सूखा प्रभावित महाराष्ट्र में यह 5 महिला उद्यमी उगा रही हैं सफलता की समृद्ध फसल

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36 वर्षीय शैलजा श्रीकांत नारोड अपनी 2 एकड़ भूमि पर जैविक खेती को बढ़ावा दे रही हैं। सब्जियों की 25 किस्मों को उगाकर वह सालाना 5 से 6 लाख रुपए कमाती हैं। शैलजा बताती हैं कि 25 साल की उम्र में उन्होंने खेती करना शुरू किया था, उनकी पहली फसल 2 किलो भिंडी थी।

35 वर्षीय शिल्पा राजेश विबुठे ने एक कब्रिस्तान के बगल में एक एकड़ जमीन पर अंगूर की खेती शुरू की। चार साल बाद वह एक अंगूर नर्सरी का मालिक हैं जहां छोटे पौधे उगाए जाते हैं और 6 से 8 रुपये प्रति पौधे के बीच बेचे जाते हैं।

मराठवाड़ा क्षेत्र जहां पानी, जमीन और आय दुर्लभ हैं, कुछ महिलाओं ने इन बाधाओं को उखाड़ फेंका है। पुणे स्थित एक एनजीओ ‘स्वयं शिक्षण प्रयोग’(एसएसपी) के सहयोग से इन महिलाओं ने कृषि की नई तकनीकों का उपयोग कर कमाई और सफलता की प्रेरणादायक कहानियों को रचा है।

64,525 वर्ग किलोमीटर के इस क्षेत्र में 57 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। फिर भी इस क्षेत्र के आठ जिले औरंगाबाद, जालना, परभानी, हिंगोली, बीड, नांदेड़, लातूर और ओस्मानाबाद देश के 100 सबसे गरीब जिलों में शामिल हैं। इतनी विषम पृष्ठभूमि के बाद भी यह पांच महिलाएं आशा और प्रेरणा की नई कहानियां सामने लेकर आई हैं। इनके बारे में हम आपको और बताते हैं:

2 किलो से 25 किस्मों का सफर

36 वर्षीय शैलजा श्रीकांत नारोड अपनी 2 एकड़ भूमि पर जैविक खेती को बढ़ावा दे रही हैं। सब्जियों की 25 किस्मों को उगाकर वह सालाना 5 से 6 लाख रुपए कमाती हैं। शैलजा बताती हैं कि 25 साल की उम्र में उन्होंने खेती करना शुरू किया था, उनकी पहली फसल 2 किलो भिंडी थी। साल 2010 में, उन्होंने 10 स्थानीय महिलाओं के साथ काम करते हुए स्वयं शिक्षण प्रयोग से 60,000 रुपये का ऋण लिया। आज, 40 मजदूरों की एक टीम उनके साथ खेतों में काम कर ऑर्गेनिक सब्जियों कि किस्मों में नए प्रयोग कर रही है।

कभी खेती के लिए नाजुक थी, पर अब नहीं

14 वर्ष की उम्र में, अर्चना गोकुल माने का विवाह एक किसान परिवार मे हुआ। जहां उन्हें खेती करने के लिए नाज़ुक बताकर, इससे दूर रखा गया। 17 वर्ष की उम्र में पहली बार माँ बनने के बाद उन्होंने आरोग्य सखी के रूप में काम शुरू किया और आज 9 लाख रुपए की वार्षिक आय के साथ ऑर्गेनिक खेती कर रही हैं।

2012 में अर्चना ने एसएसपी से आधा एकड़ भूमि किराए पर ली और 17,000 रुपये के निवेश के माध्यम से मिर्च, बैंगन और आलू उगाकर 3 महीने में ही 1,43,000 रुपये कमाए। अर्चना अब अपनी दो एकड़ की भूमि पर मूंग, तुअर, हराभरा(चना) और टमाटर के साथ कई सब्जियां उगाती हैं। आज खेती में नवीन प्रयोगों के साथ अर्चना 17 विभिन्न गांवों की महिलाओं को प्रशिक्षण देने का काम भी करती हैं।

लगन से मिला राष्ट्रीय पुरस्कार

1999 में, हिंगलाजवाड़ी में एसएसपी ने एक सभा आयोजित कर वहां की महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया। यहां से प्रशिक्षण के बाद कमल विष्णु कुंभ ने कांच की चूड़ियों का निर्माण शुरू किया। इसके बाद 2015 में, कमल ने 1,40,000 रुपये का ऋण लिया और बकरी पालन व पोल्ट्री फार्म की शुरूआत की। आज कमल एक हैचिंग मशीन, ऑर्गेनिक सब्जियों के उत्पादन, मत्स्यपालन के लिए तालाब और जैविक खाद विनिर्माण इकाई के साथ 30 लाख रुपए तक की सालाना आय तक स्थापित कर चुकी हैं।

2017 में, सीआईआई फाउंडेशन के अन्तर्गत महिला इन्नोवेटर के रूप में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए कमल को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। हाल ही में उन्हें नीति आयोग और फिक्की द्वारा भी सम्मान दिया गया था, जिसे उन्होंने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से प्राप्त किया।

स्वयं सहायता समूह, जो बन गया ब्रांड

2011 में ऑर्गेनिक खेती को चुनौतीपूर्ण कार्य मानने वाली रेवती के लिए अब यह काफी आसान हो चला है। शुरुआत में रेवती ने पट्टे पर 3 एकड़ जमीन को 10 साल के लिए लीज पर लिया। पहले एक एकड़ पर ज्वार, गेहूं और मूंग के संयोजन का मॉडल प्रयोग किया और फिर इसे 2 एकड़ पर ले गईं। अब उन्होंने अपनी खेती को 3 से 5 एकड़ तक बढ़ाकर सोयाबीन और कपास को भी जोड़ लिया।

इसके अलावा 2013 में, रेवती ने 10,000 रुपये का ऋण लेकर हल्दी और मिर्च पाउडर बनाना शुरू कर किया। आज वह नांदेड़ जिले में 20 महिलाओं की एक टीम के साथ काम कर रही हैं।

प्रतिस्पर्धा के लिए बिल्कुल तैयार

35 वर्षीय शिल्पा राजेश विबुठे ने एक कब्रिस्तान के बगल में एक एकड़ जमीन पर अंगूर की खेती शुरू की। चार साल बाद वह एक अंगूर नर्सरी का मालिक हैं जहां छोटे पौधे उगाए जाते हैं और 6 से 8 रुपये प्रति पौधे के बीच बेचे जाते हैं।

पिछले साल, उन्होंने एसएसपी से 2 लाख रुपये का ऋण लिया और चार गायों को खरीदा। आज ये गायें हर दिन 27-30 लीटर दूध देती हैं, पास की डेयरी में बेची जाती है। डेयरी फार्म का प्रबंधन आठ मजदूरों द्वारा किया जाता है। शिल्पा बताती हैं कि सिर्फ मेहनत से कुछ नहीं होता, उनके परिवार का समर्थन काफी मायने रखता है। 

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