एक आईपीएस अफसर ने बंजर पहाड़ी को कर दिया हरा-भरा

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मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के पुलिस अधीक्षक महेशचंद्र जैन ने मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल पूरे झाबुआ इलाके का ही नजारा बदल दिया है। यहां की हाथीपावा बंजर पहाड़ी तो हरे-भरे जंगल में तब्दील हो गई है। लोगों को इस पर हैरत ही नहीं, सुखद गर्व भी होता है।

आज भी हर सुबह एसपी जैन स्वयं पौधों को पानी देने पहुंच जाते हैं। दो चौकीदार भी रखे हैं, जिनका वेतन खुद वहअपने जेब से देते हैं। केवल हाथीपावा पहाड़ी ही नहीं, जहाँ-जहाँ बीते साल पौधरोपण हुआ है, वहाँ की तस्वीर बदल गई है। 

अद्भुत पर्यावरण प्रेमी एक डायनामिक आईपीएस अधिकारी महेशचंद्र जैन ने करीब डेढ़ साल में ही मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल पूरे झाबुआ इलाके का ही नजारा बदल दिया। दो साल पहले तक यहां की हाथीपावा पहाड़ी पर कोई नहीं आता-जाता था। इसी बंजर पहाड़ी पर आज प्रवासी पक्षी कलरव करते रहते हैं। दूर-दूर तक हरियाली है। पौधे पेड़ बनने लगे हैं। स्थानीय आदिवासियों की मदद से हजारों गड्ढों की खुदाई के बाद कल्पना से परे फलदार वृक्षों का एक ऐसा हरा-भरा जंगल उगा दिया गया है, झाबुआ वासियों को इससे हैरत और सपनों जैसा अहसास होता है। आईपीएस जैन ने इस बंजर पहाड़ी ही नहीं, झाबुआ जिले के कई कस्बों और गाँवों में भी सैकड़ों फलदार पौधे लगा दिए हैं। उन्होंने श्रमदान से तालाबों की गन्दगी हटाने की भी बेमिसाल पहल की है।

महेशचंद जैन ने दिसम्बर 2016 में झाबुआ पुलिस अधीक्षक का कार्यभार ग्रहण किया था। एक दिन जब उनकी नजर यहां की बंजर पहाड़ी पर पड़ी, मन में कल्पना जाग उठी कि काश, यहां मीलों तक हरा भरा जंगल होता और उसमें जंगली जानवर, रंग-विरंगे पंछी होते। इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वह स्वयं अपनी कल्पना को आकार देंगे। काम आसान नहीं था पर जांबाज ही नहीं, जुनूनी भी, इस पुलिस अफसर ने हजारों पौधे रोपने के बाद उनका नवजात बच्चों की तरह लालन-पालन कर डेढ़ साल में ही असंभव को संभव कर दिखाया।

ये वही महेशचंद्र जैन हैं, जिन्होंने मार्च 2016 में यहां के पुलिस अधीक्षक का जिस दिन कार्यभार संभाला था, उनके कुर्सी पर बैठते ही ट्रैफिक प्रभारी सुदर्शन खरे स्वागत के लिए बुके और ड्रायफ्रूट लेकर जैसे ही उनके कक्ष में घुसे थे, उनको अच्छा नहीं लगा। डांटते हुए उनको बाहर निकाल दिया था। उन्होंने पुलिस की छवि बदलने के लिए जिले के हर थाने में बोर्ड लगवा दिए हैं, जिन पर लिखा है - 'अगर कोई रिश्वत मांगता है तो सीधे उनके मोबाइल नंबर पर फोन करें।' चार्ज लेने के बाद सबसे पहले उन्होंने दो दिन में कार्यालय के हर कक्ष की सफाई के निर्देश दिए थे। तभी उन्होंने कहा था कि जब भी यहां से जाएंगे, पूरे इलाके का चेहरा बदलकर जाएंगे। उनका मकसद पुलिसिंग को जन आंदोलन बनाना है और जनता को सिपाही। वह कलेक्टर, डीएफओ, जिला पंचायत सीईओ से चर्चा कर शहर के आसपास किसी एक पहाड़ी पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जाएगा।

‘स्मृति को अमर बनाइए-वृक्ष लगाइए’ और ‘जन्मदिन को यादगार बनाइए-वृक्ष लगाइए स्लोगन’ के साथ बंजर पहाड़ी पर जनता के माध्यम से जंगल उगाएंगे। आज हाथीपावा पहाड़ी पर बारह हजार पौधे हैं, पंछियों का बड़ा बसेरा है, प्रवासी पक्षियों का कलरव है, किसी नामी हिल स्टेशन की तरह का अहसास है, सूर्यास्त और सूर्योदय का खूबसूरत नजारा है, योग और ध्यान का बेहतरीन स्थान है, फलदार वृक्षों की सरसराहट है, बच्चों के लिये झूले और फिसलपट्टियाँ हैं, वॉकिंग ट्रैक है, हिल टॉप से समंदर की तरह दूर तक दिखने वाला दृश्य है, किसी लैंडस्केप की तरह आदिवासियों के खेत और झोपड़ों का दिलकश नजारा है।

झाबुआ का चार्ज लेने के बाद पुलिस अधीक्षक जैन ने देखा कि हर साल हजारों आदिवासी अपने गाँवों से एक दिन के लिये यहाँ आते हैं और पहाड़ी का शृंगार (श्रमदान) कर लौट जाते हैं। उस दिन उनके पास फावड़े-कुदाली भी होते हैं। अब वही आदिवासी वहां उस दिन 'हलमा' करते हुए पहाड़ी पर खंतियाँ बनाते हैं ताकि बारिश का पानी इनमें रुक सके। बीते पाँच सालों में उन्होंने पचास हजार से ज्यादा ऐसी जल संरचनाएँ बना दी हैं। दूर गाँवों में रहने वाले आदिवासी तो अपना काम बड़ी मेहनत और जज्बे से पूरा करते हैं लेकिन झाबुआ शहर में रहने वाले अधिकांश लोग इसमें कोई मदद नहीं करते हैं। एक दिन अचानक उन्होंने तय किया कि आने वाली बरसात में हाथीपावा की पहाड़ी पर क्यों न पौधरोपण का बड़ा आयोजन किया जाये और शहर के लोगों को भी इससे जोड़ा जाये।

पौधरोपण करना तो आसान था लेकिन उनकी जिद यह भी थी कि जब तक लगाए गए पौधों में से 80 से 90 फीसदी बड़े पेड़ नहीं बन जाते तो इसका कोई अर्थ नहीं है।

उन्होंने आसपास के पर्यावरणविदों से भी बात की और जुट गए इस असम्भव से दिखते काम को पूरा करने में। उन्होंने जिला प्रशासन, वन विभाग और शहर के लोगों को जोड़कर इसे मूर्त रूप देने के लिये कमर कस ली। अपराधों पर नियंत्रण के साथ अब हर दिन वे दो से तीन घंटे का वक्त इसके लिये भी निकालने लगे। 26 मार्च 2017 को उन्होंने पहली बार श्रमदान के लिये लोगों को इकट्ठा किया और कारवां चल पड़ा। तीन महीनों तक गड्ढे बनाने तथा बारिश के पानी को पौधों के आसपास रोकने का जतन होता रहा। इसमें डेढ़ सौ पुलिसकर्मी भी लग गए। बारिश होते ही कई चरणों में यहाँ साढ़े आठ हजार पौधे रोप दिए गए।

इसके बाद यहां सालों से वीरान बंजर पहाड़ी पर रोजाना सैकड़ों लोग श्रमदान करने लगे। इसके अलावा एसपी ने जोबट के पास बरखेड़ा में करीब एक हजार, होमगार्ड लाइन झाबुआ में आम, अमरुद, चीकू, सुरजना, नीबू, तथा कटहल के 40 पौधे, खवासा में स्थानीय लोगों के साथ मिलकर 100 से ज्यादा पौधे, राणापुर में विद्यार्थियों के साथ बड़, पीपल, आम, नीम, खिरनी, अमरुद तथा जामुन के सवा सौ पौधे लगवा दिए। पुलिस अधीक्षक कार्यालय, रक्षित केन्द्र और विभिन्न थाना परिसरों में भी मोरसली, आम, बड़, पीपल जामुन और अमरुद के पाँच से सात फीट कद की ऊँचाई वाले एक हजार से ज्यादा पौधे लगा दिए गए। उन्होंने पहाड़ी पर पौधों की सिंचाई के लिये सीमेंट की टंकियाँ बनवा दीं।

टैंकरों से उन्हें भर दिया गया। आसपास के ट्यूबवेल से भी मदद ली जाने लगी। श्रमदान में सैकड़ों लोग बाल्टियों में पानी लेकर पौधों को पानी देते रहे। इससे गर्मियों के दिनों में भी पौधे जीवित रहे और बारिश होने के बाद तो यहाँ की तस्वीर ही बदल गई। आज भी हर सुबह एसपी जैन स्वयं पौधों को पानी देने पहुंच जाते हैं। दो चौकीदार भी रखे हैं, जिनका वेतन खुद वहअपने जेब से देते हैं। केवल हाथीपावा पहाड़ी ही नहीं, जहाँ-जहाँ बीते साल पौधरोपण हुआ है, वहाँ की तस्वीर बदल गई है। पुलिस विभाग के भवनों के परिसर में पेड़ लहलहा रहे हैं। फूलों से डालियाँ लद गई हैं तो कहीं घास के मैदान नजर आते हैं। पुलिस लाइन के बगीचे में सुबह शाम चहल-पहल बढ़ गई है।

इस साल सितंबर में प्रदेश के मंत्री दीपक जोशी एसपी को इस असंभव काम की शाबाशी देने झाबुआ पहुंच गए। अब तो वह गाँव-गाँव में चौपाल लगाकर पेड़ों को सहेजने के साथ पानी और पर्यावरण की बात भी लोगों से करते हैं। झाबुआ शहर के बीचोंबीच छोटे तालाब के आसपास बीते कुछ सालों से गन्दगी का ढेर लगने लगा था। किनारों की बस्तियों में रहने वाले लोग अपने घरों का कचरा तथा अन्य गन्दगी तालाब के किनारे डाल दिया करते थे। इससे तालाब का पानी भी गन्दला जाता और आसपास बदबू उठती रहती लेकिन कभी किसी ने इसकी सफाई पर गौर नहीं किया। तालाब में काफी गाद भी जम चुकी थी और कुछ वक्त ध्यान नहीं दिया जाता तो तालाब ही खत्म हो जाता।

पुलिस अधीक्षक की नजर एक दिन इस पर पड़ी तो उन्होंने शहर के कुछ लोगों को इकट्ठा किया और हर शनिवार सुबह दो घंटे के श्रमदान का आह्वान किया। करीब सौ लोगों के साथ उन्होंने भी तालाब की गीली मिट्टी और कीचड़ से भरी तगारियाँ बिना किसी हिचक के उठाकर बाहर की। इस दौरान उनके कपड़ों पर कीचड़ भी लग गया लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। तालाब की सफाई के बाद वे लोगों के साथ ही तालाब के आसपास रहने वाले लोगों के घरों पर पहुँचे और उन्हें हाथ जोड़कर समझाया कि तालाब में गन्दगी न करें। उनकी बात का बड़ा असर हुआ। अब एसपी ने अब तो जिले में लोगों के जन्मदिन, पुण्यतिथि, मैरिज एनिवर्सरी पर भी पौधे रोपने की मुहिम शुरू करा दी है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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