2016 में हिन्दी हिन्दुस्तानी से हिंग्लिश की ओर बढ़ते हुये आगे बढ़ी

वर्ष 2016 में ओएलएक्स के ‘नो मोर देखते हैं’ और बिग बाजार की ‘बिग बचत’ वाली हिन्दी अपने विज्ञापन के मकसद में पूरी दिखी, वहीं ‘ऑसम रिलेशनशिप का लेबल हटा, दुनिया को तू है एवेलेबल बता’ जैसे अंग्रेजी-हिन्दी मिश्रण वाले फिल्मी गानों को भी खूब बजाया-सुनाया और सराहा गया।

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21वीं सदी के 16वें साल में हिन्दी अपने मिजाज के मुताबिक व्याकरण की जकड़बंदी से निकलकर उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी से होते हुये अंग्रेजीनुमा हिंग्लिश की ओर बढ़ती रही। बोलचाल अथवा संप्रेषण के स्वनियम पर आधारित हिन्दी में साल 2016 में जहां एक ओर अन्य भाषाओं और ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न इलाकों से आने वाले शब्दों को जगह मिली, वहीं दूसरी ओर फेसबुक-ट्विटर और कंप्यूटर के बढ़ते इस्तेमाल से ‘हैश-टैग’ और ‘एट दि रेट ऑफ’ जैसे निशान भी हिन्दी में शामिल होते गये।

पिछले साल हिन्दी अलग-अलग कारणों से समाचारों की सुर्खियों में रही। इसके औचित्य-अनौचित्य पर विवाद-संवाद भी हुये, लेकिन दिन-प्रतिदिन हिन्दी के बढ़ते विराट जनक्षेत्र और व्यापक बाजार ने विदेशी कंपनियों को भी रोमन हिन्दी वाले विज्ञापन बनाने के लिए मजबूर कर दिया। 

ओएलएक्स के ‘नो मोर देखते हैं’ और बिग बाजार की ‘बिग बचत’ वाली हिन्दी अपने विज्ञापन के मकसद में पूरी दिखी, वहीं ‘ऑसम रिलेशनशिप का लेबल हटा, दुनिया को तू है एवेलेबल बता’ जैसे अंग्रेजी-हिन्दी मिश्रण वाले फिल्मी गानों को भी खूब बजाया-सुनाया और सराहा गया। अखबारों, चैनलों, रेडियो और विज्ञापन की अंग्रेजीनुमा हिन्दी के अलावा सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहल से भी इस साल हिन्दी के शब्दकोश में डिजिटल, कैशलेस, आन.लाइन, एटीएम-पेटीएम जैसे नये शब्द शामिल हुये, वहीं संप्रेषण के नियम पर आधारित मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र ने भी अंग्रेजीनुमा हिन्दी वाली हिंग्लिश को विस्तार दिया। 

समाजशास्त्री और ‘पापुलर कल्चर’ के हिमायती सुधीश पचौरी के अनुसार हिन्दी महज भाषा नहीं, बल्कि हिन्दी एक विराट व्यवहार है। यह दूसरी भाषा के शब्दों को अपने में कुछ ऐसे समाहित कर लेती है, कि अलग से उनका फर्क करना मुश्किल हो जाता है। व्याकरण की रूढ़ियां को तोड़ना और संप्रेषण का स्वनियमन ही दरअसल हिन्दी भाषा की व्यापकता और बढ़ते बाजार का प्रमुख कारण है। हिन्दी बाजार की भाषा है और संप्रेषण वाली हिन्दी के बगैर यहां कारोबार करना संभव नहीं है।

बीते साल के अक्तूबर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को स्कूलों में प्राथमिकी से लेकर उच्च स्तर तक अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी को शिक्षा का माध्यम बनाने और विदेशी भाषा को किसी भारतीय भाषा के विकल्प के तौर पर नहीं रखे जाने का सुझाव दिया। इसके अलावा न्यास ने त्रिभाषा नीति की समीक्षा करने और नयी भाषा नीति बनाने की भी मांग की। सितंबर में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने ‘स्टूडेंट लीगल लिटरेसी मिशन-2016’ के वाषिर्क समारोह में अदालतों को अपना फैसला हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में सुनाने की सलाह दी।

लंदन में मेयर पद के कंजरवेटिव पार्टी के उम्मीदवार जैक गोल्डस्मिथ के समर्थकों ने अपने चुनाव प्रचार के लिए हिन्दी गानों का इस्तेमाल किया। ब्रिटेन में मई 2015 के आम चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के चुनाव प्रचार के लिए हिन्दी भाषा में चुनाव गीत ‘नीला है आसमान’ बनाया गया था।

हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाने की कवायद दशकों पहले की गई थी, लेकिन अपने व्यापक प्रयोग और संप्रेषण की ताकत के बल पर अब हिन्दी खुद-ब-खुद ही देश भर में बोली और समझी जाने वाली भाषा बन रही है।

सितंबर माह के दौरान मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के समापन समारोह में फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन को बुलाये जाने को लेकर सवाल उठाये गये थे, जिसके बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप को इस मामले में अपनी सफाई देनी पड़ी थी। हिन्दी, तमिल और संस्कृत के विद्धान पी जयरामन ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हिन्दी में अन्य भाषा-बोलियों के शब्दों को उसी तौर पर स्वीकार करने और हिन्दी अनुवाद नहीं करने की अपील की थी। उन्होंने हिन्दी में भारतीय भाषाओं के महत्व और बेहद कम भागीदारी पर चिंता व्यक्त की थी। जयरामन ने कहा था, कि हिन्दी को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है। शिक्षाविद् कृष्ण कुमार भी अनुवाद के स्थान पर बोलियों के शब्दों को हिन्दी में हू-ब-बू स्वीकारने की वकालत करते हैं। कुमार कहते हैं कि अब अनुवाद की अलमारी भर गयी है और बोलियों को हिन्दी में आने दो। विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग स्थापित करने अथवा राजभाषा अधिनियम के तहत कार्यरत हिन्दी अधिकारी ‘खिचड़ी’ के स्थान पर जो ‘चावल मिश्रित दाल’ वाली हिन्दी बनाते रहते हैं, उससे हिन्दी का भला नहीं बुरा ही हो रहा है।

सरकार ने भी हिन्दी को विश्वस्तर पर लोकप्रिय बनाने और उसे संयुक्तराष्ट्र की एक आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार कराने की दिशा में प्रयास जारी रहने की बात कही थी। लोकसभा में रमा देवी के पूरक प्रश्न के जवाब में विदेश राज्यमंत्री वी के सिंह ने कहा था, कि सरकार हिन्दी को संयुक्तराष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकृत दिलाने के लिए प्रयास कर रही है और संयुक्तराष्ट्र के कार्यक्रमों को यूएन रेडियो बेवसाइट पर हिन्दी में प्रसारित किया जाना एक उपलब्धि है।

सुषमा स्वराज ने इस प्रश्न के लिखित जवाब में हिन्दी प्रोत्साहन के लिए किये गये प्रयासों के बारे में बताया था। उन्होंने कहा कि 2007 को न्यूयार्क में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया था और इसका उद्घाटन सत्र संरा के मुख्यालय में हुआ था। संरा के तत्कालीन महासचिव ने भी इसमें हिस्सा लिया था। हालांकि सितंबर में योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए 177 देशों का समर्थन जुटा लिया गया था, लेकिन हिन्दी को संयुक्तराष्ट्र की आधिकारिक भाषा की मान्यता पाने के लिए 129 देशों का समर्थन नहीं मिला। मनोरंजन एवं मीडिया के अलावा राजनीति और उद्योग अनजाने ही हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए अपना योगदान देते रहते हैं। अगस्त में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सदन में दिए गए भाषण में अपने बांग्ला उच्चारण के साथ पश्चिम बंगाल को ‘बेंगोल’ (बंगाल) अथवा ‘बोंग’ (बंग) कहे जाने और इसके बाद इस नाम के परिवर्तन को लेकर बहस छिड़ गयी थी और विपक्षी वामदलों, कांग्रेस और भाजपा ने वॉकआउट कर दिया था। बांग्ला उच्चारण के साथ बोले जाने के बावजूद मीडिया ने इसे सही करके बंगाल अथवा बंग के रूप में ही रिपोर्ट किया था। इसी प्रकार दिसंबर में पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने एक प्रेस कांफ्रेंस में ‘खोदा पहाड़ और निकली चुइया’ कहा था। जबकि अगले दिन समाचारपत्रों ने ‘चुइया’ को ‘चुहिया’ ही छापा था।

वस्तुत: अनेक आंचलिक बोलियों और विभिन्न भाषाओं से मिलकर बनने वाली हमारी हिन्दी इस्तेमाल में हिन्दुस्तानी है और अब ज्ञान-विज्ञान के नये क्षेत्रों और अंग्रेजी के शब्दों के शामिल होने से हिंग्लिश की ओर बढ़ रही है। पत्रकारिता के प्रमुख उद्देश्य सूचना, शिक्षा और मनोरंजन हैं। भाषा की शुद्धता कभी मीडिया की अनिवार्यता नहीं रही और यहीं इस मुक्तगामी भाषा की मजबूती की वजह भी बनी है।

-उमेश सिंह

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