'न्यूटन' का ड्रामा बर्दाश्त करना सबके वश की बात नहीं

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बीते दिनों न्यूटन फिल्म काफी चर्चा में रही। भारत की ओर से इसे ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए भेजने की योजना चल रही है। फिल्म नक्सलवादी इलाके में कई वर्ष बाद चुनाव कराने जैसे विषय पर बनाई गई है। फिल्म में राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा, अंजली पाटिल जैसे कलाकार हैं।

फिल्न न्यूटन का एक दृश्य
फिल्न न्यूटन का एक दृश्य
इस फिल्म में सभी कलाकारों की एक्टिंग की काफी तारीफ हो रही है। तारीफ आम लोग तो कर ही रहे हैं, कवि-साहित्यकार भी जब उस पर कुछ लिखने के लिए कलम उठा लें तो बात ज्यादा उल्लेखनीय हो जाती है।

विष्णु नागर देश के प्रतिष्ठित कवि हैं और रामशरण जोशी जाने-माने पत्रकार। दोनों फिल्म देखकर खुश हैं। नागर जी अपने फेसबुक वॉल पर 'न्यूटन' देख आने की तार्किक खुशी साझा कर रहे हैं। पढ़ने वाले वितर्क कर रहे हैं। इसी बहाने विचारधारा के पक्ष-विपक्ष में बड़ी जोर की मरोड़ उठती है।

इधर, एक नई फिल्म आई है 'न्यूटन'। भारत की ओर से ऑस्कफर अवॉर्ड्स के लिए भेजे जाने की बड़ी चर्चा है। फिल्मब नक्सल प्रभावित इलाके में कई वर्ष बाद चुनाव कराने जैसे विषय पर बनाई गई है। फिल्म में राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा, अंजली पाटिल जैसे कलाकार हैं। सभी कलाकारों की एक्टिंग की काफी तारीफ हो रही है। तारीफ आम लोग तो कर ही रहे हैं, कवि-साहित्यकार भी जब उस पर कुछ लिखने के लिए कलम उठा लें तो बात ज्यादा उल्लेखनीय हो जाती है। विष्णु नागर देश के प्रतिष्ठित कवि हैं और रामशरण जोशी जाने-माने पत्रकार। दोनो फिल्म देखकर खुश हैं। नागर जी अपने फेसबुक वॉल पर 'न्यूटन' देख आने की तार्किक खुशी साझा कर रहे हैं। पढ़ने वाले वितर्क कर रहे हैं। इसी बहाने विचारधारा के पक्ष-विपक्ष में बड़ी जोर की मरोड़ उठती है। बात-कुबात में हल्की सी ठन जाती है।

कवि-कथाकार विष्णु नागर ने पिछले दिनो लिखा, 'आज मैं 'न्यूटन' फ़िल्म देखकर आ रहा हूँ। यह फ़िल्म काफ़ी यथार्थवादी है, इतनी कि हमारा सामान्य दर्शक इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। थोड़ा ड्रामा भी है, हास्य भी इंटरवल से पहले है। यह फ़िल्म नक्सल प्रभावित इलाक़ों में पुलिस-अर्धसैनिक बल चुनाव किस तरह फ़र्ज़ी ढंग से कराते हैं, इसकी बानगी प्रस्तुत करती है। कनिष्ठ राजपत्रित अधिकारी, जो चुनाव का पीठासीन अधिकारी है, किस तरह इन सुरक्षा बलों की मर्ज़ी के खिलाफ चुनाव अभियान संचालित करता है, इनसे शारीरिक मुठभेड़ तक करता है, यह काफ़ी हद तक फ़िल्मी और ड्रामाई है, इसके बावजूद निश्चित रूप से राजकुमार राव ने अपना काम पूरे और विश्वसनीय ढंग से और कौशल से किया है। और पात्रों ने भी, जिन्हें पंकज त्रिपाठी, रघुवीर यादव, संजय मिश्र आदि ने किया है, जिन्हें हिंदी का बेहतर सिनेमा देखने की इच्छा है, उन्हें यह ज़रूर देखनी चाहिए।

'वैसे दुर्भाग्य से शायद इसे महानगरों में ही देखा जा सकता है। क़स्बों के सिनेमाघर तो शायद इसे लगाएं ही नहीं। दिल्ली में पहले ही हफ़्ते में जिस थियेटर में देखा, पचास-साठ दर्शक ही मौजूद थे। बर्लिन फ़िल्म फ़ेस्टिवल और हांगकांग फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कृत होने के बावजूद यह हाल है। वैसे 90 लाख रुपये में बनी यह फ़िल्म क़रीब सात करोड़ कमा चुकी है, इस अर्थ में यह कामयाब है। यह फ़िल्म भारत सरकार की ओर से ऑस्कर के लिए नामांकित की गई है और यह भारत में देखने दी जा रही है, इसके बावजूद कि एक जगह मोदीजी की ओर इशारा करते हुए चायवाला को चायवाली बताया गया है। इस दौर में यह थोड़े आश्चर्य की बात है मगर यह आश्चर्य सुखद है। इसका श्रेय क्या सेंसर बोर्ड के नये अध्यक्ष प्रसून जोशी को दिया जाए?'

फिल्म जो देखन मैं चला.... तो नागरजी की इस पोस्ट पर रामशरण जोशी लिखते हैं कि सभी लोकतंत्र प्रेमियों को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए। बादल सरोज कहते हैं कि भोपाल आ जाइए। लगी है । आपकी हाजिरी का लाभ उठाकर कुछ और कार्यक्रम भी कर लेंगे। सूर्य कुशवाहा लिखते हैं कि प्रसून जोशी वाली बात पर संदेह है। ज़ाहिरा तौर पर वह...पक्षधर माने जाते हैं। शायद उनकी निगाह चूक गयी होगी, या कोई और वजह हो सकती है। अनूप सेठी का कहना है कि प्रसून जोशी नहीं, एफएफआई, इसका पूरा नाम पता करना होगा।

एसके सिंह का मानना है कि पॉलिटीसियन को तो श्रेय बिल्कुल नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह तो कभी कैंची चलाने से बाज नहीं आएगा। सेंसर बोर्ड जिस में प्रसून जोशी एक अहम भूमिका निभा रहे हैं, ही इस सुखद परिवर्तन का सही हकदार हैं। रमाकांत यादव लिखते हैं कि जिस डायलाग की बात की जा रही है, वह अगर है तो हम इसे साहसिक सृजन ही कहेंगे। निर्माता निर्देशक के साथ सेंसर बोर्ड की साहसिक दृष्टि की भी सराहना की जानी चाहिए।

पोस्ट पढ़कर प्रभात कुमार त्यागी गुस्सा हो जाते हैं। कहते हैं कि फ़िल्म बहुत शानदार है पर सामान्य दर्शक इसे क्यों बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह कैसा अहम है कि आप अपने को असामान्य की श्रेणी में रख रहे हैं। बहुत पहले एक हास्य फ़िल्म 'प्यार किये जा' में महमूद मुमताज के पिता से एक डायलॉग बोलता है कि एक लड़की क्या पैदा कर ली, अपने को राजा भोज समझने लगे। वही बात यहाँ लग रही है कि चार किताबें क्या छपा लीं, अपने को सामान्य जन (जिसकी आप कसमें खाते हैं) से अलग एक विशिष्ट व्यक्ति समझने लगे। साहित्य में भी वीआईपी गिरी कर रहे हैं। इस खरी-खरी पर विष्णु नागर कहते हैं कि अरे त्यागी जी,आप यों ही बिगड़ रहे हैं। मैं भी सामान्य ही हूँ मगर जब दिल्ली में अक्सर अच्छी फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते तो छोटे शहरों में दर्शक कहाँ मिलेंगे?और हमारे दर्शक यथार्थ बहुत बर्दाश्त नहीं कर पाते।

अच्छी बात है कि किसी फिल्म को लेकर देश में मुद्दत बाद सार्थक गंभीर चर्चा हो रही है। कभी 'दामुल', 'आक्रोश' जैसी फिल्मों पर बातें हुआ करती थीं, उनका जनजीवन में हस्तक्षेप होता था। बीच के दौर में भी सामाजिक कुंठाओं की कलई खोलती और भी तमाम फिल्में आती रही हैं। अब, जबकि 'न्यूटन' जायज शोर मचा रही है, बात साफ हो जाती है कि सेंसर बोर्ड का दरिया लांघ कर जनता का दुख-दर्द साझा करने वाली फिल्में हमारे बीच आ सकती हैं, न आने की, लुंगी डांस दिखाने की वजहें कुछ और हैं। ये पूरा चरस अमिताभ-शहारुख टाइप बाजारवादियों का बोया हुआ है, जिसे नई पीढ़ी के कलाकार और निर्माता-निर्देशक भी काटने में जुटे हुए हैं। एक दौर था जब कमर्शियल मसाला फिल्मों के साथ-साथ समानांतर सिनेमा का भी अपना दर्शक वर्ग था। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, प्रकाश झा जैसे समर्थ निर्देशक थे। 'पार', 'भूमिका', 'अर्धसत्य' जैसी क्लासिक फिल्में बौद्धिक खुराक दिया करती थीं। दिए हैं। बाद के दौर में बाजार की मिलावट ने ऐसा सत्यानाश किया कि आज पूंजी भाषा में मीडिया हुंकारने लगता है, फलां फिल्म ने सौ करोड़ कमाए तो फलां फिल्म ने पांच सौ करोड़।

'न्यूटन' नए निर्देशक अमित मसूरकर की दूसरी फिल्म है, जो बरबस ही समानांतर सिनेमा के सुनहरे दौर को दिल-दिमाग पर ताजा कर रही है। 'न्यूटन' एक आदर्शवादी लड़के (राजकुमार राव) की कहानी है। उसका घर का नाम नूतन है। बदलकर वह अपना नाम न्यूटन रख लेता है। चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके में उसकी ड्यूटी लगती है। नक्सलवाद से जूझते उस चुनाव क्षेत्र में गिने-चुने मतदाता होते हैं। न्यूटन के सामने निष्पक्ष मतदान की चुनौती है, जिसे साधते हुए वह हमारे समय की हकीकत पूरी तरह पर्दे पर खोल देता है। फिल्म में दूसरे समर्थ कलाकार रघुवीर यादव हैं। आदिवासी लड़की के रोल में अंजलि पाटिल की भी तारीफ हो रही है। (मूल अंश विष्णु नागर के एफबी वॉल से साभार)

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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