सामाजिक संगठनों के लिए फंड मुहैया कराने का नया ज़रिया, ‘पाॅवर फाॅर वन’

विभिन्न गैर-लाभकारी संगठनों के लिये अपनी वेबसाइट के माध्यम से धन जुटाने का करते हैं कामप्रतिमाह कुछ संगठनों के कामों और उनके बारे में अपनी वेबसाइट पर डालते हैं जानकारी जिससे दानदाताओं से धन सीधे ‘पाॅवर फाॅर वन’ के पास आता है जो इन संगठनों तक उसे पहुंचाता हैजल्द ही एक मोबाइल एपलीकेशन के सहारे लोगों को अपने साथ जोड़ने की है योजना

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वर्तमान समय में सामाजिक और पर्यावरण से संबंधित मुद्दे हमारे जीवन को बहुत हद तक प्रभावित कर रहे हैं और इस ओर ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है। ऐसे में इन मुद्दों को सकारात्मक रूप से सामने लाते हुए समाज में जागरुकता पैदा करने और इस काम के लिये धन की व्यवस्था करने वाले बहुत से संगठन आज हमारे सामने हैं। इस विशेष सबब को सामने रखकर खड़े हुए फंडरेजि़ंग मंच इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं और बीते कुद दशकों में भारत ने ऐसे कई मंचों को पनपते हुए देखा है।

गिवइंडिया, यूनाइटेड वे और मिलापडाॅटओआरजी इसके कुछ जीते-जागते उदाहरण हैं। ‘पाॅवर फाॅर वन’ इस कड़ी में शामिल होने वाला एक बिल्कुल नया नाम है जिसकी स्थापना को अभी सिर्फ दो महीने का समय ही बीता है। इनका लक्ष्य दानदाताओं ओर लाभार्थियों को एक साथ जोड़ने के काम को एक नया दृष्टिकोण देते हुए उसे और प्रभावी बनाना है।

मिहिर लूनिया और ईशान कपूर
मिहिर लूनिया और ईशान कपूर

‘‘वर्ष 2010 में काॅलेज के दिनों में मैं और मेरा मित्र ईशान समाज में अमीरी और गरीबी की खाई को पाटने के रास्तों को तैयार करने के बारे में विचार करते थे। लेकिन हमने इस क्षेत्र में वास्तविक रूप से इसी वर्ष जनवरी के महीने से काम करना प्रारंभ किया,’’ सह-संस्थापक मिहिर लूनिया कहते हैं। वे आगे जोड़ते हैं, ‘‘हमारे देश में एक तरफ तो ‘टीच फाॅर इंडिया’ और इसके जैसे कुछ बड़े संगठन हैं जो बहुत उच्च स्तर पर स्थापित होने के साथ-साथ बेहतरीन नेटवर्क और अच्छी से अच्छी प्रतिभा से लैस हैं और दूसरी तरफ कुछ ऐसे निहायती छोटे संगठन हैं जो एक छोटे से पारिवारिक व्यवसाय की तरह संचालित हो रहे हैं। इन छोटे संगठनों के बारे में अधिक लोग नहीं जानते हैं और हम उनके बारे में पता लगाने और उनकी सहायता करने की प्रक्रिया का एक हिससा बनना चाहते हैं।’’

‘पाॅवर फाॅर वन’ प्रतिमाह कुछ गैर-लाभकारी संगठनों के साथ एक करार करता है और अपनी वेबसाइट के माध्यम से दुनिया को उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों और उनके बारे में जानकारी देता है। इनकी चयन की प्रक्रिया बेहद कठोर है और ये किसी भी संगठन की पृष्ठभूमि के बारे में पूरी जानकारी लेने के अलावा उनके उद्देश्यों और संचालन का भी पूर्ण मूल्यांकन करते हैं। एक बार संतुष्ट होने के बाद ‘पाॅवर फाॅर वन’ उन्हें अपनी समस्याओं, उनके समाधानों और प्रभावों के अलावा धन के आदर्श उपयोग के बारे में जानकारी देने के लिये एक मंच उपलब्ध करवाता है।

इसके बाद मिलने वाला प्रत्येक दान पहले ‘पाॅवर फाॅर वन’ के पास आता है और फिर साप्ताहिक या मासिक आधार पर लाभार्थी संगठनों तक एक नोडल (इन और आउट) एकाउंट के माध्यम से पहुंचाई जाती हैं। प्रत्येक दानदाता से प्राप्त दान में से ‘पाॅवर फाॅर वन’ 800 से 1000 रुपये तक अपने पास रखता है।

इन कामों का समर्थन करने के लिये फंडरेजि़ंग को ही एक अवसर के रूप में क्यों चुना? मिहिर कहते हैं, ‘‘वास्तव में इनमें से अधिकतर को इस चुनौती का सबसे अधिक सामना करना पड़ता हैं और वे यहीं संघर्ष करते हैं।’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘हम अपने उपयोगकर्ताओं को सोशल मीडिया के माध्यम से भी योगदान करने का विकल्प उपलब्ध करवाते हैं। हर शेयर की एवज में संगठन को 50 रुपये तक प्राप्त होते हैं और यह सिर्फ इसलिये संभव हो पाता क्योंकि हमनें विभिन्न सामाजिक कार्यों को प्रायोजित करने वाली बड़ी कंपनियों के साथ इस तरह का करार किया हुआ है।’’

दूसरी तरफ ‘मिलाप’ इनके एक अलग अवधारणा पर काम करता है। मिहिर बताते हैं, ‘‘मिलाप अपने उपयोगकर्ताओं को ऋण देने की सुविधा देता है जबकि हम सिर्फ धर्मार्थ चंदा और दान उपलब्ध करवाते हैं।’’

‘पाॅवर फाॅर वन’ का दावा है कि इनका काम करने का तरीका ऋण आधारित मंच की तुलना में अधिक पारदर्शी और स्पष्ट है। ‘‘कीवा की तरह सामाजिक कार्यों के लिये ऋण की व्यवस्था करवाने वाले संगठन ऋण देने वाले को लेने वाले के बारे में जानकारी नहीं देते हैं और न ही मिलवाते हैं। वास्तव में इसमें लेने वाले देने वाले से बहुत कम ब्याज पर धन की प्राप्ति करता है। इस तरह से अगर कोई अमरीका में बैठकर लाओस में किसी को धन उपलब्ध करवाना चाहता है तो यह सक्रिय रूप से असंभव हो जाएगा!’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘यह प्रक्रिया काफी उलझी हुई है और इसी वजह से हम इससे दूर ही रहे। हमने बस अपने तरीके से धन की तलाश में लगे सामाजिक कार्यों को करने वालों को उन लोगों से मिलवाने का काम किया है जो धन देना चाहते हैं।’’

‘पाॅवर फाॅर वन’ दानदाताओं और उनके द्वारा समर्थन किये जा रहे सामाजिक कार्य के मध्य एक स्थायी संयोजन स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन यह कोई आसान काम नहीं है। मिहिर बताते हैं, ‘‘यह एक आम बात है कि समाज मेे वे लोग जो संपन्न हैं और एक अच्छी स्थित में हैं वे कम भाग्यशाली लोगों लोगों की सहायता करने के लिये कुछ देने को अग्रसर रहते हैं। हम सिर्फ इसमें प्रतिबद्धता के एक भाव को भी शामिल करना चाहते हैं जिसे बेचना काफी मुश्किल चुनौती है।’’ अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने अंर्तक्रियाशीलता को बढ़ाने के लिये ये सोशल मीडिया की ताकत का प्रयोग करने के इच्छुक हैं। मिहिर कहते हैं, ‘‘हम अपने उपयोगकर्ताओं को किसी भी संगठन के घटनाक्रम और रिपोर्ट से अवगत करवाने के लिये इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप्प जैसे सोशल मीडिया मंचों का प्रयोग करना वाहते हैं।’’

अपनी स्थापना के मात्र दो महीनों के भीतर ही यह संस्थान दस से अधिक गैर-लाभकारी संगठनों को प्रोत्साहित कर चुका है और आने वाले कुछ महीनों में इनका इरादा 50 से 60 संगठनों को अपने मंच के साथ जोड़ने का है। इनमें से सबसे सफल ने अपनी प्रतिज्ञा का 34 फीसदी उगाहने में सफलता पाई है। इसके अलावा विश्व के सबसे सफल स्टार्टअप मोबाइल आधारित रहे हैं इसलिये ‘पाॅवर फाॅर वन’ भी उसी रास्ते पर आने के प्रयासों में है ताकि वह अन्य मंचों से अलग कुछ कर सके। मिहिर मुस्कुराते हुए कहते हैं, ‘‘हम सामाजिक कार्यों के लिये एक ईंधन बनना चाहते हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि उनकी टीम को इस रूप में मिलने वाली प्रतिक्रिया का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं हैं। ‘‘लेकिन यह सब एक सीखने वाली प्रक्रिया है!’’

विभिन्न सामाजिक संगठनों के सकारात्मक कार्यों को दुनिया के सामने लाना बेशक महान काम है लेकिन इसके साथ उनके व्यक्तित्व के कमतर होने का भी खतरा है। यह टीम अब इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिवट्र और व्हाट्सएप्प जैसे सोशल मीडिया के एप्लीकेशनों की महत्ता को समझ चुकी है और अब ये इस ओर भी ध्यान देते हैं कि वे इन माध्यमों के प्रयोग से विभिन्न सामाजिक कार्यों को बढ़ाने और समारात्मक रूप में उनका उपयोग कर सकें।


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Stories by Nishant Goel