महिलाओं का स्टार्टअप शुरू करवाती हैं पुणे की आंत्रप्रेन्योर दिना

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दिना वालेचा पुणे की हैं। वो अन्य महिलाओं के स्टार्टअप्स को शुरू करने में मदद करती हैं। जहां ये देश पुरुष प्रधान देश है वहीं दिना वालेचा एक अच्छा उदाहरण हैं कैसे एक महिला समाज में बदलाव ला सकती है। 

पहली तस्वीर में दिना वालेचा (फोटो साभार HT), दूसरी फोटो में महिला आंत्रेप्रेन्योर्स।
पहली तस्वीर में दिना वालेचा (फोटो साभार HT), दूसरी फोटो में महिला आंत्रेप्रेन्योर्स।
पूणे की दिना वालेचा ने वो कर दिखाया है, जिसके बारे में हम और आप सिर्फ बातें ही करते हैं। हम बोलते रहते हैं कि हम समाज के वंचित तबके के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन दिना ने बोलने की बजाय करने में यकीन किया। 

2001 में जब दिना वालेचा ने वर्चुअल प्रदर्शनी शुरू की, तब यह बहुत ही असामान्य था क्योंकि लोगों का मानना था कि प्रदर्शनी आयोजित करके कोई व्यवसाय कैसे कर सकता है? आईये जानें उनके सफर के बारे में किस तरह उन्होंने अपने काम को अंजाम दिया और कैसे उनकी मदद से कई आंत्रेप्रेन्योर्स हुई हैं सफल...

जब एक महिला कोई व्यवसाय शुरु करती है तो आमतौर पर लोगों की यही सोच होती है कि महिला फैशन इंडस्ट्री में व्यवसाय करेगी। लेकिन दिना वालेचा ने इस धारणा को पीछे छोड़कर अपना अलग मुकाम बनाया है। दिना ने 2001 में वर्चुअल प्रदर्शनी की शुरुआत की जिसमें उन महिलाओं के लिए प्रदर्शनियां थीं जो अपने उत्पादों का प्रदर्शन करना चाहती थीं। 

दिना वालेचा पुणे की हैं। वो अन्य महिलाओं के स्टार्टअप्स को शुरू करने में मदद करती हैं। जहां ये देश पुरुष प्रधान देश है वहीं दिना वालेचा एक अच्छा उदाहरण हैं, कि कैसे एक महिला समाज में बदलाव ला सकती है। 2001 में जब दिना वालेचा ने वर्चुअल प्रदर्शनी शुरू की, तब यह बहुत ही असामान्य था क्योंकि लोगों का मानना था कि प्रदर्शनी आयोजित करके कोई व्यवसाय कैसे कर सकता है ?

दिना की जिंदगी का टर्निंग प्वॉइंट

दिना वालेचा के मुताबिक, 'ये वही है जो मैं हमेशा से करना चाहती थी। जब हम मुंबई से पुणे गए तो हमने गोरेगांव पार्क में एक दुकान खरीद ली। उस समय मैं कपड़े तैयार करती थी और उन्हें बेचती थी, जैसा अधिकांश गृहिणियां करती हैं। बाद में हमने हमारी दुकान को तीन भागो में विभाजित कर दिया। पहले भाग में हमारे बच्चों की कंप्यूटर क्लासेज चलती थीं, दूसरे भाग में मेरे पति विनोद ऑटो सीट कवर का विक्रय करते थे और तीसरे भाग में मैं कपड़े बेचती थी।' और यही वो समय था जब दिना वालेचा को कुछ और करने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने नोटिस किया कि बहुत सी महिलाएं, मम्मियां जो कंप्यूटर सीखने आती थीं या उनके यहां कपड़े खरीदती थीं, वो सब किसी न किसी हुनर में माहिर हैं।

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उस समय उनको एहसास हुआ कि इन महिलाओं की एक बड़ी संख्या है जो कुछ कर रही हैं और वास्तव में अच्छा सामान बना रही हैं, जैसे अचार, जैम, डाई या कपड़े । तब उन्होंने खुद सोचा कि क्यों उनके पास कोई बड़ा मंच नहीं है जहां वे बड़े बाजार तक पहुंच सकें जहां उनका कारोबार बढ़ सके । उनका मानना था कि इन महिलाओं के विकास में अगर कोई चीज रुकावट बन रही है तो वो है किसी मंच का न होना। इसलिए दिना वालेचा ने एक प्रदर्शनी आयोजित करने का फैसला किया जहां पर सिर्फ महिला उद्यमियों द्वारा बनाए गई चीजों की ही प्रदर्शनी लगाई जाएगी।

दिना के इस सफर में कई अड़चनें आईं लेकिन उनको खुद पर भरोसा था। वो कहती हैं कि मैं इस क्षेत्र में नई थी, एक जगह सबको एकत्र करना और विज्ञापन देना। फिर उसके बाद एक प्रदर्शनी आयोजित करना आसान लग सकता है, लेकिन मुझे पता है कि प्रारंभिक प्रदर्शनियां कितनी मुश्किलों से भरी होती थीं।

दिना के मुताबिक, 'मुझे याद है कि मैं सप्ताह में तीन से चार बार मुंबई जाकर महिलाओं के उद्यमियों की सूची, आंकड़ें इकट्ठा करती थी। फिर उनसे एक-एक करके संपर्क करने और उन्हें प्रतिभाग करने लेने के लिए मनाती थी। एक टाइम ऐसा आया जब पैसे की कमी का मुद्दा सामने आया। एक बार एक जगह बुक करानी थी, विज्ञापन और के लिए भुगतान करना था। मैं ये सब अच्छे से करना चाहती थी। मैंने अपने पति से इसके लिए कर्ज लिया। मेरे पति बहुत सपोर्टिव हैं। मेरी पहली प्रदर्शनी के लिए मुझे 2 लाख की आवश्यकता थी। मैं इसे एक अच्छी जगह में कराना चाहती थी और मैंने ताज ब्लू डायमंड को चुना।'

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अपनी इस पहली प्रदर्शनी में दिना ने 35 महिलाओं को भी आमंत्रित किया जो शो में अपना सामान प्रदर्शित करना चाहती थीं। उन्होंने शहर भर की महिला उद्यमियों को बुलाया। उनका ये पहला शो काफी सफल रहा। सभी ने उनकी इस अनूठी पहल की काफी प्रशंसा की।

17 साल पहले लगाई गई उस पहली प्रदर्शनी के बाद दिना ने अपना दिमाग सिर्फ आगे बढ़ने में लगाया। दिना कहती है कि 'पहले पांच से छह सालों के लिए मुझे चारों ओर अपने काम के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत कुछ करना पड़ा। मुझे अपना आइडिया महिलाओं को समझाना था और उन्हें बोर्ड पर लेना था। लेकिन उसके बाद जैसे-जैसे लोगों तक इस काम के बारे में जानकारियां पहुंचनी शुरू हुईं तैसे-तैसे बड़ी संख्या में महिलाओं ने अपने सामान की प्रदर्शनी के लिए पंजीकरण कराना शुरू कर दिया। आजकल मेरी स्टॉल पर से सामान, प्रदर्शनी की तारीख से एक महीने पहले ही बिक जाते हैं।'

दिना मानती हैं कि उनकी इस सफलता में विज्ञापन की एक बड़ी भूमिका रही है क्योंकि विज्ञापन ने ही उनकी प्रदर्शनी के बारे में लिखा और लोगो तक पहुंचाया। दिना ने वो कर दिखाया है जिसके बारे में हम और आप सिर्फ बातें ही करते हैं। हम बोलते रहते हैं कि हम समाज के वंचित तबके के लिए कुछ करना चाहते हैं। लेकिन दिना ने बातों में ही अपना टाइम वेस्ट नहीं किया। बल्कि उन्होंने कदम उठाया, मुश्किलें सहीं और आज वो हम आप जैसे लोगों के लिए मिसाल हैं जो सिर्फ बातें करते रह जाते हैं।

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

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