नेताओं के दबाव में अधिकारी क्यों करते हैं काम, बताया लेडी सिंहम आईपीएस रूपा ने

अपनी बेबाक कार्यशैली, नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों को पस्त कर देने वाली आईपीएस अधिकारी दिवाकर रूपा...

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हाल ही में दक्षिण भारत में अपनी बेबाक कार्यशैली, नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों को पस्त कर देने वाली आईपीएस अधिकारी दिवाकर रूपा ने अपनी सर्विस के कुछ अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि इस सिस्टम में काम करना कितना मुश्किल होता है।

DIG रूपा
DIG रूपा
डीआईजी रूपा का कहना है कि जब आप ईमानदारी से काम करते हैं तो ट्रांसफर तो होते ही रहेंगे। उन्होंने बताया कि पुरुषों के वर्चस्व वाले इस पेशे में महिलाओं को कई तरह की दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। 

भारत में सिविल सेवक गरीबों को उनका हक दिलाने और लोगों की सेवा करने के लिए नौकरी करने जाते हैं, लेकिन देश का 'सिस्टम' और राजनेताओं की वजह से उन्हें झुकना पड़ जाता है। हालांकि देश में समय-समय पर ऐसे ऑफिसर्स हुए हैं जिन्होंने सिर्फ अपने दिल की सुनी और हर चुनौती का डटकर सामना किया। इतिहास भी ऐसे बहादुर और ईमानदार अफसरों को याद रखता है। हाल ही में दक्षिण भारत में अपनी बेबाक कार्यशैली नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों को पस्त कर देने वाली आईपीएस अधिकारी दिवाकर रूपा ने अपनी सर्विस के कुछ अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि इस सिस्टम में काम करना कितना मुश्किल होता है।

डी. रूपा ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने विचार फेमस टेड एक्स टॉक वूमन में साझा किए। बहादुर और ईमानदार अफसर ने ऊपर के डर और दबाव के बारे में भी बातें की। उन्होंने बताया कि वे कौन सी चीजें होती हैं जिससे एक पुलिस अफसर को अपने 'राजनीतिक बॉस' के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले सोचना पड़ता है। लोग सिंहम जैसे आदर्शवाद के साथ आईपीएस जॉइन करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे सिस्टम के साथ वे ढल जाते हैं और अफने राजनीतिक आकाओं की जी हुजूरी करने लग जाते हैं।

उन्होंने आगे कहा, 'मैं पहली बार कर्नाटक धारवाड़ में तैनात थी। यह मेरी पहली पोस्टिंग थी और मुश्किल से एक महीने ही हुए थे। वहां की स्थानीय कोर्ट ने मध्य प्रदेश की तत्कालीन सीएम उमा भारती के खिलाफ गैर जमानती वॉरंट जारी किया।' हाई प्रोफाइल केस होने के बावजूद रूपा ने उसे काफी आसानी से हैंडल किया। वह बताती हैं कि यह उनकी लाइफ का सबसे आसान केस था। उसी गैर जमानती वॉरंट की वजह से उमा भारती को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

रूपा बताती हैं कि भारत में वीआईपी कल्चर की जडें काफी गहराई में फैली हुई हैं। इनमें से ज्यादातर नेता ही होते हैं जिन्हें खास सेवाओं की आदत हो जाती है। उनकी सुरक्षा में तैनात होने वाले पुलिसकर्मी गनमैन जैसा व्यवहार करते हैं। जितने ज्यादा गनमैन होते हैं नेता को उतना ही शक्तिशाली समझा जाता है। अपने एक और अनुभव के बारे में बताते हुए रूपा ने कहा कि जब वे बेंगलुरु में डेप्युटी कमिश्नर के पद पर तैनात थीं तो उन्हें नेताओं की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों का प्रबंधन करने की जिम्मेदारी मिली। उन्हें यह देखकर काफी हैरानी हुई कि कोई भी विधायक या एमएलसी पुलिसकर्मी के बिना नहीं चल सकता था। अधिकतर नेताओं के पास जरूरत से ज्यादा सुरक्षाकर्मी थे।

उन्होंने पाया कि 82 नेताओं की सुरक्षा में 216 पुलिस कर्मी तैनात हैं। जबकि पुलिस थानों में पुलिसकर्मियों का आभाव रहता था। उन्होंने धीरे-धीरे नेताओं की सुरक्षा कम करनी शुरू कर दी। इतना ही नहीं उन्होंने सीएम ऑफिस में लगीं एकदम नई 8 नई एसयूवी को भी वहां से हटा लिया। क्योंकि वहां पर उनकी जरूरत ही नहीं थी। जब यह काम आसानी से हो गया तो उन्हें समझ में आया कि उनके पहले के अधिकारी ऐसा क्यों नहीं कर रहे थे। रूपा ने बताया कि नेताओं से इस तरह के 'पंगे' लेना अपने लिए मुश्किल बुलाने जैसा होता है। इसलिए कोई भी अधिकारी ऐसा करने की जुर्रत नहीं करता।

डीआईजी रूपा
डीआईजी रूपा

रूपा ने एक और हालिया घटना के बारे में बताया। वे बेंगलुरु में डीआईजी (जेल) के पद पर तैनात थीं तो उन्हें जेल में बंद तमिलनाडु की कद्दावर नेता शशिकला को स्पेशल ट्रीटमेंट दिए जाने की बात पता चली। शशिकला आय से अधिक संपत्ति मामले में बेंगलुरु की परप्पन अगरहारा जेल में जेल में बंद हैं। डीआईजी रूपा ने इस मामले की जांच करके सारी रिपोर्ट डीजी को भेज दी। उन्होंने रिपोर्ट में दावा किया था कि स्पेशल ट्रीटमेंट के बदले शशिकला ने संबंधित जेल अधिकारी को 2 करोड़ रूपये की रिश्वत दी थी। लेकिन इस बार रूपा के काम की सराहना होने के बजाय उन्हें मानहानि की नोटिस पकड़ा दी गई और उनका तबादला रोड एंड सेफ्टी डिपार्टमेंट में कर दिया गया।

लेकिन रूपा का कहना है कि जब आप ईमानदारी से काम करते हैं तो ट्रांसफर तो होते ही रहेंगे। उन्होंने बताया कि पुरुषों के वर्चस्व वाले इस पेशे में महिलाओं को कई तरह की दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। महिला अफसरों की राय को नजरअंदाज कर दिया जाता है और उन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता। उन्होंने महान विचारक कार्ल मार्क्स की बात से अपनी बात को खत्म करते हुए कहा कि नौकरशाही एक लोहे का पिंजरा है। उन्होंने कहा कि जिस दिन हमारे अधिकारी नेताओं के भय से मुक्त होकर काम करने लग जाएंगे उस दिन से हम नएं इंडिया को बनता देख सकेंगे।

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