अपनी होंडा सिटी बेचकर साईकिल खरीदने वाली महिला, गौरी जयराम

लोगों के लिए सफ़र आयोजित करने वाली महिला के सफ़र की कहानी

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“ये सारा खेल बस सफ़र का आनंद लेने का है, ना कि किसी मुकाम तक पहुँचने का.”, ये कहना है गौरी जयराम का, जो किसी भी सफ़र को लेकर अति-उत्साही रहती हैं और ख़तरे उठाने से बिल्कुल नहीं चूकती हैं. उन्हें कभी भी एक चलते सफ़र को छोड़कर दूसरे सफ़र में आगे बढ रहे कारवां से जुड़ने से डर नहीं लगा और ना ही कोई झिझक हुई. उन का मानना है, “या तो ये सफ़र मुझे कहीं ले जाएगा, या मैं इस सफ़र को कहीं ले जाऊँगी”. गौरी एक्टिव हॉलीडे कंपनी की संस्थापक हैं. उन की कंपनी निर्देशित और स्व-निर्देशित रोमांचकारी छुट्टियाँ (adventure holidays) आयोजित करती है. अपने अंतर्राष्ट्रीय सफ़र के तुज़ुर्बों के मद्दे-नज़र, उन्होंने अपना पूरा ध्यान हिन्दुस्तानी यात्रियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं को नियोजित करने में लगा रखा है. उन का ख़ास उपभोक्ता वर्ग है, ऎसे यात्री, जो उन्हीं की तरह ट्रैकिंग, साईकिलिंग, हाईकिंग और मैराथन में दौड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सफ़र करते हैं. उन्होंने अपना ये दूसरा उद्यम (एक्टिव हॉलीडे कंपनी) २०१३ में शुरू किया था.

गौरा जयराम
गौरा जयराम

एक उद्यमी का जीवन

गौरी के अनुसार, अपना स्टार्ट-अप चलाना बहुत से उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है. बतौर उद्यमी, उन के पास हमेशा वक़्त की किल्लत रहती है और उन की निजी इच्छा है कि दिन में २४ से ज़्यादा घंटे होने चाहिए. उन के अनुसार, हिन्दुस्तान में एक उद्यम, और ख़ास तौर पर इस तरह का कोई अप्रचलित उद्यम, शुरू करने में सबसे बड़ी दिक्कत है, सही टीम को जुटा पाना. वो कहती हैं, “बहुत से लोग हैं जो हम से जुड़ना चाहते हैं लेकिन उन के कौशल और विशेषताओं में वो मेल नहीं होता, जो एक स्टार्ट-अप के लिए ज़रूरी है.” दूसरी अहम दिक्कत जो उन के सामने आती है, वो है उन के लक्षित बाज़ार के बारे में सामान्य जागरूकता की भारी कमी. उन के अनुसार, बहुत से हिन्दुस्तानियों को इस तरह की छुट्टियों के बारे में बहुत कम ज्ञान है. वो कहती हैं, “हमारे पास आज भी ऎसे लोग आते हैं जो चाहते हैं कि हम उन के लिए रोमांचकारी छुट्टियाँ डिस्नीलैण्ड में आयोजित करे. एक पल के लिए तो दीवार से सिर फोड़ लेने का मन करता है.”

जिंदगी का सफ़र

भारतीय वायु सेना में एक विमान चालक की बेटी होने के कारण उन का जीवन शुरू से ही ख़ानाबदोश किस्म का रहा है. महज पाँच साल की उम्र में वो अपनी पहली सड़क यात्रा पर निकल गई थी, अपने “फ़ौजी” पापा के साथ. ग्यारह साल मुम्बई में बिताने तक वो स्नातक हो चुकी थी और २० साल की उम्र से नौकरी भी करने लगी थी. Air Mauritius के साथ बतौर स्थानीय प्रबंधक काम करते हुए उन की शादी भी हो गई, जिस के चलते वो २००१ में चेन्नई आ गई. माँ बनने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और उद्यमिता की और अग्रसर हो गई. उन्होंने बिना किसी पूँजी के २००१ में अपना पहला व्यवसाय शुरू किया. तब वो लोगों के लिए केवल छुट्टियाँ आयोजित करती थी. हालांकि काम ठीक चल रहा था लेकिन उन के ब्रांड को ख़ास पहचान नहीं मिल पा रही थी. उसी दौरान उन्हें दुनिया की एक बड़ी टूरिंग कंपनी में दक्षिण ऎशिया का सबसे बड़ा पद संभालने का न्यौता मिला, जिसे उन्होंने बिना झिझक स्वीकार कर लिया. उन्होंने इस पद को २००५ में संभाला और लगभग साढ़े आठ साल उस कंपनी के साथ बिताये.

ख़ुद की खोज का सफ़र

“अपने चालीसवें जन्मदिन पर, एक तरह से अपने सामान को कम से कम करने और ज़िंदगी में अपने अनुभवों को बढ़ाने की आध्यात्मिक खोज में, मैंने अपनी होंडा सिटी बेच दी और ख़ुद के लिए एक साईकिल खरीदी.” गौरी ये नहीं समझ पा रही थी कि वो अपनी नौकरी से ऊब चुकी थी या मध्य जीवन के उतार-चढ़ाव से गुज़र रही थी. उन्होंने प्रेरणा के लिए अपनी नौकरी और घर-बार से बाहर खोजना शुरू किया. उन्होंने दौड़ना, लिखना शुरू कर दिया और यहाँ तक कि एक किताब तक छपवा डाली. उन्होंने अपनी छुट्टियाँ दुनिया भर में होने वाली मैराथन दौड़ों के अनुसार तय करनी शुरू कर दी. उसी साल वो जोर्डन में डेड-सी मैराथन (Dead Sea Marathon), जो धरती के न्यूनतम स्तर पर होती है, में हिस्सा लिया. उस के ठीक बाद घर पर केवल अपना सामान बदलने के लिए आई और ऎवरेस्ट बेस कैंप में हिस्सा लेने नेपाल चली गई. उन की इस नेपाल यात्रा जिस में उन्होंने सिर्फ़ एक बैग पर गुज़ारा किया, बिना किसी मोबाईल या कंप्यूटर के, के दौरान उन्हें ये आभास हुआ कि वो ज़िंदगी में अपने साथ कितना “बेज़रूरत सामान” इकट्ठा कर चुकी हैं. गौरी जब लौटी तो वो पूरी तरह से बदल चुकी थी और तब उन्होंने अपने जीवन में से हर वो चीज़ हटानी शुरू की जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं थी. इसी समय उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी, अपनी बड़ी गाड़ी बेची और फिर से शुरूआत की. १९९९ में एक बार उनका मौत से भी आमना-सामना हो गया था जब वो नेपाल में एक नाव (Raft) से पानी में गिरी और लगभग डूब ही गई थी. वो कहती हैं, “उस घटना ने मुझे चेताया और मैंने एक बार फिर से अपनी प्राथमिकतायें तय की.”

सब कुछ तो पुरूषों को भी नहीं मिलता

गौरी के अनुसार, जो महिलायें सही साथी और सही व्यवसाय चुनती हैं, वो बहुत दूर तक पहुँचने की क्षमता रखती हैं. वो इतना समय यात्राओं में बिताती हैं, इसलिए उन से ये सवाल अक्सर पूछा जाता है कि उन की बेटियों का ख़्याल कौन रखता है? गौरी का बड़ा सीधा-सा जवाब है, “दूसरा अभिभावक. मैं ख़ुशनसीब हूँ क्योंकि मेरे पति ये मानते हैं कि वो उनकी भी उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी हैं, जितनी मेरी. मैं मानती हूँ कि मैं अपने काम की वजह से बहुत-सी बातों से अनजान रह जाती हूँ, लेकिन ऎसा ही तो उन पिताओं के साथ भी होता है, जिन्हें अपने काम की वजह से घर छोड़ कर बार-बार सफ़र करना पड़ता है. मुझे नहीं लगता कि पुरूषों को भी सब कुछ मिल पाता है.” गौरी को घर से दूर रहने की वजह से किसी तरह की ग्लानि नहीं होती है क्योंकि ये उन का ख़ुद का चुना हुआ रास्ता है, जिस पर चलना उन्हें ख़ुश रखता है. वो कहती हैं, “काम पर जाना मैंने चुना है. मैं अपनी बेटियों को कभी भी ये नहीं कहती कि मम्मी को काम पर पैसे कमाने के लिए जाना है, मैं काम करती हूँ क्योंकि मुझे काम करने में मज़ा आता है और मेरा काम मुझे एक बेहतर माँ बनाता है. उन्हें भी ये बात समझ में आ जाएगी जब वो अपनी पसंद का काम करने लेगेंगी.”

सफ़र हो कम से कम सामान के साथ

गौरी को लगता है कि महिलाओं को कम से कम सामान के साथ सफ़र करने की आदत डालनी चाहिए. ये उनके लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित हो सकता है. ऎसा करने से ख़ुद को हल्का महसूस होता है, और साथ ही एक आज़ादी का एहसास मिलता है. गौरी के अनुसार, अपने यात्रा संबंधी काग़ज़ात की एक नकल (copy) घर पर भी छोड़ देनी चाहिए और चेक-इन किए हुए सामान में भी. अपने साथ के सामान में बस एक फ़ोन का चार्जर ज़रूरी है. गौरी एक उद्यमी बन के बहुत ख़ुश है और अपनी ख़ुशी वो उस काम से ले रही हैं, जो उन के दिल के बहुत करीब है – रोमांच. “मुझे एक ख़ाली कैनवस को रंगने के लिए मिले अवसर, अपनी ख़ुद की कहानी लिखने का रोमांच, वो घबराहट जो महीने के आख़िर में सब को तनख़्वाह बाँटने के लिए होती है, वो सब मुझे बहुत अधिक ख़ुशी देता है. पर इस सबसे भी अधिक, मैं अपने सफ़र का मज़ा लेती हूँ. हर दिन नया है, हर सुबह कुछ नए सबक सिखाने के लिए आती है और अपने साथ लाती है अवसर सीखने, बढ़ने और जोख़िम उठाने के. और जब सफ़र थोड़ा मुश्किल हो जाता है – मैं हर बार एक लम्बी दौड़ के लिए निकल पड़ती हूँ, लौटने तक सारे संदेह दूर हो जाते हैं.

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Stories by मोहित कटारिया