खत्म हो चुकी नदी को गांव के लोगों ने किया मिलकर जीवित

...और जीवित हो उठी बकुलाही

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बकुलाही नदी को जनपद के लोग अपनी खुद की नदी कहते हैं। खुद की नदी? क्या नदी भी कहीं खुद की हो सकती है। यह तो प्राकृतिक सम्पदा है, जिस पर सबका हक है। लेकिन प्रतापगढ़ में प्रवाहित होने वाली बकुलाही नदी यहां के लोगों की अपनी नदी है।

बकुलाही नदी। फोटो साभार: panipost.in
बकुलाही नदी। फोटो साभार: panipost.in

तीन दशकों से सूखी पड़ी नदी एक बार पुन: जीवित हो उठी है। इसके पीछे लोक का संघर्ष है, तप है और त्याग भी। संघर्ष, तप और त्याग का फल गुणनफल देश-दुनिया के लिए एक नायाब उदाहरण बन चुका है।

बकुलाही नदी भारत की वेद वर्णित प्राचीन नदियों में से एक है। हिन्दुओं के प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ 'वाल्मीकि रामायण' में भी इस नदी का उल्लेख हुआ है। बकुलाही नदी का प्राचीन नाम 'बालकुनी' था, किन्तु बाद में परिवर्तित होकर 'बकुलाही' हो गया। बकुलाही शब्द लोक भाषा अवधी से उद्धृत है। जनश्रुति के अनुसार बगुले की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होने के कारण भी इसे बकुलाही कहा जाता है।

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद की बकुलाही नदी की 18 किलो मीटर लम्बी लुप्तप्राय हो चुकी प्राचीन धारा आज कल-कल करती अविरल प्रवाहित हो रही है। करीब दो दर्जन से अधिक गांवों के लाखों लोगों की वर्षों की अतृप्त प्यास बुझा रही है। आस-पास के गांवों के भूगर्भ जलस्तर में भी सुधार हुआ है। बकुलाही नदी को जनपद के लोग अपनी खुद की नदी कहते हैं। खुद की नदी? क्या नदी भी कहीं खुद की हो सकती है। यह तो प्राकृतिक सम्पदा है, जिस पर सबका हक है। लेकिन प्रतापगढ़ में प्रवाहित होने वाली बकुलाही नदी यहां के लोगों की अपनी नदी है।

गौरतलब है, कि तीन दशक पूर्व बकुलाही नदी की प्राकृतिक धारा से छेड़छाड़ की गई थी। यह छेड़छाड़ नैसर्गिक कम राजनीतिक अधिक थी। 18 किलो मीटर लम्बी बकुलाही नदी की मूलधारा का अपहरण कर लिया गया था। 18 किलो मीटर की जलधारा के तट पर बसे 25 गांवों से उनकी नदी जो उनके जीने का आसरा थी, छीन ली गई थी। तभी से लगातार पूरे तोरई, पूरे वैष्णव, जदवापुर, सरायदेवराय डीहकटरा, छतौना, मनेहू, हिन्दूपुर, बाबूपुर, सरायमेदीराय, बरईपुर, मिसिरपुर, सिउरा, हैसी, बुकनापुर, पनई का पूरा, शोभीपुर, जमुआ, वैरीसाल का पुरवा, रामनगर, भटपुरवा, ढेमा और गौरा आदि तकरीबन दो दर्जन गांवों की खुशियां भी विलुप्त हो गई। गांवों की हरियाली और खुशहाली भी रूठ गई। जल स्तर धीरे-धीरे पातालमुखी हो गया। खेत-बाड़ी भी प्रभावित हुई। वन क्षेत्र उजाड़ होने लगे। प्रवासी पक्षियों ने भी पलट कर देखना बन्द कर दिया। इसी के साथ 25 गांवों की लगभग एक लाख आबादी के बीच अपनी नदी बकुलाही को पुन: पाने की बेचैनी भी बढ़ती गई।

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वर्ष 2003 में जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने इन गांवों का दौरा किया और कहा कि बकुलाही की पुरानी धारा को वापस लाये बिना इस जल संकट से छुटकारा नहीं मिल सकता। यह बात उस समय अनेक समाज सेवियों ने सुनी, परन्तु एक युवा के मन पर इसका सर्वाधिक असर हुआ। उसने संकल्प लिया कि 25 गांवों के प्यासे लोगों को उनकी नदी लौटाने का। वह युवा था समाज शेखर, जो आज बकुलाही समाज का नेतृत्व कर रहा है।

समाज शेखर ने समाज के समक्ष बकुलाही का मुद्दा उठाया और वर्ष 2011 में भयहरण धाम पर बकुलाही पंचायत का आयोजन किया। पंचायत में हजार से अधिक लोग शामिल हुए। बकुलाही नदी के उद्धार को लेकर गम्भीर विमर्श हुआ। तय किया गया कि किसी भी सूरत में अपनी नदी को जीवनदान देंगे। समाज शेखर के साथ पंचायत में आये सभी गांववासियों ने बकुलाही के लिए भगीरथ संकल्प लिया और अगले ही दिन से साधना प्रारम्भ हो गई, जो शीघ्र ही लोक-साधना में तब्दील हो गई। कदम से कदम जुड़ते गए। बाहों से बाहें मिलीं। जनसैलाब उमड़ पड़ा।

समाज शेखर, फोटो साभार panipost.in
समाज शेखर, फोटो साभार panipost.in

इसी बीच प्रतापगढ़ के तत्कालीन जिलाधिकारी हृदेश कुमार बकुलाही समाज से रू-ब-रू हुए। बकुलाही नदी का भ्रमण किया और बकुलाही समाज के मंच पर आकर उन्होंने प्यासे समाज को उनका पानी और उनकी नदी लौटने की प्रतिज्ञा ली। बकुलाही की नाप-जोख हुई। ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में एक बड़ा 'दोमुहां' डैम बनाने की बात चली। परन्तु इंजीनियरों के समक्ष 25 वर्षों के अतिक्रमण से बकुलाही नदी की कम हुई गहराई एवं उसकी चौड़ाई बाधा के रूप में खड़ी थी। इसी समय जिलाधिकारी का स्थानान्तरण हो गया और नये जिलाधिकारी विद्याभूषण ने कार्यभार संभाला। विद्याभूषण ने जल सत्याग्रह समाज यात्रा की अगुवाई कर रहे समाज शेखर को वार्ता हेतु आमंत्रित किया तथा बकुलाही का क्षेत्र भ्रमण की इच्छा जताई। भ्रमण के दौरान जिलाधिकारी ने सभी सरकारी अमलों को बुला कर नदी खुदाई करने का काम शुरू कराया। इस कार्य के लिए उन्होंने मनरेगा मजदूरों को लगाया। समाज के सामूहिक प्रयास से श्रमदान एवं जेसीबी मशीनें लगा दी गईं।

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इस तरह प्रशासन का सहयोग मिलने से बकुलाही समाज का उत्साह दोगुना हो गया। साधना जारी रही। नदी पर कच्चा बांध बनाया गया और नदी की धारा को उसके प्राकृतिक मार्ग पर ले जाने के लिए घुमाया गया। 18 किलोमीटर लम्बा मार्ग 18 किलो मीटर लम्बे नदी के पुराने मार्ग में हुए अवरोधों को हटाते चले गए और 25 वर्षों बाद अपने पुत्रों पर अपनी ममता लुटाने बकुलाही मैया उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। 18 किलो मीटर बकुलाही में हुआ जल संचरण देश का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण बन गया।

बकुलाही समाज की अनवरत साधना का सुखद परिणाम भी अब दिखने लगा है। नदी की प्राचीन धारा सजल होकर वेग के साथ प्रवाहित हो रही है। पूरे नदी क्षेत्र में उत्सव-सा माहौल है। खेतों में हरियाली नजर आने लगी है। पिछले दो साल से प्रवासी पक्षी फिर से मेहमान बन कर आने लगे। आसपास के गांवों के जलस्तर में भी सुधार हो रहा है। समाज शेखर बकुलाही के पुनरुद्धार का श्रेय बकुलाही समाज को देते हैं। बतौर, समाज शेखर "प्रकृति के समस्त अवयव नदी, पहाड़, वन आदि अपने होते हैं। इनकी रक्षा और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी अपनी ही होती है। बकुलाही हम सबकी अपनी नदी है। हम सब बकुलाही के हैं। बकुलाही सबका पोषण करती है।" बकुलाही के अविरल स्वरूप को पुन: साकार करने के बाद नदियों और तालाबों को लेकर समाज शेखर की बेचैनी बढऩे लगी और वे विलुप्त हो चुके तालाबों के पुनरुद्धार में रम गए। दर्जनभर से अधिक तालाबों की जन सहयोग से खुदाई करवाई। फिलवक्त, समाज शेखर इलाहाबाद के यमुनापार क्षेत्र में विलुप्त हो चुकी प्राचीन ज्वाला नदी के पुनरुद्धार में लगे हैं।

बकुलाही नदी का परिचय

बकुलाही नदी भारत की वेद वर्णित प्राचीन नदियों में से एक है। हिन्दुओं के प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ 'वाल्मीकि रामायण' में भी इस नदी का उल्लेख हुआ है। इस नदी का प्राचीन नाम 'बालकुनी' था, किन्तु बाद में परिवर्तित होकर 'बकुलाही' हो गया। बकुलाही शब्द लोक भाषा अवधी से उद्धृत है। जनश्रुति के अनुसार बगुले की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होने के कारण भी इसे बकुलाही कहा जाता है।

उद्गम स्थल

बकुलाही नदी का उद्गम उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद में स्थित 'भरतपुर झील' से हुआ है। यहां से प्रवाहित होकर यह नदी 'बेंती झील', 'मांझी झील' और 'कालाकांकर झील' से जल ग्रहण करते हुए बड़ी नदी का स्वरूप ग्रहण करती है। जनपद मुख्यालय के दक्षिण में स्थित मान्धाता ब्लॉक को सींचती हुई यह नदी आगे जाकर जनपद के ही खजुरनी गांव के पास गोमती नदी की सहायक नदी सई में मिल जाती है।

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पौराणिक उल्लेख

बकुलाही नदी का संक्षिप्त वर्णन वेद-पुराण समेत कई धर्मग्रन्थों में है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण में बकुलाही नदी का उल्लेख किया गया है। वाल्मीकि रामायण में बकुलाही नदी का वर्णन इस प्रकार है, जब भगवान राम के वन से वापस आने की प्रतीक्षा में व्याकुल भरत के पास हनुमान राम का संदेश लेकर पहुंचते हैं, तो हनुमानजी से भरतजी पूछते हैं कि मार्ग में उन्होंने क्या-क्या देखा। इस पर हनुमानजी का उत्तर होता है -

सो अपश्यत राम तीर्थम् च नदी बालकुनी तथा बरूठी,

गोमती चैव भीमशालम् वनम् तथा।

इसी तरह इस नदी का वर्णन श्री भयहरणनाथ चालीसा के पंक्ति क्रमांक 27 में इन शब्दों में है -

बालकुनी इक सरिता पावन।

उत्तरमुखी पुनीत सुहावन॥

बकुलाही तट पर स्थित धार्मिक स्थल

बकुलाही नदी के तट पर अनेक पौराणिक स्थल हैं। इसके तट पर महाभारत कालीन भयहरणनाथ धाम स्थित है। भयहरणनाथ धाम से कुछ दूरी पर प्राचीन सूर्य मन्दिर स्थित है। विश्वनाथगंज के पास कुशफरा गांव में प्रख्यात शनि पीठ भी इसी नदी के तट पर स्थित है। इसके अलावा भी इस पावन नदी के तट पर अनेक धार्मिक स्थल हैं।

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