश की मां कमेश बाला ने कहा कि पति के गुजर जाने के बाद जिंदगी काफी मुश्किल हो गई थी, लेकिन फिर भी मैंने फैसला कर लिया था कि अपने दोनों बेटों को सेना में भेजूंगी। कमेश ने अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटों के लिए समर्पित कर दी। बच्चन सिंह की बटालियन में तैनात रहे रिशिपाल ने कहा, 'वे एक बहादुर सैनिक थे। जब तोलोलिंग में हमारी बटालियन पर हमा हुआ तो उनके सिर में गोली लगी थी और युद्ध में ही वे शहीद हो गए। उस दिन हमने 17 जवान खो दिए थे। इसमें देहरादून के मेजर विवेक गुप्ता भी शामिल थे।'

रिशिपाल कहते हैं, 'मुझे गर्व है कि बच्चन के बेटे ने सेना में कमीशन हासिल किया। अगर आज बच्चन होते तो वे गर्व से फूले नहीं समाते।' कारगिल युद्ध में राजपूताना राइफल्स की दूसरी बटालियन ने सबसे पहले तोलोलिंग पर विजय हासिल की थी। कारगिल की यह पहली सफलता थी इसके बाद आगे की लड़ाइयों पर विजय मिली थी। तीन सप्ताह लंबे चले इस युद्ध में 100 से ज्यादा सैनिक शहीद हुए थे। दूसरी बटालियन में सबसे ज्यादा ऑफिसर्स शहीद हुए थे। सैनिकों की कुर्बानी को देश नमन करता है और युवा उनकी राह पर चलने की प्रेरणा लेते हैं। हितेश का सेना में जाना उसी प्रेरणा का हिस्सा है।

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