अनोखे तरीके से इस एनजीओ ने भीख मांगने वाले बच्चों के हाथ में पकड़ाई कलम-किताब

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दरअसल हम एक नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं और बाल श्रम करने वाले इन बच्चों को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे ही छोटुओं को काम के दलदल से निकालकर उनका जीवन उज्जवल कर रहे हैं पंजाब के हर्ष कोठारी।

जब हर हाथ कलम की शुरुआत हुई तो हर्ष और उनकी टीम ने बच्चों से सीधे ये नहीं कहा कि वे भीख मांगना छोड़ दें। क्योंकि उन्हें भी पता था कि इसका कोई परिणाम निकलने वाला नहीं है। 

ढाबों और रेस्टोरेंट्स में न जाने कितने छोटुओं की जिंदगी तबाह हो रही होती है। क्या आपने कभी सोचा है कि इन छोटुओं को बनाने में हमारा भी कुछ हाथ होता है। दरअसल हम एक नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं और बाल श्रम करने वाले इन बच्चों को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे ही छोटुओं को काम के दलदल से निकालकर उनका जीवन उज्जवल कर रहे हैं पंजाब के हर्ष कोठारी। उन्होंने हर हाथ कलम नाम से एक एनजीओ की स्थापना की है जो बाल मजदूरी और भीख मांगने वाले बच्चों को सही रास्ते पर पहुंचाने का काम करता है।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए हर्ष ने बताया कि किसी भी बच्चे के लिए शिक्षा की कितनी अहमियत होती है। हर्ष का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां समाज सेवा कोई रुचि नहीं बल्कि सम्माननीय काम था। उनते पिता भी एक समाजसेवी हैं। हर्ष बताते हैं, 'मुझे लोगों से मिलना जुलना काफी पसंद है। मैं हमेशा से समाजसेवा करना चाहता था। मुझे अपने पैरेंट्स को देखकर प्रेरणा मिलती थी।' अपने स्कूल के वक्त भी हर्ष सामाजिक बदलाव लाने वाले अभियानों का हिस्सा हुआ करते थे।

वे बताते हैं कि उनके पिता ने गुजरात भूकंप के दौरान घर-घर जाकर मदद इकट्ठा की थी और उसे गुजरात जाकर जरूरतमंदों में वितरित भी किया था। इस घटना काम हर्ष के मन के भीतर गहरा असर पड़ा था। हर्ष ने 2014 में पटियाला में हर हाथ कलम नाम से एक एनजीओ बनाया जिसमें उनके दोस्तों ने भी उनकी काफी मदद की। इस एनजीओ का मकसद बच्चों को भिक्षा और बाल मजदूरी के कार्यों से मुक्त कराना था।

वे कहते हैं, 'भीख मांगने वाले बच्चे हर रोज तकरीबन 1,000 रुपये कमा लेते हैं। इतनी ज्यादा रकम कमाने वाले बच्चे को भीख मांगने के काम से निकालकर वापस पढ़ाई की ओर ले जाना काफी मुश्किल कार्य था।' हर्ष का कहना है कि लोग इन बच्चों को कुछ पैसे देकर समझते हैं कि उन्होंने कुछ अच्छा कर दिया, लेकिन हकीकत में वे भिक्षावृत्ति को बढ़ावा देकर एक बच्चे की जिंदगी बर्बाद कर रहे होते हैं।

जब हर हाथ कलम की शुरुआत हुई तो हर्ष और उनकी टीम ने बच्चों से सीधे ये नहीं कहा कि वे भीख मांगना छोड़ दें। क्योंकि उन्हें भी पता था कि इसका कोई परिणाम निकलने वाला नहीं है। सबने मिलकर इन बच्चों के भीख मांगने के पैटर्न पर काम किया और उनके साथ काम करना शुरू किया। इन बच्चों के लिए खेलकूद और कई अन्य तरीक के क्रियाकलाप डिजाइन किये ताकि वे पढ़ाई और बचपन की अहमियत समझ सकें।

इसमें थोड़ा वक्त लगा लेकिन धीरे-धीरे बच्चों का मन लगने लगा। इसके बाद तो बच्चे अपने आप 'हर हाथ कलम' के कैंप में आने लगे। इन बच्चों को डांस, म्यूजिक जैसी चीजों से रूबरू कराया गया और बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता चला गया। हर एक बच्चे की पृष्ठभूमि दूसरे से अलग थी इसलिए सबकी केस स्टडी बनाई गई। जब ये काम हो गया तो काउंसलर की मदद से बच्चों को समझाने की कोशिश की गई। जब बच्चों को चीजें समझ में आ गईं तो उनका एडमिशन स्कूल में कराया गया। आज कई सारे बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं। हर्ष अगर अपनी सही सोच के साथ आगे नहीं आए होते तो इन बच्चों का भविष्य लाल बत्ती पर भीख मांगते खत्म हो जाता।

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