कागज़ों में बंटती जिजीविषा

१९९५ और २०१४ के बीच भारत में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या ने तीन लाख का आंकड़ा पार कर लिया।

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आर्थिक मंदी की वजह से लंदन में एक इंजीनियर आत्महत्या करता है तो दुनिया भर की मीडिया सवाल खड़े करती है। आर्थिक नीतियों में बदलाव लाए जाते हैं। सरकारी मुवाज़ों और भत्ते जारी किए जाते हैं। १९९५ और २०१४ के बीच भारत में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या ने तीन लाख का आंकड़ा पार कर लिया। ५ जनवरी, २०१५ को भूमि अधिग्रहण कानून में अध्यादेश द्वारा बदलाव लाए गए, जिसने किसानों की ज़मीन छीनने की प्रक्रिया को केवल आसान ही नहीं किया, बल्कि कॉर्पोरेट सेक्टर को भी किसानों की ज़मीन हड़पने की छूट दे दी।

गौरतलब यह है, कि २०१४ में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में भारी कमी आई। राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार पिछले उन्नीस सालों में २०१४ में सबसे कम किसानों ने ख़ुदकुशी की। सिर्फ ५,६५० किसानों ने अपनी जान हमारे देश की आर्थिक नीतियों की बलिवेदी पर गँवाई। सरकार का समर्थन करने वालों ने इस बात को उछाला कि आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या वर्ष २०१३ के आंकड़ों के आधे से भी कम है।

हालाँकि यह भी देखा गया कि इसी साल आत्महत्या के 'अन्य' वर्ग की संख्या में भरी बढ़ोतरी आई। मेरे अपने राज्य कर्णाटक में जहाँ एक तरफ केवल ३२१ किसानों ने आत्महत्या की, जो कि पिछले साल की १,४०३ से काफी कम है, वहीं दूसरी तरफ ५,१२० 'अन्य' ने ख़ुदकुशी की। केवल 'अन्य' की बात करें तो भारत के जिन पांच राज्यों में सबसे अधिक किसान आत्महत्या करते हैं, वहां 'अन्य' की आत्महत्या में १२८ फीसदी बढ़ोतरी आई है। ये 'अन्य' आखिर कौन हैं? इस सवाल पर थोड़ी देर बाद लौटते हैं।

२०१४ में आत्महत्या के आंकड़ों में 'खेतिहर मज़दूरों' का भी नया वर्ग बनाया गया है, जिसे भरने का प्रशिक्षण गांव-देहात में तैनात पुलिसकर्मियों को नहीं दिया गया है। अगर आत्महत्या करने वाले खेतिहर मज़दूरों की संख्या को जोड़ा जाए, तो वर्ष २०१४ में आत्महत्या करने वाले किसानों और खेतिहर मज़दूरों की सामूहिक संख्या में वर्ष २०१३ की तुलना में पांच प्रतिशत वृद्धि हुई है।

वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के अनुसार राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो यह स्वीकार करती है कि इन आंकड़ों को अनियमित तरीके से ही दर्ज़ किया जाता है, और इन आंकड़ों का परिक्षण भी नहीं किया जाता। कुछ राज्य जहाँ से पहले किसानों की आत्महत्या की रिपोर्ट आती थी, वहां अब आंकड़े शून्य बताए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में २००५ से २०१० के बीच औसतन हर साल डेढ़ हज़ार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की थी। इस आंकड़े को वर्ष २०१२ में अचानक शून्य घोषित कर दिया गया, जो अभी तक हर साल शून्य ही है। इसी फेहरिश्त में कुछ नए कृषि प्रधान राज्य भी शामिल हुए हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल, राजस्थान और बिहार शामिल हैं। इन राज्यों में कृषि विकास को दर्शाती किसी और आंकड़े में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आए हैं जो किसानों की आत्महत्या न होने की पुष्टि कर सके। मगर किसानों ने आत्महत्या करना बंद कर दिया है। है न कमाल की बात?

जब साईनाथ ने राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अधिकारीयों से इस विषय पर प्रश्न किया तो उन्होंने कहा कि इस पर वे भी विचार कर रहे हैं। राज्यों को इन आंकड़ों की पुष्टि करने को कहा गया है। वैसे भी राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो का आधिकारिक कार्य आत्महत्या सम्बंधित सटीक जानकारी उपलब्ध कराना नहीं है। यह केवल राज्यों से उपलब्ध जानकारी लेकर उनका सम्मिश्रण करती है। इनके रिपोर्ट में जारी की गई जानकारी यथार्थ से मेल खाती है या नहीं, इसमें इनकी कोई नैतिक दिलचस्पी नहीं है। दुःख की बात यह है कि इस एक संस्था की विफलता राज्यों को अपने किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों के साथ जालसाज़ी करने की प्रेरणा दे रही है।

किसानों की आत्महत्या एक सियासी मुद्दा है। जहाँ राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो पुलिस को उत्तरदायी ठहरकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं पुलिसकर्मी अपनी अनभिज्ञता के पीछे छिपते नज़र आते हैं। जब साईनाथ और इनके मित्र पत्रकारों ने महाराष्ट्र के विदर्भ और कर्णाटक के मंड्या इलाके के पुलिसकर्मियों से जिरह की तो उन्होंने स्वीकार किया कि किसान, खेतिहर मज़दूरों और 'अन्य' की आत्महत्या की जानकारी को अलग अलग दर्ज़ करने का इन्हें कोई सर्कुलर नहीं मिला है। इन्हें तेलंगाना के एक पुलिसकर्मी ने बताया कि किसान और खेतिहर मज़दूरों के बीच का अंतर बताना पुलिस का नहीं बल्कि तहसीलदार का काम होता है। जब उनसे कोई जानकारी नहीं आती तब वे आत्महत्या को 'अन्य' में दर्ज़ कर देते हैं। ज़ाहिर है कि किसानों की सबसे अधिक आत्महत्या दर्ज़ करने वाले पांच बड़े राज्यों में पिछले साल 'अन्य' की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है।

किसानों की आत्महत्या करने की सबसे बड़ी वजह क़र्ज़ चुकाने में विफलता है। पारिवारिक कारणों और खेती सम्बंधित समस्याओं का भी बड़ा योगदान है। चंडीगढ़ केंद्रित सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के अनुसार पंजाब में किसानों का औसतन कर्ज़ा पिछले दस वर्षों में बाईस गुना बढ़ा है। छत्तीसगढ़ में किसानों का औसतन कर्ज़ा साढ़े सात लाख रुपये है, वहीं केरल में साढ़े छह लाख। और ये सभी कर्ज़े बढ़ रहे हैं। किसान अपने कर्ज़े के नीचे दबते चले जा रहे हैं। यह बेहद डरावने आंकड़े हैं।

इंडिया टूगेदर वेबसाइट में २०१५ के आर्थिक बजट पर वरिष्ठ पत्रकार देवेंदर शर्मा ने लिखा था कि कई सालों से सरकारें लगातार अपने किसानों के हित को नज़रअंदाज़ करती आ रही है। जबतक हमारा ध्यान कृषि उत्पाद में वृद्धि से हटकर किसानों की समृद्धि की ओर नहीं जाएगा, हमारे किसानों के हालात बिगड़ते चले जाएंगे।

हाल ही में जारी किए गए हमारे सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार गांवों में रहने वाले ६७ करोड़ भारतीय आज भी ३३ रूपये से कम में गुज़ारा करते हैं। राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के आंकड़ों से बचने के बजाय सरकार को यथार्थ की तरफ ताकना चाहिए और इन तथ्यों का उचित इस्तेमाल कर आगे की योजना करनी चाहिए।

अगर उन्नीस साल में तीन लाख इंजीनियर मरे होते तो? अगर तीन लाख सिपाहियों की जान गई होती तो शायद हम इस समस्या का समाधान निकाल चुके होते। समस्या से आँखें नहीं चुरा रहे होते। फिर हम अपने ही अन्नदाताओं में यह झूठी कागज़ी जिजीविषा क्यों बाँट रहे हैं?