विकलांगों के जीवन सुधार में लगा 'एपीडी'

- एपीडी की स्थापना 1959 में एन एस हीमा ने की।- दो बेहतरीन हॉटीकल्चर ट्रेनिंग सेंटर चला रहा है एपीडी।- हॉटीकल्चर के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं एपीडी के विकलांग छात्र।

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अलग अलग लोगों के लिए सफलता की परिभाषा अलग-अलग हो सकती है। कुछ व्यक्ति या संगठन व्यक्तिगत सफलता को ही सफलता मानते हैं तो कुछ व्यक्ति व संगठन ऐसे भी होते हैं जो देश व देशवासियों की सेवा को ही अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना देते हैं। समाज कल्याण की दिशा में खूब काम करते हैं और उसी में अपनी सफलता को देखते हैं। ऐसे लोग व संगठन न केवल सफल होते हैं बल्कि दूसरों के लिए मिसाल भी कायम करते हैं। ऐसी ही मिसाल बनकर उभरा एपीडी अर्थात 'एसोशिएशन ऑफ पीपल विद डिसएबिलिटीजÓ।

'एसोशिएशन ऑफ पीपल विद डिसएबिलिटीजÓ की शुरुआत 1959 में एनएस हीमा ने की थी। उस समय उनकी उम्र मात्र 21 साल थी। यह संस्था शरीरिक व मानसिक रूप से अक्षम लोगों की मदद करती है और उनकी जिंदगी संवारने के लिए प्रयासरत है। संस्था ने कई ऐसे लोगों को जो शरीरिक रूप से सक्षम नहीं थे, अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए काबिल बनाया। जिस कारण वे खुद तो आत्मनिर्भर बने ही साथ ही अपने परिवार के लिए भी सहारा बने।

एन एस हीमा
एन एस हीमा

एपीडी बैंगलोर में है और यहां विभिन्न प्रकार की अक्षमताओं से ग्रस्ति बच्चे आते हैं। एपीडी इन बच्चों के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाती है जिसमें यह बच्चे ट्रेनिंग लेते हैं। यह कार्यक्रम विभिन्न विषयों पर आधारित होते हैं। और छात्र अपनी रुचि व क्षमता के अनुसार उन कार्यक्रमों को चुन लेते हैं ताकि वे कुछ कर पाएं।

सन 2009 में एपीडी ने अपनी गोल्डन जुबली मनाई। किसी भी संस्था या कंपनी के लिए 50 साल से ज्यादा समय तक टिके रहना और लगातार काम करना यह बताता है कि वह संस्था कितनी सफलतापूर्वक चल रही है। हीमा बताती हैं कि इन 50 सालों में उन्होंने बहुत कुछ सीखा और यह समय कैसे व कब बीत गया उन्हें पता ही नहीं चला। हीमा के लिए उनकी यह संस्था ही सब कुछ है।

एपीडी ने सन 1988 में जीवन भीमा नगर ट्रेनिंग सेंटर की शुरुआत की, जिसमें हॉटीकल्चर की ट्रेनिंग देने की शुरुआत हुई। इंज्लैंड जैसे देश में हॉटीकल्चर को शरीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए एक थेरेपी माना जाता है। इससे प्रभावित होकर हीमा ने भी अपने यहां हॉटीकल्चर की ट्रेनिंग देना शुरु किया। इसमें विभिन्न देशों से आए विशेषज्ञों ने उनकी मदद की। यहां पर बागवानी की ट्रेनिंग दी जाती है और जानकारियों का आदान-प्रदान किया जाता है। इसके बाद हीमा ने बैंगलोर में ही हॉटीकल्चर के लिए जहां वे ट्रेनिंग ले सकें जमीन देखनी शुरु की और बहुत ही जल्दी उन्हें जमीन भी मिल गई। उस दौरान उन्होंने कई सरकारी संगठनों एवं विभागों से भी बात की और इन्हें जमीन की जरूरत के विषय में बताया। बाद में उन्हें एक एकड़ का प्लॉट मिल गया। इसके बाद उन्होंने वहां पर एक किचन, क्लास रूप, ग्रीन हाउजेज, एक छोटी लाइब्रेरी, टीचिंग और स्टाफ के लिए कमरे बनाए। उन्हें इस कार्य के लिए देश व विदेश से फंड भी मिले। छात्रों को यहां थियोरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें पौधे रोपने की तकनीक, वृक्षारोपण व अन्य जरूरी हुनर सिखाए जाते हैं। वह भी उनकी स्थानीय भाषा में।

फरवरी 1988 में इनके पहले बैच ने कोर्स पूरा किया। यह लोग यहां वार्षिक प्लॉट फेयर का भी आयोजन करते हैं। यह एक प्रकार की प्रदर्शनी एवं सेल मेला होता है। जहां यह लोग पौधों, खाद, बीज, वनस्पतियों एवं बागवानी से जुड़ी चीज़ें बेचते हैं। यह फेयर बहुत सफल रहा है। इस फेयर से प्राप्त हुए पैसों को इन्होंने ट्रेनिंग व अन्य संसाधन खरीदने में प्रयोग किया। सन 2013 में इन्होंने अपने सेंटर की सिल्वर जुबली मनाई।

सन 2001 में हीमा ने यह महसूस किया कि अब यह स्थान उनके कार्यक्रमों के संचालन के लिए छोटा पड़ रहा है। और ट्रेनिंग लेने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। अब हीमा इतनी जगह चाहती थीं जहां पचास ट्रेनीज़ को एक साथ ट्रेन किया जा सके। इसके लिए उन्होंने कर्नाटक सरकार को पत्र लिखा और सन 2001 में ही उन्हें कर्नाटक सरकार ने पांच एकड़ का एक बड़ा प्लॉट कैलासानाहल्ली में दे दिया। सन 2006 में यहां एक बहुत भव्य इंस्टीट्यूट बनकर तैयार हो गया। इसका डिज़ाइन एक अमेरिका के आर्कीटेक्ट ने किया। बिल्डिंग का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि यहां पढऩे वाले डिसेबल छात्रों को किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो। इसके अलावा यहां सोलर स्ट्रीट लाइट्स और वॉटर हॉरवेस्टिंग सिस्टम की व्यवस्था की गई है। एक समय ऐसा भी था जब यह पूरा स्थान कूड़े का ढेर था लेकिन इसे साफ कर इस लायक बनाया गया है कि अब यहां रिसर्च हो रही है। कई महत्वपूर्ण औषधियां यहां उगाई जा रही हैं। कई फलों व सब्जियों के पेड़ यहां लगे हैं। अभी तक एपीडी के दोनों हॉटीकल्चर टे्रनिंग सेंटर से हजार से ज्यादा छात्र ट्रेनिंग ले चुके हैं। इनमें कुछ छात्र ऐसे भी हैं जिन्होंने यहां से ट्रेनिंग ली और अब बहुत काम कर रहे हैं। ऐसे ही उदाहरण हैं उमर और जुंजे गौड़ा। इन लोगों ने यहीं ट्रेनिंग ली और अब यह लोग अपने कैरियर में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और बाकी छात्रों के लिए प्रेरणा बनकर उभरे हैं। एपीडी को आज अनुदान की कमी नहीं है। बहुत से लोग व संस्थाएं उनके बेहतर और नि:स्वार्थ काम से प्रभावित होकर उनकी मदद के लिए आगे आ रहे हैं ताकि वे और तरक्की करें।

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