औरतों को पब्लिक टॉयलेट दिलाने के लिए सालों से लड़ रही हैं मुमताज शेख

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मुमताज शेख ने यह सुनिश्चित करने के लिए लगातार अभियान चलाया कि गरीब वर्ग की महिलाओं के लिए मुंबई शहर में पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय बनाए जाएं। इसके लिए उन्होंने 'राइट टू पी' नामक आंदोलन शुरु किया। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के 53.1 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है। ग्रामीण इलाकों में यह संख्या 69.3 प्रतिशत है। 

साभार: वन डॉ ओआरजी
साभार: वन डॉ ओआरजी
 राइट टू पी कार्यक्रम के तहत उन्होंने औरतों के लिए शौचालय बनाने का अभियान छेड़ा। सरकार ने उन्हें डॉटर ऑफ महाराष्ट्र अवॉर्ड से नवाजा। हाल में बीबीसी ने उन्हें दुनिया की सौ प्रेरक महिलाओं की सूची में शामिल किया है।

'राइट टु पी' मुहिम शहर में जगह-जगह नुक्कड़ नाटक कर लोगों में जागरूकता बढ़ाने में लगी है। नाटक के एक भाग में महिलाएं एक पुरुष को डांटते हुए गाना गा रही हैं– अच्छी बात कर ली बहुत, अब करूंगी तेरे साथ गंदी बात, गंदी गंदी गंदी गंदी गंदी बात! यहां गंदी बात से मतलब जाहिर है, अगर महिला पेशाब जैसी अपनी जरूरतों की बात करे, तो समाज उसे गंदी बात ही तो कहता है।

मुमताज शेख ने यह सुनिश्चित करने के लिए लगातार अभियान चलाया कि गरीब वर्ग की महिलाओं के लिए मुंबई शहर में पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय बनाए जाएं। इसके लिए उन्होंने 'राइट टू पी' नामक आंदोलन शुरु किया। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के 53.1 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है। ग्रामीण इलाकों में यह संख्या 69.3 प्रतिशत है। भारत में महिलाओं की जनसंख्या आधी है, फिर भी उनके खुले में शौचालय जाना पड़ता है। शहरों में वे पैसे देकर सुलभ- शौचालय का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन गरीब महिलाओं के लिए ये भी बहुत महंगा है। ऐसी ही समस्याओं से महिलाओं को निजात दिलवाने के लिए मुंबई की निवासी मुमताज शेख सरकार से लड़ाई लड़ रही हैं। लेकिन मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था।

मुमताज के मुताबिक, जब हम नगर निगम अधिकारियों के पास अपनी मांग लेकर पहुंचे, तो उन्होंने इसे हंसी में उड़ा दिया। कहा कि अब हम ऐसे मुद्दों पर भी बात करेंगे? यह दर्शाता है कि भारत में ज्यादातर लोगों की मानसिकता यही है कि महिलाओं की कोई जरूरतें नहीं है, और अगर हैं भी तो उन पर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जब अधिकारियों ने उनकी मांग अनसुना कर दी, तो उनका ध्यान खींचने के लिए मुमताज ने एक नायाब तरीका ढूंढ़ा। हंसते हुए वो बताती हैं, हमने उन्हें कहा कि अगर उन्होंने हमारी मांगें नहीं सुनीं तो हम महिलाएं उनके दफ्तर के बाहर खुले में पेशाब करने के लिए बैठ जाएंगी। बस ये सुनते ही अधिकारियों ने हमें बैठक के लिए बुला लिया। और आज आलम ये है कि हम नगर निगम के साथ मिलकर लगभग 90 मुफ्त मूत्रालय बनवाने को योजना पर काम कर रहे हैं।

एक करारी चोट और बड़ा बदलाव-

अपने निजी जीवन में घरेलू हिंसा के खिलाफ लंबा और कठिन संघर्ष जारी होने के बावजूद, मुमताज ने मुंबई में महिलाओं के लिए शौचालय सुविधाएं की कमी पर ध्यान देने हेतु आत्मविश्वास जुटाया। मुमताज बताती हैं, मैंने एक दिन बस्ती के एक आदमी से पूछा, तुम अपनी पत्नी को क्यों पीटते हो? यह गलत है। उसने पलटकर कहा, पहले खुद को देखो। क्या तुम्हारा पति तुम्हें नहीं पीटता? यह सुनने के बाद मुमताज ने तय किया कि पहले मैं अपने हालात बदलूंगी, फिर समाज सेवा करूंगी। उन्होंने तय किया कि वह पति से तलाक लेंगी और स्वतंत्र जिंदगी जिएंगी। उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। एक एनजीओ से जुड़कर उन्होंने बस्ती की महिलाओं को घरेलू हिंसा से छुटकारा दिलाने के लिए अभियान छेड़ा। अंतरराष्ट्रीय संगठन लीडर क्वेस्ट ने उन्हें फेलोशिप दी। धीरे-धीरे वह बस्ती की महिलाओं की रोल मॉडल बन गईं। राइट टू पी कार्यक्रम के तहत उन्होंने औरतों के लिए शौचालय बनाने का अभियान छेड़ा। सरकार ने उन्हें डॉटर ऑफ महाराष्ट्र अवॉर्ड से नवाजा। हाल में बीबीसी ने उन्हें दुनिया की सौ प्रेरक महिलाओं की सूची में शामिल किया है।

साभार: बेटर इंडिया
साभार: बेटर इंडिया

पूर्वी मुंबई का एक इलाका है चेंबूर। मुमताज परिवार के संग इसी इलाके में रहती थीं। सात साल की हुईं, तो अब्बू घर छोड़कर चले गए। बस मुमताज और उनकी मां रह गईं। अपने दूसरे पति के आतंक से आजिज आकर उनकी मां ने बेटी को एक रिश्तेदार के घर भेज दिया। मुमताज बताती हैं, वह रिश्ते में मेरे चाचा थे। उनके अपने आठ बच्चे थे। मैं उनके लिए बोझ थी, मगर उन्होंने मुझे पनाह दी। अम्मी से अलग रहना मुश्किल जरूर था, पर सुकून था कि चलो, यहां कोई मुझे पीटेगा नहीं। अम्मी कभी-कभी मिलने आती थीं। उन्होंने चाचा से अनुरोध किया कि चाहे जो हो जाए, मुमताज का स्कूल छूटना नहीं चाहिए। जब वह 15 साल की थीं तो उनकी चाची ने कहा, आगे पढ़ने की जरूरत नहीं है। 16 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई। अगले ही साल वह एक बेटी की मां बन गईं। ससुराल का माहौल ठीक नहीं था। पति ने मुमताज पर तमाम पाबंदियां लगा रखी थीं। उन्हें बाहर जाने या किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी।

जब उग आई उम्मीद की किरण-

वह हर समय उन पर नजर रखता कि वह कहां जाती हैं, किससे मिलती हैं, क्या करती हैं? इस बीच मुमताज ने गौर किया कि बस्ती में अक्सर चार-पांच महिलाएं मीटिंग करती हैं। एक दिन जब पति घर पर नहीं था, तो वह चुपके से मीटिंग में पहुंच गईं। महिलाएं बस्ती की समस्याएं बता रही थीं और एक एनजीओ के सदस्य उन्हें आश्वासन दे रहे थे। मुमताज अचानक खड़ी हुईं, और उन्होंने पूछा, आप लोग तो इस बस्ती के नहीं हैं, आप यहां क्यों काम करेंगे? एनजीओ के एक सदस्य ने उनसे पूछा, आप तो बस्ती की हैं। आप कुछ क्यों नहीं करतीं? मुमताज ने कहा, भला मैं क्या कर सकती हूं? वह आठवीं पास थीं, लिहाजा उन्हें बस्ती की अनपढ़ महिलाओं को साक्षर बनाने का काम सौंपा गया। मुमताज बताती हैं, पति ने इस हिदायत के साथ औरतों को पढ़ाने की अनुमति दी कि मैं घर का दरवाजा बंद करके उन्हें पढ़ाऊंगी और बाहर नहीं जाऊंगी। इसके बाद मुमताज की जिंदगी बदलने लगी। पढ़ाई के बाद महिलाएं घर में खुद पर हो रहे जुल्म के बारे में बात करती थीं। मुमताज को लगा कि यही सब तो वह वर्षों से सहती आई हैं।

इस कैम्पेन ने जहां कई महिलाओं को घर से बाहर आनेवाली समस्याओं से निजात दिलाई, वही इस कोशिश से महिला सम्बन्धी स्वास्थ्य समस्याओं पर भी रोक लगने में मदद मिली। मुंबई की बस्तियों में अगर सुबह के वक्त देखें तो हर सार्वजनिक शौचालय के बाहर महिलाओं की लंबी कतार दिखती है। इन महिलाओं की हर दिन की शुरुआत इसी तरह होती है। सुबह शौचालय जाने के लिए इन्हें लगभग आधा घंटा इस कतार में इंतजार करना पड़ता है, क्योंकि मुंबई की बस्तियों के घरों में शौचालय ही नहीं हैं। कतार में खड़ी महिलाओं के चेहरे पर गुस्सा साफ झलकता है। शौचालय का इस्तेमाल कर जैसे ही वो बाहर आती हैं, तो वहां रखी मेज पर दो रुपए का सिक्का रख घर की ओर निकल पड़ती हैं। 

झल्लाते हुए कहती हैं, आदमी का क्या है, वो तो कहीं भी दीवार के आगे खड़े हो जाते हैं, लेकिन हम महिलाएं क्या करें? हर दिन अगर पांच बार भी जाना हो तो 10 रुपए लगते हैं। हम गरीब कहां से लाएं इतना पैसा? पूरा दिन टॉयलेट न जाने के लिए पानी तक नहीं पीते हम। मुंबई में कई महिलाएं पैसे बचाने के लिए शौचालयों की जगह खुले में पेशाब करने जाती हैं। लेकिन वो ये भी जानती हैं कि सुरक्षा के नजरिए से यह उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है। भारत में पिछले कुछ सालों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जब एकांत में पेशाब करने जा रही महिलाएं बलात्कार का शिकार हुई हैं।

साभार: सोशल मीडिया
साभार: सोशल मीडिया

जब राइट टू पी की हुई शुरुआत-

मुंबई में पुरुषों के लिए 3000 मूत्रालय हैं लेकिन महिलाओं के लिए एक भी नहीं। वर्ष 2011 से राइट टू पी अभियान शुरु करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाली मुमताज का शुरुआती संघर्ष तत्कालिक मुंबई नगर पालिका आयुक्त ने आसान बनाया। लेकिन आगे चलकर यह अभियान धीमा पड़ गया क्योंकि यह आरोप लगने लगे कि मुमताज का संगठन एक ऐसी नागरिक समस्या पर जोर लगा रहा, जो बृहन्मुंबई महानगर पालिका की जिम्मेदारियों में आता है। इन आरोपों के चलते अभियान के अंतर्गत किया जा रहे कार्यों की गति बेहद धीमी पड़ गयी। लेकिन मुमताज ने हार नहीं मानी और खुद से राइट टू पी अभियान की कमान संभालते हुए इसे शानदार सफलता दिलाकर ही मानी। 2013 में शेख के अथक प्रयासों के चलते 96 मुफ्त शौचालयों के निर्माण हेतु 5 करोड़ रुपए आवंटित किये गये। इसके साथ ही शहर भर में सिर्फ महिलाओं के लिए प्रसाधन गृह बनाने के लिए 5 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि भी जारी की गई।

असर तगड़ा हो रहा है-

'राइट टु पी' मुहिम शहर में जगह-जगह नुक्कड़ नाटक कर लोगों में जागरूकता बढ़ाने में लगी है। नाटक के एक भाग में महिलाएं एक पुरुष को डांटते हुए गाना गा रही हैं– अच्छी बात कर ली बहुत, अब करूंगी तेरे साथ गंदी बात, गंदी गंदी गंदी गंदी गंदी बात! यहां गंदी बात से मतलब जाहिर है, अगर महिला पेशाब जैसी अपनी जरूरतों की बात करे, तो समाज उसे गंदी बात ही तो कहता है। दर्शकों के बीच मौजूद कुछ महिलाएं जहां इस नाटक को बड़े ध्यान से देख और सुन रही हैं, तो कुछ महिलाएं शर्म के मारे इधर-उधर नजरें घुमा रही हैं। शायद यही इस बात का संकेत है कि भारत में महिलाओं की जरूरतों और उनकी आवाज को सदियों से दबाया जाता रहा है।

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