रेलवे की पहली महिला अफसर, पद्मश्री विजेता, कैंसर को हराने वाली: डॉ. आनंदा शंकर जयंत

कहते हैं कि जिंदगी का हर मोड़ एक नई सीख देकर जाता है. अपने ऊपर भरोसा रखने वाला ही जिंदगी के तमाम मुश्किलों को सफलतापूर्वक दूर कर देता है और अपनी इच्छाशक्ति से जीवन में सबसे सफल इंसान बनता है.

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वह एक ऐसी जिंदादिल ज्योति है जो किसी तूफानी रात में एक पल के लिए भी नहीं फड़फड़ाती और न ही फीकी पड़ती है. जिंदगी में हार मानने वालों की भीड़ और पराजित हो चुके लोगों के बीच वह अकेली सैनिक है जिसके पास अभी भी चमकता कवच है. सपनों और उम्मीदों के क्रिया क्रम पर वह खिलखिलाकर हंसती है. इनमें से कुछ सपने और उम्मीद उनके भी थे. जीवन में सबसे अच्छा और बुरा होने के बाद भी कुछ ही महिलाओं में ऐसा साहस होता है जिसको आनंदा शंकर जयंत ने हासिल किया है. नृत्य से उनके दिल को आनंद मिलता है, शंकर और दुर्गा का मिथक उनके अस्तित्व का मतलब है और उनके जीवन साथी जयंत उनकी जिंदगी में शक्ति प्रदान करते हैं. वे हासिल करने और चमकते रहने की यात्रा में सफल रही हैं. उनकी दुनिया एक बार उनसे छीनने की कोशिश की गई लेकिन वे कभी हार नहीं मानी और जिंदगी की डोर पकड़ी रहीं, वक्त के साथ जिंदगी के काले बादल भी छंट गए और वह सूरज की तरह दोबारा चमकने लगीं. उनकी जिंदगी के तीन दशक नृत्य को समर्पित रहे और वहीं से आनंद प्राप्त हुआ और नृत्य के बदले उन्हें बेताशा खुशी मिली. इसके बाद उनकी और पाने की प्यास बढ़ गई. उन्होंने चार साल की उम्र में नृत्य सीखना शुरू किया. वे अपनी मां के घुटनों पर थी और उनकी मां ने आनंदा को नृत्य सीखने के लिए राजी किया. आज भी उनकी यादों में वह पल जिंदा है. उनके अस्तित्व की पूरी योजना पर उसका असर पड़ा. मशहूर नृत्यांगना आनंदा शंकर जयंत के मुताबिक, ‘मेरी मां और कला के उस रूप ने मुझे युवास्था में जकड़ लिया. उस मंदिर में, उस पल, मैं कम ही जानती थी कि नृत्य मेरा अनंतकाल को छूने का जरिया था.’ आनंदा ने चेन्नई के सबसे प्रमुख और मांग में रहने वाले इंस्टिट्यूट कलाक्षेत्र से नृत्य की ट्रेनिंग पाई है. उन्होंने छह साल का कोर्स पूरा किया है जिसे लोग एक, तीन या फिर चार साल में छोड़कर चले जाते हैं.

कलाक्षेत्र में ट्रेनिंग के दौरान और उसके बाद वे न सिर्फ भरतनाट्यम से परिचित हुईं बल्कि वीणा, कोरियोग्राफी, नट्टुवंगम और दर्शन शास्त्र से रूबरू हुईं. उन्होंने पासुमार्थी रामालिंगा शास्त्री से कुचिपुड़ी नृत्य सीखने का सम्मान हासिल किया. वे कहती हैं, ‘मैं 18 साल की थी और उभरती हुई नर्तकी थी और भरतनाट्यम पढ़ने के लिए मुझे भारत सरकार की तरफ से स्कॉलरशिप मिला. वहां तक मेरी योजना में कोई परिवर्तन नहीं था.’ कलाक्षेत्र कार्यक्रम पूरा करने के बाद उन्होंने छह लड़कियों को डांस सिखाने का काम शुरू किया. उन्हें पक्का विश्वास था कि औपचारिक शिक्षा उनके करियर को और मजबूत करेगा. वे कहती हैं, ‘लोग कहते हैं कि जुनून का पीछा करो ना कि पेंशन का लेकिन मेरा मानना है कि आप अपनी पेंशन पक्की करिए और फिर अपने जुनून का आनंद लीजिए.’ इसलिए आऩंदा ने कॉमर्स में डिग्री हासिल की और आर्ट्स, इतिहास और संस्कृति में मास्टर्स की पढ़ाई की. इस दौरान वे यूपीएससी के बारे में जाना. उन्होंने देखा कि उनके साथी किस तरह से प्रतियोगिता परीक्षा के लिए भागदौड़ कर रहे हैं. आनंदा ने न सिर्फ अपने विश्वविद्यालय में टॉप किया बल्कि उन्होंने यूपीएसी की परीक्षा भी पास की. उन्हें पहली महिला अधिकारी के तौर पर दक्षिण मध्य रेलवे के ट्रैफिक सर्विस में नौकरी मिली. वे कहती हैं, ‘हर कोई खुशी से आनंदित था लेकिन मेरी मां बहुत भयभीत थी. वे इस तरह से बताती हैं, ‘‘तुम अपने साथ ऐसा क्यों कर रही हो? तुम्हारा नृत्य खराब हो जाएगा. मैंने अपनी जिंदगी में बहुत से बलिदान इसलिए नहीं दिए हैं कि तुम्हें नृत्य को छोड़ता देखूं.’’’ उन्होंने अपनी मां को विश्वास दिलाया कि नृत्य उनकी जिंदगी में कभी पीछे नहीं रहेगा. और इस तरह से उनकी जिंदगी में जद्दोजहद शुरू हुआ. दिन में वह पुरुषों से भरे दफ्तर में महिला अधिकारी होती जहां लोग सर कहकर या फिर ‘बेबी’ कहकर पुकारते. लोग यह समझ नहीं पाते कि पुरुषों के लिए जो काम है वह एक महिला क्यों कर रही है. उनका काम ऐसा था जो अमूमन पुरुषों द्वारा ही अंजाम दिया जाता था जैसे ट्रेनों का मुआयना, दुर्घटना साइटों का आकलन, कंट्रोल रूम में ड्यूटी जहां पर उन्हें दुर्घटना के बारे में जानकारी मिलती है. कंट्रोल रूम में फोन करने वाले को लगता था कि उन्होंने गलती से किसी के घर पर फोन लगा दिया है और काम वाली जगह पर लोग यह सोचते कि वह किसी अफसर की बेटी है. वे कहती हैं, ‘मैं इस दृष्टिकोण के साथ नहीं चलती थी कि मैं पुरुषों की दुनिया में औरत हूं. मैंने अपने जेंडर को घर पर ही छोड़ दिया.’ नौकरी के बावजूद वह एक चमकदार नर्तकी का काम करती रही. राग के साथ मिलकर उनकी आत्मा जिंदा होती, ‘और उसके बाद समझौता शुरू हुआ, समझौता काम के साथ, समझौता परिवार और दोस्तों के साथ और खुद के साथ. जीवन में आगे बढ़ते हुए दोनों प्रयासों के साथ न्याय करना सीख लिया. इसके बाद सभी चीजें अपनी अपनी जगह आ गई.


मैं दिन में तीन घंटे अभ्यास करती और छुट्टी वाले दिन रियाज करती.’ मल्टीटास्किंग करते हुए बहुआयामी उस्ताद ने दुनिया को सोच जगाने वाला कला का काम दिया. जो अपने समय से कहीं आगे था. ‘श्री कृष्णम वंदे जगतगुरूम, बुद्धम् शरणम् गच्छामि और त्यागाराजा रामायण. ताल पात्र एक ऐसा लोक संगीत है जिसकी आध्यात्मिकता की गहरी भावना से संपर्क है और श्रृंगार दर्पण और श्री राम नमन-अंथ रुचिरा मशहूर पौराणिक कथाएं हैं.’ लिंगभेद को लेकर उन्होंने खुद से सवाल किया.

अवॉर्ड और अखबारों में रिपोर्ट एक नियमित साथी बन गए. उनकी कला की कहानी कई हलकों में सुनी जाने लगी. नृत्य के क्षेत्र में उनके बहुमुखी योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया.

उनकी जिंदगी उस वक्त शिखर पर थी और जब उन्हें सबसे बुरी खबर मिली. वे बताती हैं, ‘अमेरिकी दौरे से ठीक पहले, स्तन पर मामूली गांठ महसूस हुआ, इसके बाद मैं मैमोग्राम के लिए गई. पिछले काफी समय से मेरा वजन बढ़ रहा था.’ अपने पति को रिपोर्ट पढ़ने को देकर वे दो हफ्ते की यात्रा के लिए निकल गईं. जब वह वापस लौंटी तो उनके पति हैदराबाद के बजाय मुंबई एयरपोर्ट पर उनका इंतजार कर रहे थे. उन्होंने अपने पति से पूछा कि शादी के 17 साल बाद दोबारा प्यार कहां से उमड़ रहा है? लेकिन उनके दिल में कहीं न कहीं धड़कन भी बढ़ चुकी थी. उन्हें इस बात का एहसास हो चला था कि जरूर कुछ बात है.’ रिपोर्ट में कहा गया था कि उनके मैमोग्राम को और ध्यान देने की जरूरत है. जिसका सरल मतलब होता है कि वह कैंसर हो सकता और घातक साबित हो सकता है.’ अपने पति को उन्होंने गले लगाकर पूछा कि क्या यही हो सकता है, उनके पति ने कहा, ‘यह नहीं हो सकता है, अगर वह नहीं चाहती हैं तो.’



मैंने अपने आपसे तीन चीजें कहीं और तेज आवाज के साथ. इसलिए कि मैं इससे वापस लौट नहीं सकती.

‘पहली: कैंसर मेरी जिंदगी का सिर्फ एक पन्ना है. मैं इसे पूरी किताब बनने नहीं दूंगी.’

‘दूसरी: मैं इसे अपनी जिंदगी से बाहर कर दूंगी, ना कि इसे अपनी जिंदगी में दाखिल होने दूंगी.’

‘तीसरी: मैं कभी यह सवाल नहीं करूंगी, ‘मैं ही क्यूं?’’

इसके बाद जमीनी कार्रवाई शुरू हुई. कैंसर से लड़ने के लिए वह हर तरह से तैयार थीं. लेकिन वह डॉक्टर के उस सुझाव को मानने को कतई तैयार नहीं थी जिसमें उन्हें नृत्य न करने की सलाह दी गई थी. उन्हें कहा गया था कि इलाज के दौरान नृत्य न करें क्योंकि कीमो और रेडियोलॉजी न सिर्फ खराब सेल को खत्म करते हैं बल्कि अच्छे सेल भी खराब हो जाते हैं. इस वजह से सीढ़ी चढ़ने पर भी सांसें उखड़ने लगती हैं. तीन घंटे के लिए नृत्य और रियाज अज्ञेय लग रहा था. लेकिन आनंदा अटल थी. वे उस दौर को याद करते हुए कहती हैं, ‘अगर आप कला से ब्रेक ले लेते हैं तो आप खत्म हो जाते हैं और मैं यही तो नहीं करना चाहती थी. मैं कला को छोड़ना नहीं चाहती थी.’ मैं अपने ऑन्कोलॉजिस्ट से समझौता करने लगी, ‘मेरा कार्यक्रम है, क्या हम कीमो अगले दिन कर सकते हैं? डॉक्टर को लगा कि मैं अपना विवेक खो चुकी हूं क्योंकि मैं नृत्य को इलाज से पहले तवज्जो दे रही थी.’


7 जुलाई 2009 को उनका ऑपरेशन हुआ. आनंदा कहती हैं, ‘मैं ऑपरेशन में इस तरह से गई जैसे मैं किसी नृत्य कार्यक्रम के लिए जाती थी. मैं पार्लर गई, मैंने मैनीक्योर, पेडीक्योर कराया और अपने बाल बनवाए. वह दूसरा थिएटर था जहां मैं अपना नृत्य करने जा रही थी. मैं खुद की परीक्षा लेने जा रही थी. ऑपरेशन पूरा हो जाने के बाद मैंने बिंदी लगाई, लिपस्टिक लगाया और डॉक्टर से पूछा कि मैंने कैसा किया. क्या मैंने सही से किया?’’’ ऑपरेशन के दो दिन बाद ही वे जिंदगी के आम कामों में व्यस्त हो गई. कार्यक्रमों का आयोजन, अकादमी में बच्चों को ट्रेनिंग और दुनिया भर में शो के लिए तैयारी करने में जुट गईं. नृत्य ने उन्हें न सिर्फ परेशान होने से बचाया बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि कैंसर उनके जीवन को घेर कर न रखे. आनंदा अपने बुरे दिनों को भूल चुकी हैं लेकिन कुछ अच्छे पल आज भी उन्हें याद हैं. वे कहती हैं, ‘मैं बुरे दिन देखे हैं. मैं तीन दिन तक आराम करती लेकिन चौथे दिन मेरे पति मुझे घर से बाहर ड्राइव पर ले जाते और मुझे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कहते.’ उनके पति के पास कीमो के लिए बहुत ही सुंदर उपनाम था. वे इस तरह से कहती हैं, ‘मेरे पति कहते, कीमो को अमृत की तरह देखो. क्या तुम्हें नहीं लगता कि अमृत का साइड इफेक्ट होता है. वह मीठा हो जाएगा?’ उन्होंने एक और उपनाम खोज निकाला. जिसे वह लंबे अर्से से जानते थी. लेकिन आत्मा के इस परीक्षण में नया मतलब जाना. वे कहती हैं, ‘मैं कीमो के लिए गई तो मेरे दिमाग में एक तस्वीर थी-दुर्गा. इतनी आक्रामक, इतनी भुजाएं. हम हमेशा उनकी प्रशंसा में नृत्य करते हैं. मैंने दुर्गा को एक भगवान के रूप में नहीं देखा बल्कि ऐसे प्रतीक के तौर पर देखा जो हर कोई हो सकता है. मैंने अपने 18 हाथ अपने शुभचिंतकों द्वारा पकड़े देखे. मेरे डॉक्टर, रेडियोलॉजिस्ट, कीमोथेरापिस्ट, ऑनकोलॉजिस्ट, मेरा परिवार, मेरे पति, मेरा कुत्ता, मेरा नृत्य... और शेर? अरे यह तो आप है, आपकी शक्ति, नहीं? आपके भीतर का लचीलापन, मूल शक्ति ही आपका शेर है.’’

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने मिजाज को बरकरार रख पाई. ‘मैं हंसती! मैंने अपने हास्यास्पद स्थिति का मजाक बनाया. आप जितना ज्यादा शर्मिंदा महसूस करेंगे लोग उतना ही आपको शर्मिंदा करेंगे. इसका उपाय यह है कि आप इस बारे में बात करें. एक बार मैं बाहर विग के साथ गई. एक अफसर मिल गया और पूछा तिरुपति? मैंने जवाब दिया ‘नहीं, कीमोथेरेपी.’

सामान्य रहते उन्होंने अपनी समस्या के बारे में बात करने को एक मुद्दा बना लिया. कैंसर पर दिया गया उनका TED लेक्चर अब तक का सबसे बेहतरीन TED टॉक किसी भी भारतीय द्वारा दिया गया बताया जाता है. जल्द ही लोगों को यह एहसास हो गया कि वे कोई पीड़ित या सर्वाइवर नहीं बल्कि विजेता हैं, आज वह कैंसर मुक्त हैं. रेलवे में वह आज भी सर वालों के समंदर में साहसी महोदया हैं और वह नृत्य भी करती हैं, उनके नृत्य के लय उनके प्रफुल्लित कहानी हमेशा सुनाते हैं.

लेखिका-बिंजल शाह

अनुवाद-आमिर अंसारी