खतरे में चौथा खंभा: पत्रकारों की हत्या से गिरफ्तारी तक

खतरे में है कलम की ताकत...

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शब्द आनुष्ठानिक नहीं होते, इसलिए जरूरी नहीं कि चौथे खंभे के खतरे में होने की बात पत्रकारिता दिवस पर ही कही जाए। कलम दुश्वारियों में है। पत्रकार मारे जा रहे हैं, कुचले जा रहे हैं, गिरफ्तार हो रहे हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए कोई पत्रकार सच का खुलासा करता है, माफिया मार डालते हैं। सच का यह सिर्फ एक पहलू है, दूसरा खुद चौथे खंभे के घर-आंगन में। कुछ ताजा घटनाओं का संदर्भ लेते हुए, आइए, जानते हैं, आखिर किस तरह!

फोटो साभार: Shutterstock
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 जहां तक लोकतंत्र के खतरों की बात है, सोशल मीडिया आता है, खतरा पैदा हो जाता है, गठबंधनवादी सियासत पर कुछ लिखो, खतरा पैदा हो जाता है, खनन माफिया, शिक्षा माफिया, वन माफिया, दवा माफिया के भेद खोलो, खतरा पैदा हो जाता है और इसके लिए तमाम पत्रकारों को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ी है। संपादक महेश हेगड़े की खबर का सच क्या है, यह तो वही जानें लेकिन वह जिस आरोप में घिरे हैं, वह सच है, तो चौथे खंभे के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है!

मनुष्य के साथ शारीरिक हिंसा सबसे जघन्यतम कृत्य माना गया है। यदि कोई पत्रकार सच का खुलासा करता है तो उसे माफिया मार डालते हैं। वह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए ऐसा करता है। ऐसे में हमारी पुलिस व्यवस्था, न्याय पालिका और सरकार को सवालों के घेरे से बाहर नहीं रखा जा सकता है। 

पत्रकार मारे जा रहे हैं, कुचले जा रहे हैं, गिरफ्तार हो रहे हैं, अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं, उनकी कलम की राह की दुश्वारियां किस हद तक पहुंच चुकी हैं, यह सवाल बखूबी हमें अभिव्यक्ति के खतरों का एहसास कराता, वह भी तब, जबकि पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दर्जा प्राप्त है। पत्रकारिता पर यह चर्चा अनायास नहीं, न अप्रांसगिक है। बात बेंगलुरु के एक ताजा प्रकरण से शुरू करते हैं। यहां के एक न्यूज पोर्टल के संपादक महेश हेगड़े को सेंट्रल क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोप है कि वह पोर्टल पर फर्जी और भावनाएं भड़काने वाली खबरें प्रसारित कर रहे थे। इससे दो समुदायों के बीच नफरत फैल रही थी। 

एक जैन मुनि सड़क हादसे में घायल हुए, जबकि पोर्टल ने गलत समाचार प्रसारित किया कि वह मुस्लिम युवकों के हमले में जख्मी हो गए। घटनात्मक दृष्टि से देखें तो यह बात मामूली सी लगती है लेकिन जब हम इसे चौथे स्तंभ के मूल्यों की कसौटी पर परखते हैं, ऐसा सोचने के लिए विवश हो जाते हैं कि किस तरह आज की ऐसी गैरजिम्मेदाराना स्थितियां ही ईमानदार पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी हैं। जहां तक लोकतंत्र के खतरों की बात है, सोशल मीडिया आता है, खतरा पैदा हो जाता है, गठबंधनवादी सियासत पर कुछ लिखो, खतरा पैदा हो जाता है, खनन माफिया, शिक्षा माफिया, वन माफिया, दवा माफिया के भेद खोलो, खतरा पैदा हो जाता है और इसके लिए तमाम पत्रकारों को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ी है। संपादक महेश हेगड़े की खबर का सच क्या है, यह तो वही जानें लेकिन वह जिस आरोप में घिरे हैं, वह सच है, तो चौथे खंभे के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है! भारतीय पत्रकारिता के साथ यह कोई एक-अकेले का वाकया नहीं है। अब आइए, सच का एक और पहलू खंगालते हैं।

हाल की दो घटनाओं को लेते हैं। मध्य प्रदेश के भिंड जिले में एक न्यूज चैनल के लिए रिपोर्ट फाइल करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा की ट्रक से कुचलकर मौत हो जाती है। उनके परिजन हत्या का दावा करते हुए बताते हैं कि संदीप ने अवैध रेत खनन पर स्टिंग ऑपरेशन किया था, रेत माफिया का पुलिस से गठजोड़ है। एक और घटना बिहार की। आरा में दैनिक भास्कर के पत्रकार नवीन निश्चल की भी वाहन से कुचल कर मौत हो जाती है। उनके भी परिजन बताते हैं कि पूर्वप्रधान ने उनकी हत्या कराई है। इन दोनों घटनाओं पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस कहते हैं - ‘हम निश्चित तौर पर विश्व में कहीं भी पत्रकारों के खिलाफ हो रहे किसी भी तरह के उत्पीड़न और हिंसा को लेकर चिंतित हैं और इस मामले में भी हमारा यही रुख है।’ ज्यादातर पत्रकारों की ऐसी मौतों पर साफ-साफ एक बात निकलकर सामने आती रही है कि घटना की वजह जरायम है। 

प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकार के लिए काम करने वाली अमेरिकी संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) भारतीय अधिकारियों से भी पत्रकारों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने की उम्मीद करती है। मनुष्य के साथ शारीरिक हिंसा तो सबसे जघन्यतम कृत्य माना गया है। यदि कोई पत्रकार सच का खुलासा करता है तो उसे माफिया मार डालते हैं। वह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए ऐसा करता है। ऐसे में हमारी पुलिस व्यवस्था, न्याय पालिका और सरकार को सवालों के घेरे से बाहर नहीं रखा जा सकता है। पत्रकार की जान लेने में दो तरह की वजहें रेखांकित की जा सकती हैं। यशस्वी पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी की भी हत्या हुई थी। पत्रकार भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। वजह क्या थी? देश की आजादी का तकाजा।

 गणेशशंकर विद्यार्थी का गुनाह था कि वह सांप्रदायिकता से लड़ते हुए शहीद हुए और संपादक महेश हेगड़े की खबर कथित रूप से सांप्रदायिकता को हवा देती है। यह है बुनियादी अंतर। अयोध्या कांड के दिनो में इस तरह की बेशर्मी सिर चढ़ कर बोली थी। एक पत्रकार (गणेशशंकर विद्यार्थी) के कृत्य पर हमे गर्व होता है, दूसरे पत्रकार पर लगे आरोप हमें विचलित-शर्मिंदित करते हैं। बात बस इतनी सी है कि दोनों स्थितियों के बीच का अंतर हमे आज की पत्रकारिता के स्वभाव, चाल-चलन, रंग-ढंग को समझने में मदद करता है। विद्यार्थी जी उस समय मारे जाते हैं, जब देश अंग्रेजों का गुलाम होता है। संभव है, उस वक्त शासक वर्ग देशभक्त को मारने वाले अपराधियों को संरक्षण दे लेकिन आजाद भारत में पत्रकारों की हत्या हमारे सामने एक बार फिर शहीद भगत सिंह की टिप्पणी पर सोचने के लिए विवश करती है कि 'क़ानून की पवित्रता तभी तक बनी रह सकती है जब तक की वह लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति करे।'

दूसरे सिरे से आज की पत्रकारिता का हाल-चाल लें तो कई और चित्र-चरित्र उभरते हैं। आधुनिकतम मीडिया में तरुण तेजपाल का भी नाम आता है और अरुण शौरी, रामशरण जोशी, ओम थानवी का भी। इन नामों को लिए जाने में योग्यता-अयोग्यताओं के भिन्न-भिन्न आशय हैं। हमारे देश में प्रेस परिषद भी हैं। छाती पीट-पीट कर तरह-तरह से लिखा जा रहा है। ऐसे-ऐसे कलमकार कि उन पर सौ-सौ गंगापुत्र न्यौछावर जाएं। बस गौर से देखने की जरूरत है कि कौन किधर जा रहा है, कौन किससे गदर-संवाद में चिपटा हुआ है। कई तो आचरण को अपने ढंग से पारिभाषित करते हैं, जीते हैं और पत्रकारिता का आए दिन जनाजा निकालते रहते हैं। एक सिरा और। फेसबुक इंडिया की हेड कीर्थिगा रेड्डी कहती हैं- अखबारों से ज्यादा लोग फेसबुक के प्लेटफार्म पर हैं। भारत वो जगह है, जहां यह सब कुछ हो रहा है। अच्छे पत्रकार प्ररेणादायक लोगों के आसपास रहना चाहते हैं। इससे कीर्थिगा को विश्वास हुआ कि उनके पास ऐसे लोगों के साथ काम करने का मौका है। फेसबुक सोशल मीडिया नहीं है, असल में वह मास मीडिया है। उन लोगों का आंकड़ा देखिए जो उससे जुड़ते हैं और फिर प्रमुख अंग्रेजी अखबारों से इसकी तुलना कीजिए। तो आज दो तरह के सामाजिक वर्गों के निर्माण में इस आधुनिक पत्रकारिता की सबसे गंभीर भूमिका मानी जा सकती है। हम जैसा समाज बनाएंगे, वैसे ही नतीजों का तो साबका मोल लेना होगा। यह भी जान लीजिए कि भारतीय संस्कृति दुनिया की महान संस्कृतियों में से एक मानी जाती है। 

ऐसी महान संस्कृति में अस्पृश्यता कलंक भी घुला हुआ है। इसीलिए हमारे देश में दलित साहित्य, दलित पत्रकारिता का उद्भव हुआ है। प्रसंगवश इसी में विकिलीक्स, ओपनलीक्स, माफ़ियालीक्स आदि के पत्रकारीय प्रकरण भी क्रमशः आते और जाते रहते हैं। ये सब भिन्न-भिन्न संदर्भ भारतीय अथवा विश्व-पत्रकारिता में इस तरह घुले-मिले, समाए हुए हैं कि सिर्फ बेंगलूरू, आरा और भिंड की घटनाओं को सामने रखकर इसका निचोड़-निष्कर्ष निकालना कत्तई न्यायसंगत नहीं होगा, न ही मुमकिन है। इतना भर कहा जा सकता है कि ईमानदार पत्रकार असुरक्षित हैं और पत्रकारिता के दामन पर उग आए हजार दाग भी अपनों के ही दिए हुए हैं। दरकार है, ये हालात बदलने की। फिलहाल, मौजूदा राग-'दरबारी' ताने-बाने में उलझे मीडिया प्रपंच को देखते हुए ऐसा तो संभव नहीं दिखता है।

माना जाता है कि राजनीति और मुद्रा आज समाज की हर छोटी-बड़ी गतिविधि की शीर्ष नियंता हैं। हमारे देश में प्रजातंत्र आए लगभग सत्तर वर्ष हो गए हैं लेकिन आज भी भारतीय जनता की सोच पूरी तरह से प्रजातांत्रिक नहीं हो पाई है। प्रजातंत्र में राजनीतिक दल ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और उन्हीं के बीच में राजनीतिक शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा होती है लेकिन हम अब भी किसी ऐसे व्यक्तित्व की तलाश में रहते हैं, जो राजनीतिक क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान कर सके। 

राजनीतिक दलों के अगुवा भी धीरे-धीरे निरंकुश प्रजातंत्रवादी हो गए हैं और वे अपने दल में किसी भी दोयम दर्जे के नेता का क़द ऊपर नहीं उठने देना चाहते हैं ताकि वह कभी भी उनके लिए एक चुनौती बनकर न उभरे। इस अंतरद्वंद्व के प्रभाव से अन्य क्षेत्रों की तरह पत्रकारिता भी भला असंपृक्त कैसे रह सकती है। इन्हीं अर्थों में पत्रकारों का राजनीतिक इस्तेमाल होने लगा है। वांछित रिपोर्टिंग के लिए पार्टियां उन्हें अलग से कई बार तो मुंह मांगी कीमतों और भांति-भांति की सुविधाओं से नवाजती रहती हैं।

ऐसे में सुविधाजीवी पत्रकारिता हमारे समय के साथ, देश के साथ, जनता के साथ भला किस तरह न्याय कर सकती है और ऐसी व्यवस्था में ईमानदार पत्रकार सुरक्षित रह भी कैसे सकते हैं। सच्चाइयां तो इससे भी ज्यादा तल्ख और पीड़ा दायक हैं। जग देख रहा है कि राजनेता किस तरह अपना-अपना व्यक्तित्व को बेचने में मीडिया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह शोध का विषय भी हो सकता है। संक्षेप में बस इतना जान लीजिए कि पत्रकार तो महात्मा गांधी भी थे।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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