गांव की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए प्रोफेसर ने छोड़ दी अमेरिका की नौकरी

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अमेरिका में प्रोफेसर डॉ. प्रभाकर ने अपनी नौकरी इसलिए छोड़ दी क्योंकि वह अपने देश भारत के लिए कुछ करना चाहते थे। गांव में महिलाओं की दयनीय स्थिति ने डॉ. प्रभाकर को किया महिलाओं के उत्थान और उन्हें सशक्त बनाने के लिए प्रेरित। 

बाएं से दूसरे नंबर पर डॉक्टर प्रभाकर। फोटो साभार: sriprojects.org
बाएं से दूसरे नंबर पर डॉक्टर प्रभाकर। फोटो साभार: sriprojects.org
अपने गांव की महिलाओं को आर्थिक तौर पर मजबूत बनाने के लिए डॉक्टर प्रभाकर ने उठाया सराहनीय कदम। अब उनका सपना है, कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर पुरुष प्रधान संस्कृति से मुक्त करवायें।

डॉ प्रभाकर उन महिलाओं की खास तौर पर मदद करते हैं जिनके पति या जिनकी फैमिली उनका साथ नहीं देती है। उन्होंने 1996 में गांव की गरीब महिलाओं को सपोर्ट करने के लिए सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट नाम से एक नॉन प्रोफिट ऑर्गनाइजेशन की शुरुआत की थी।

केरल के पलक्कड़ इलाके में एक समय घर के बाहर काम करने में पुरुषों का वर्चस्व रहा करता था। लेकिन आज महिलाएं घर से बाहर निकलकर काम कर रही हैं और पैसे कमाकर घर भी चला रही हैं। इस बदलाव का सारा श्रेय डॉक्टर प्रभाकर को जाता है। डॉ. प्रभाकर ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अमेरिका में प्रोफेसर की अच्छी खासी नौकरी छोड़ गांव की महिलाओं का उत्थान करने और उन्हें सशक्त बनाने का काम शुरू किया है। एक बार वह गांव आए थे तो उन्होंने देखा कि गांव की महिलाओं की हालत काफी दयनीय है और उन्हें अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्होंने देखा कि गांव की लड़कियां स्कूली शिक्षा से वंचित रह जा रही हैं।

डॉ. प्रभाकर कहते हैं, 'जब मैं केरल वापस आया तो देखा कि यहां बदलाव की सख्त की जरूरत है। मैं बांग्लादेश के माइक्रो फाइनैंस बैंकर यूनुस खान से काफी प्रभावित था। इसलिए मैं बांग्लादेश गया और उनके साथ 6 महीने रहकर माइक्रो क्रेडिट मॉडल को अच्छे से समझा। मैं उस मॉडल को केरल में भी लागू करना चाहता था। मुझे मालूम था कि इसे सफल तरीके से लागू करना एक चैलेंज था, लेकिन हर हाल में मैं इसे करना चाहता था।' डॉ. प्रभाकर ने 1996 में गांव की गरीब महिलाओं को सपोर्ट करने के लिए सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट नाम से एक नॉन प्रोफिट ऑर्गनाइजेशन की शुरुआत की।

फोटो साभार: सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट
फोटो साभार: सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट

सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट शुरु करने से पहले अपने गांव की महिलाओं को देखकर डॉ. प्रभाकर को लगा कि महिलाओं को केवल सशक्त ही नहीं बनाना है बल्कि उन्हें आर्थिक आजादी और स्थिरता भी प्रदान करनी है जिससे वे अपनी जिंदगी के स्वतंत्र निर्णय ले सकें। इस मॉडल के जरिए उन्होंने महिलाओं को फ्री में लोन देना शुरू किया। उन्होंने शुरुआत में अपनी जेब से 2 लाख रुपये के लोन बांट दिए। वह कहते हैं, 'हम महिलाओं को सिर्फ लोन देते हैं, उस लोन का कैसे और किस काम में इस्तेमाल करना है इसकी उन्हें पूरी आजादी रहती है। वह जो बिजनेस चाहे शुरू कर सकती हैं। इनमें से कुछ महिलाएं चाय की दुकान खोल लेती हैं, कुछ छोटा-मोटा काम शुरू कर देती हैं। हम मैनेजर बनने की कोशिश नहीं कर रहे हैं बल्कि हम सिर्फ एक सपोर्टर बने रहना चाहते हैं।'

जब उनसे बिना किसी गारंटी के लोन देने में रिस्क के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि लोन वापस करने की दर 99 % है। उन्होंने बताया कि लाभार्थियों की पहचान करना थोड़ा कठिन काम है और इसके बारे में लोगों की और उनकी आवश्यकताओ के बारे में रिसर्च करनी पड़ती है। डॉ प्रभाकर बताते हैं कहते हैं, 'हम ऐसे लोगों की पहचान करते हैं जो रिमोट एरिया में रहते हैं और जहां अभी तक कोई सुविधाएं नहीं पहुंची हैं।' डॉ प्रभाकर उन महिलाओं की खास तौर पर मदद करते हैं जिनके पति या जिनकी फैमिली उनका साथ नहीं देती है।

फोटो साभार: सोशल मीडिया
फोटो साभार: सोशल मीडिया

महिलाओं की जरूरत के मुताबिक सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट के लोन मॉडल को कस्टमाइज किया गया है। इसके अंतर्गत कम से कम 10,000 का लोन दिया जाता है जिसे साप्ताहिक रूप से भरना होता है।

डॉ. प्रभाकर पर्सनली महिलाओं के संपर्क में रहते हैं और उनसे काम की प्रोग्रेस के बारे में जानकारी लेते रहते हैं और यही उनकी सफलता का मंत्र है। सोसाइटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट मॉडल के जरिए महिलाओं को दिये जाने वाले लोन की ब्याज दर काफी कम है। इसके साथ ही वे महिलाओं को सामूहिक रूप से बचत करने के लिए प्रेरित भी करते हैं।

पूवनकोड गांव की रहने वाली 40 साल की वेलम्मा ने गाय पालने के लिए 5,000 का छोटा लोन लिया था। उन्होंने कुछ महीने में ही लोन चुकता कर दिया। उसके बाद उन्होंने बकरी पालने के लिए लोन लिया। धीरे-धीरे उनका बिजनेस बढ़ता गया और फिर उन्होंने 20,000 का लोन ले लिया। इन पैसों से उन्होंने सुपारी से बने उत्पादों को बनाने की मशीन खरीद ली। अब उनके साथ दो और महिलाएं भी काम करती हैं।

वेलम्मा सैकड़ों महिलाओं के बीच एक उदाहरण हैं। उनके जैसी तमाम महिलाएं डॉ. प्रभाकर के जरिए सशक्त हो रही हैं। डॉ, प्रभाकर कहते हैं कि इस पुरुषवादी समाज में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वह हमेशा काम करते रहेंगे।

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