जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

नजीर अकबराबादी ने लगभग दो लाख रचनाएं लिखीं, लेकिन उनमें लगभग छह हज़ार ही उपलब्ध हैं।

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अठारहवीं सदी के लाजवाब शायर नजीर अकबराबादी को 'नज़्म का पिता' कहा जाता है। वह जीवन भर समाज में भाईचारा की अलख जगाते रहे। उन्होंने जितना लाजवाब ईद पर लिखा, उतना ही होली-दिवाली पर भी। अपनी 'आदमीनामा' कविता में मनुष्यता के हर रंग का बेजोड़ इजहार करते हैं।

फोटो साभार: .thequint.com
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नज़ीर आम लोगों की जुबान की शायरी करते थे। उन्होंने आम जीवन, ऋतुओं, त्योहारों, फलों, सब्जियों आदि विषयों पर भी खूब लिखा। उनके शब्द धर्म-निरपेक्षता की रोशनी फैलाते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने लगभग दो लाख रचनाएं लिखीं लेकिन उनमें लगभग छह हज़ार ही उपलब्ध हैं।

अठारहवीं सदी के लाजवाब शायर नज़ीर अकबराबादी उर्दू में नज़्म लिखने वाले पहले कवि माने जाते हैं। उन्होंने जितना लाजवाब ईद पर लिखा, उतना ही होली-दिवाली पर भी। उनका असली नाम वली मुहम्मद था। उन्होंने आम आदमी की शायरी की। आगरा की जमीं पर यूं तो मीर और गालिब की शायरी भी गूंजी हैं, लेकिन नजीर की नज्मों ने जुबां पर जो पकड़ बनाई, उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। उन्हें 'नज़्म का पिता' भी कहा जाता है।

समाज की हर छोटी-बड़ी ख़ूबी को नज़ीर साहब ने कविता में तब्दील कर दिया। 'बंजारानामा' उनकी सबसे मशहूर ग़ज़ल है। वह आम लोगों की जुबान की शायरी करते थे। उन्होंने आम जीवन, ऋतुओं, त्योहारों, फलों, सब्जियों आदि विषयों पर भी खूब लिखा। उनके शब्द धर्म-निरपेक्षता की रोशनी फैलाते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने लगभग दो लाख रचनाएं लिखीं लेकिन उनमें लगभग छह हज़ार ही उपलब्ध हैं। इनमें भी करीब 600 सिर्फ ग़ज़लें हैं। ईद पर उनकी पंक्तियां-

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी।
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी।
पिछले पहर से उठ के नहाने की धूम है,
शीर-ओ-शकर सिवईयाँ पकाने की धूम है,
पीर-ओ-जवान को नेम‘तें खाने की धूम है,
लड़कों को ईद-गाह के जाने की धूम है।
कोई तो मस्त फिरता है जाम-ए-शराब से,
कोई पुकारता है कि छूटे अज़ाब से,
कल्ला किसी का फूला है लड्डू की चाब से,
चटकारें जी में भरते हैं नान-ओ-कबाब से।
क्या है मुआन्क़े की मची है उलट पलट,
मिलते हैं दौड़ दौड़ के बाहम झपट झपट,
फिरते हैं दिल-बरों के भी गलियों में गट के गट,
आशिक मज़े उड़ाते हैं हर दम लिपट लिपट।
काजल हिना ग़ज़ब मसी-ओ-पान की धड़ी,
पिशवाज़ें सुर्ख़ सौसनी लाही की फुलझड़ी,
कुर्ती कभी दिखा कभी अंगिया कसी कड़ी,
कह “ईद ईद” लूटें हैं दिल को घड़ी घड़ी।
रोज़े की ख़ुश्कियों से जो हैं ज़र्द ज़र्द गाल,
ख़ुश हो गये वो देखते ही ईद का हिलाल,
पोशाकें तन में ज़र्द, सुनहरी सफेद लाल,
दिल क्या कि हँस रहा है पड़ा तन का बाल बाल।
जो जो कि उन के हुस्न की रखते हैं दिल से चाह,
जाते हैं उन के साथ ता बा-ईद-गाह,
तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह,
मयाने, खिलोने, सैर, मज़े, ऐश, वाह-वाह।
रोज़ों की सख़्तियों में न होते अगर अमीर,
तो ऐसी ईद की न ख़ुशी होती दिल-पज़ीर,
सब शाद हैं गदा से लगा शाह ता वज़ीर,
देखा जो हम ने ख़ूब तो सच है मियां ‘नज़ीर‘।

नजीर अकबराबादी अपनी 'आदमीनामा' कविता में मनुष्यता के हर रंग का खुला इजहार करते हैं। वह बताते हैं कि आदमी की प्रवृतियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। कुछ लोग बहुत अच्छे होते हैं, कुछ लोग बहुत बुरे। कुछ मस्ज़िद बनाते हैं, कुरान शरीफ़ का अर्थ बताते हैं तो कुछ वहीं जूतियाँ चुराते हैं। कोई अति साधन-संपन्न है तो कोई अत्यंत गरीब। मनुष्य अपने व्यवहार से अच्छा-बुरा बनता है। कुछ लोग निहायती शरीफ़ होते हैं तो कुछ लोग हद दर्जें के कमीने। उनके शब्दों से हमें यह सीख भी मिलती है कि हमें किस तरह का इंसान बनना है। कुछ लोगों की प्रवृत्ति दूसरों की मदद, भाईचारे की भावना फैलाना, सर्वस्व अर्पित करना होता है तो कुछ लोगों की प्रवृत्ति हिंसात्मक, मुसीबतें बढ़ाने वाली, गलत राह की ओर ले जाने वाली होती है -

दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस-ओ-गदा है सो है वह भी आदमी
ज़रदार बेनवा है सो है वह भी आदमी।
नेमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है वह भी आदमी।
मस्ज़िद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ।
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्‍वाँ।
पढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ यां।
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ।
जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी।

जमाने से आदमी रुपए-पैसे के पीछे भागता चला आ रहा है। नजीर साहब ने पैसे की फ़िलासफ़ी पर भी बड़े शिद्दत से उजाला डालते हुए हमे बताया है कि वह दुनिया को कैसे-कैसे रंग दिखाता है। वह लिखते हैं कि पैसा जो होवे पास तो कुन्दन के हैं डले, पैसे बगैर मिट्टी के उस से डले भले। पैसे से चुन्नी लाख की इक लाल दे के ले, पैसा न हो तो कौड़ी को मोती कोई न ले। पैसा जो हो तो देव की गर्दन को बाँध लाए, पैसा न हो तो मकड़ी के जाले से खौफ खाए -

पैसे ही का अमीर के दिल में खयाल है,
पैसे ही का फ़कीर भी करता सवाल है,
पैसा ही फौज पैसा ही जाहो जलाल है,
पैसे ही का तमाम ये तंगो दवाल है,
पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है,
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है।

आगरा (उत्तर प्रदेश) में नज़ीर अकबराबादी का मक़बरा ताज-महल के क़रीब ताज गंज में है, जो कि साल भर सुनसान रहता है लेकिन उनकी पैदाइश के मौक़े पर यह अक़ीदत पेश करने वालों की क़तार लग जाती है। उस दिन यहां 1930 से बसंत मेला मुनाक़िद किया जाता है, जिसमें शारा-ए-किराम नज़ीर की नज़्में सुनाते हैं। इस मौके पर पूरा माहौल फूलों से महमहा उठता है।

आगरा डेवलपमेंट अथॉरिटी ने मक़बरे की हिफ़ाज़त के लिए एक साएबान नसब कर दिया है। दरअसल, नज़ीर साहब ने अपनी शायरी से आगरा को एक नई शिनाख़्त अता की है। वह मुसलमानों के साथ हिंदुओं में भी मक़बूल थे। उन्होंने ईद और त्यौहारों के अलावा कबूतरबाज़ी और पतंग बाज़ी पर भी क्या खूब नज़्में लिखी हैं-

आशिक कहो, असीर कहो, आगरे का है,
मुल्ला कहो, दबीर कहो, आगरे का है,
मुफ़लिस कहो, फ़क़ीर कहो, आगरे का है,
शायर कहो, नज़ीर कहो, आगरे का है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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