जीएसटी का क्रियान्वयन जुलाई तक होने की संभावना

करदाताओं पर अधिकार क्षेत्र को लेकर जीएसटी परिषद में गतिरोध बने रहने के साथ वस्तु एवं सेवा कर एक जुलाई से लागू हो सकता है क्योंकि उद्योग को स्वयं को तैयार करने के लिये समय की जरूरत होगी।

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पीडब्ल्यूसी इंडिया के कार्यकारी निदेशक सुमित लुंकेर ने कहा कि एक अप्रैल से जीएसटी लागू करने की समयसीमा चुनौतीपूर्ण लग रही है क्योंकि सीजीएसटी और आईजीएसटी कानून फरवरी की शुरूआत में बजट सत्र में पारित हो सकता है। उसके बाद राज्यों को अपने-अपने विधानसभाओं में एसजीएसटी पारित कराना होगा। वित्त मंत्री अरूण जेटली की अध्यक्षता वाली परिषद ने अब अपनी छह बैठकों में 10 मुद्दों पर आम सहमति से फैसला किया है, जबकि तीन और मुद्दे, दोहरा नियंत्रण, कर के दायरे में आने वाले जिंसों की सूची तथा सीएसटी एवं आईजीएसटी मॉडल कानून अभी लंबित है।

सुमित लुंकेर ने कहा, ‘कानून के पारित होने के बाद उद्योग को जीएसटी के लिये तैयार होने को लेकर खासकर आईटी बुनियादी ढांचा के मोर्चे पर कम-से-कम 3-4 महीने समय की जरूरत होगी, इसके क्रियान्वयन के लिये एक जुलाई का समय व्यावहारिक जान पड़ता है।’ नानगिया एंड कंपनी निदेशक (अप्रत्यक्ष कराधान) रजत मोहन ने कहा कि जीएसटी के क्रियान्वयन के लिये एक जुलाई बेहतर है क्योंकि उद्योग को नई कराधान व्यवस्था की ओर जाने में समय चाहिए। बीएमआर एंड एसोसिएट्स एलएलपी के भागीदारी महेश जयसिंह ने कहा कि एक अप्रैल की समयसीमा का पालन करने के लिये काफी काम किये जाने की जरूरत है। ‘वास्तविक समयसीमा एक जुलाई लगती है। आज की तारीख में सेवा क्षेत्र में कानून की व्याख्या को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है और उसे सरकार से स्पष्टता का इंतजार है।’ 

वित्त मंत्री जेटली ने पिछले सप्ताह कहा था कि जीएसटी क्रियान्वित करने से पहले अभी कुछ मुद्दे बचे हुए हैं और नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था एक अप्रैल से 16 सितंबर 2017 के बीच लागू होने की संभावना है।

उधर दूसरी तरफ इस साल बेहतर मानसून और सातवें वेतन आयोग के लागू होने से एफएमसीजी कंपनियों को अच्छे परिणामों की उम्मीद थी लेकिन सरकार के साल के अंत में अचानक से लिए गए नोटबंदी के फैसले से आंशिक तौर पर इन कंपनियों को नुकसान पहुंचा है।

दो साल सूखे की वजह से मंदी रहने के बाद इस साल कंपनियों को ग्रामीणों की आय और सरकारी कर्मियों के वेतन बढ़ने से मांग बढ़ोतरी होने की उम्मीद थी।

नोटबंदी से प्रभावित रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तु (एफएमसीजी) क्षेत्र की कंपनियों ने आठ नवंबर के बाद के समय को बाजार में ‘अस्थायी सुस्ती’ करार दिया है और उनका मानना है कि ‘मजबूत मांग और उपभोग के चलते अगली तिमाही में मांग में बढ़ोतरी होनी चाहिए।’ अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों की तरह यह क्षेत्र भी 2017 में वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के लागू होने के बाद की व्यवस्था के लिए तैयार हो रहा है, जिसके बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ‘कंपनियों को उच्च कर और अन्य बढ़ती लागत से राहत मिलेगी।’ 

अगला साल बेहतरी के साथ शुरू होने की उम्मीद रखते हुए मेरिको के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सौगत गुप्ता ने कहा, ‘‘हमें (वित्तवर्ष 2016-17 की) तीसरी तिमाही के मुकाबले चौथी तिमाही में अच्छी वृद्धि की उम्मीद है। हमने सुधार के कुछ संकेत पहले ही देखें हैं विशेषकर एकल आधुनिक व्यापार, शहरी, खुदरा और रसायन क्षेत्र में लेकिन इसको पूरी तरह से स्थिर होने में समय लगेगा।’ 

इसी प्रकार गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के प्रबंध निदेशक विवेक गंभीर ने कहा, ‘कुल मिलाकर एफएमसीजी क्षेत्र के लिए 2016 सुस्ती भरा साल रहा। कुछ सुधार हमने देखा लेकिन मानसून के बाद इसमें मजबूत सुधार की उम्मीद थी लेकिन नोटबंदी के प्रभाव से यह भावनाएं पटरी से उतर गईं।’ आईटीसी के मुख्य परिचालन अधिकारी संजीव पुरी ने ग्राहकों, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं, ब्रांड के मालिकों और विनिर्माताओं की परेशानियों के बारे में बातचीत की। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में वृद्धि दर ठप है। ऐसी भी कई श्रेणियां जिनकी बिक्री अच्छी होती है वह भी मंदी के दौर से गुजर रही है। लघु अवधि में हमारे पास चुनौतियां हैं, लेकिन भारत में स्वयं वृद्धि करने की कई दीर्घावधि संभावनाएं हैं इसलिए हम आशान्वित हैं।

हालांकि पतंजलि आयुर्वेद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आचार्य बालकृष्ण ने दावा किया, ‘जब लोगों के सामने ऐसी स्थिति होती है तो वे केवल जरूरत की किफायती वस्तुएं ही खरीदते हैं। नोटबंदी से हमारी बिक्री पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है बल्कि इसमें हल्की वृद्धि ही दर्ज की गई है।’