एक "आविष्कार" ने किए कई आविष्कार

"आविष्कार" के आविष्कारों की कहानी है बड़ी ही रोचक मात्र 24 साल की उम्र में विनीत बने था सीईओ

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विनीत राय पढ़ाई में काफी औसत छात्र रहे लेकिन मात्र 24 साल की उम्र में सीईओ बनकर उन्होंने दिखा दिया कि क्लास में पहले स्थान पर आने पर ही कोई सफल नहीं हो सकता। सफल होने के लिए काम के प्रति लगन, ईमानदारी और दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत होती है। यह सभी गुण विनीत में थे इसलिए आज वे वह सब कर पा रहे हैं जो वे सोचते हैं।

विनीत का जन्म जोधपुर में हुआ। भारत-पाक सीमा के करीब स्थित होने के कारण वहां पर सेना की चहलकदमी काफी ज्यादा थी। देश के जवानों को देखकर विनीत के मन में भी सेना में भर्ती होने की इच्छा पैदा हुई। वे सेना में भर्ती होना चाहते थे लेकिन उनका चयन नहीं हो पाया। इससे वे काफी मायूस और हताश हो गए। फिर उन्होंने सेल्स रीप्रेजेंटेटिव के तौर पर नौकरी की, लेकिन जल्दी ही वे समझ गए कि यह फील्ड उनके लिए नहीं है। फिर एक मित्र की सलाह पर उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फारेस्ट मैनेजमेंट ज्वाइन कर लिया। कोर्स खत्म होने के बाद उन्होंने बल्लरपुर इंडस्ट्री ज्वाइन कर ली। बल्लरपुर कागज के व्यवसाय के लिए प्रसिद्ध था। फॉरेस्ट डिपार्टमेंट प्राइवेट इंडस्ट्री को अपनी जगह इस्तेमाल करने देता था जिससे वे लोग बांस काटकर अपनी फैक्ट्री में ले जाते थे। यह काम बिलकुल नया था और जोखिम भरा भी। एक साल विनीत ने इसी इलाके मेें बिताया फिर उनका तबादला बोइंदा जिले में हो गया, जहां परिस्थितियां काफी बुरी थीं। न बिजली थी न पानी। यहां पर विनीत को दो फॉरेस्ट डिवीजन संभालने थे। विनीत की दिनचर्या सुबह चार बजे शुरु हो जाती। सुबह-सुबह जंगल जाना होता था। लेकिन मात्र 24 वर्ष की आयु में ही उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिल गई थी, यह बहुत बड़ी बात थी।

लगभग डेढ़ साल यहां नौकरी करने के बाद इस्तीफा देकर विनीत दिल्ली आ गए। थोड़े समय बाद विनीत को प्रोफेसर अनिल गुप्ता के साथ काम करने का मौका मिला। उसके बाद गुजरात सरकार और प्रोफेसर अनिल एक इंस्टीट्यूट स्थापित कर रहे थे। जिसका नाम 'गेन' यानी ग्रासरूट्स इनोवेशन ऑज्मेंटेशन नेटवर्क था। विनीत ने उस प्रोजेक्ट में बतौर मैनेजर के लिए आवेदन किया लेकिन उनका चयन बतौर सीईओ हो गया। काम संभालने के बाद विनीत को लगने लगा कि 'गेन' को फाइनेंस की जरूरत है। और निवेशक तभी मिलेंगे अगर 'गेन' उद्योग का रूप ले ले। उसके बाद विनीत ने रिसर्च की और पाया कि अगर 'गेन' ग्रामीण निवेशक बन जाए तो उन्हें फंड मिल सकता है। उसके बाद सिडबी और नाबार्ड जैसे बैंकों से बात की गई लेकिन बात नहीं बनी। अंत में सिंगापुर में चालीस एनआरआई के समूह ने उन पर विश्वास जताते हुए पांच हजार डॉलर की राशि दी। इस प्रोजेक्ट का नाम आविष्कार रखा गया। लेकिन किसी को भी भरोसा नहीं था कि गांव का कोई भी मशीन बना सकता है। 'गेन ने दो इनोवेटर्स पर यह पूंजी लगाई जिन्होंने रुई धुनने की मशीन का निर्माण किया। नतीजा काफी अच्छा रहा। मात्र एक वर्ष में ही लागत का 26 प्रतिशत रिटर्न मिल गया। निवेशक हैरान थे, क्योंकि पहले किसी को भी इसकी आशा नहीं थी। लेकिन उसके बाद प्रोफेसर गुप्ता के साथ विनीत के कुछ मतभेद हुए और विनीत ने नौकरी छोड़ दी।

कुछ समय बाद विनीत की मुलाकात अरुण डियाज से हुई। अरुण से विनीत पहले सिंगापुर में मिल चुके थे। उन्होंने विनीत को पुन: आविष्कार के साथ जुडऩे का और उसे आगे बढ़ाने का न्योता दिया। उसी दौरान विनीत ने टी एण्ड वीसीएल- तुंगरी मनोहर वेंचर कैपिटल फंड के साथ एक कॉन्ट्रेक्ट साइन किया। यह बिल्कुल वैसा था जैसा विनीत आविष्कार में करना चाहते थे। फिर विनीत ने टी एण्ड एम के साथ काम करने के लिए मुंबई का रुख किया। साथ ही आविष्कार को भी एक ट्रस्ट के रूप में रजिस्टर्ड करवाया। उसके बाद सेबी के पास रजिस्टर्ड करवाया गया। सेबी ने शर्त रखी कि जब तक उनके ट्रस्ट के पास एक मिलियन डॉलर जमा न हो जाए तब तक वह निवेश नहीं कर सकते। लेकिन अगले कुछ महीने काफी निराशाजनक रहे। टीएण्डएम वीसीएल ने भी अपने सारे ऑपरेशन बंद कर दिए। काफी मेहनत के बाद एक करोड़ फंड जुटाया गया और फिर सेबी ने आविष्कार को कार्य करने के लिए हरी झंडी दिखा दी। इसके बाद खोज शुरु हुई समाज के दिल में चलने वाले उद्यमों की जहां निवेश किया जा सके। चेन्नई में सर्वल नाम की एक कंपनी थी जो कि ऐसे स्टोव बर्नर्स बनाती थी जो दूसरे बर्नरों के मुकाबले तीस प्रतिशत ज्यादा चलते थे। इसके दो फायदे हो रहे थे एक तो केरोसीन की बचत और दूसरा ग्रीन हाउज गैसों के उत्सर्जन में कमी करके पर्यावरण की भी रक्षा हो रही थी। सन 2002 में आविष्कार ने अपना पहला निवेश किया। पहले दो साल बहुत बुरे रहे और उम्मीद से काफी कम बर्नर बिके। जब रिसर्च की गई तो पाया कि ग्रामीण इलाकों में लोग सस्ते बर्नस ज्यादा खरीदते हैं फिर सर्वल ने एक नई मिश्र धातु को निकाला जोकि काफी सस्ती थी। यहीं से मिलनी शुरु हुई आविष्कार को सफलता।

विनीत हमेशा यही साबित करना चाहते थे कि व्यापार के साथ भी समाज की भलाई का काम हो सकता है।

आविष्कार ने न सिर्फ दूसरी कंपनियों के लिए निवेश किया बल्कि अपने लिए फंड बनाया। इसके बाद विनीत ने दुनिया भर का दौरा किया और निवेशक जुटाने शुरु किए। कुछ ही समय में आविष्कार 23 कंपनियों पर 16 मिलियन डॉलर निवेश कर चुकी है।

आज आविष्कार ग्रामीण उद्यमियों को लोन दे रहा है। ऐसे लोगों को जो कुछ नया करने की क्षमता रखते हैं। सन 2002 में विनीत ने इंट्लेक्चुअल कैपिटल नाम से एक कंपनी रजिस्टर्ड की थी। इंटलकैप एक अजीबोगरीब आइडिया था जिसे विनीत को उनके मित्र पवन मेहरा ने बताया था। एक ऐसी कंपनी थी जो बौद्धिक पूंजी में व्यापार करती थी। इंटलकैप को जल्द ही वर्ल्ड बैंक से एक हजार डॉलर प्रति महीने का करार मिल गया।

आविष्कार और इंटेलकैप का विस्तार तेजी से हुआ। कंपनी का फोकस सोशल इंवेस्टमेंट एडवाइजरी और सोशल कॉलेज मैनेजमेंट पर था। संक्षेप में कहा जाए तो आविष्कार का मकसद केवल मुनाफा अर्जित करना नहीं है बल्कि आविष्कार का काम उन कंपनियों को खड़ा करना है जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार दें।

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