...कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है!

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भारतीय समाज 'न्यायधीश की बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक चरित्र को, 'स्त्री के कौमार्य और पवित्रता' की तरह ही देखता-समझता है। अगर संविधान के रक्षकों पर ही, स्त्री अस्मिता के भक्षक बनने के गंभीर आरोप (सही या गलत) लग रहे हैं, तो यह अपने आप में बेहद संगीन है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
 जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में बलात्कार के मामलों पर निर्णय आने की स्थिति अत्यन्त दयनीय हैं, यहां पर भी सर्वाधिक 15,926 मामले उत्तर प्रदेश की अदालतों में अटके पड़े हैं।

मोटे तौर पर भारतीय समाज लैंगिक पहचान के प्रति असंवेदनशील है जिसमें पुरुष पितृसत्तात्मक मूल्यों से लाभान्वित होते रहे हैं। हमारे ज्यादातर कानून महिलाओं को उनकी पारम्परिक भूमिकाओं में ही देखना चाहते हैं।

अवधी लोकगीतकार कैलाश गौतम की लिखी गई ये पंक्तियां, 'कचहरी तो बेवा का तन देखती है, कहां से खुलेगा बटन देखती है' कचहरी परिसर में न्याय की आस और चाह में भटकती औरत के बारे में इन्साफ के मरकज की सोच को बखूबी बयां कर रही हैं। विडम्बना है कि प्रगतिशीलता के राजमार्ग पर दौड़ने का दम भरते 21वीं सदी के भारतीय समाज में आज भी औरत की हैसियत दोयम दर्जे के नागरिक से ज्यादा नहीं है। आज भी औरत बाबुल के आंगन से लेकर साजन की डेहरी तक बन्दिशों में जकड़ी है। कभी वह हिंसा के घरेलू स्वरूप से प्रताड़ित  होती है तो कभी पुरुष अधिनायकवाद के क्रीत-कर्म का शिकार बन तिल-तिल मरने को मजबूर की जाती है।

अव्वल तो औरत का खुद पर हुए जुल्म के खिलाफ मुंह खुलता नहीं और खुल जाये तो इन्साफ के मन्दिर में न्याय की उम्मीद लेकर बरसों बरस भटकती औरत को सैकड़ों बार दृष्टि-दुराचार से गुजरना पड़ता है। आपको याद होगा, राजधानी के बहुचॢचत आशियाना गैंगरेप काण्ड की। न्यायपालिका की विडम्बना देखिये कि कानून की दुनिया में लगभग नजीर बन चुके गैंगरेप के इस मामले में 10 साल तो गौरव शुक्ला की उम्र ही निर्धारित करने में लग गये कि वह नाबालिग है अथवा बालिग। अब सभी पीडि़ताओं में आशियाना गैंगरेप काण्ड की पीडि़ता जैसा संकल्प, आत्मविश्वास, जिजीविषा, हौसला और प्रताड़ना सहने का माद्दा नहीं होता है लिहाजा इन्साफ की राह में कायम इतने तवील अन्धेरों में सभी को मंजिल नहीं मिल पाती है।

पीड़िता ने इंसाफ पाने के बाद सजल नेत्रों से कहा था कि सुनवायी के दौरान न जाने कितनी बार लोगों की नजरों से अपमानित होना पड़ा था। बलात्कार पीड़िता  से पहला सवाल होता है कि, क्या पहले उतारा था-जींस या शर्ट? कहां क्या किया था? कई-कई बार अनेक अधिकारियों के सामने (कानून में मना होने पर भी) पीड़िता बोलते-बोलते थक जाती है। अधिकारी नहीं थकते। आम महिला की तो बात छोड़िए भारत की शीर्ष प्रशासनिक सेवा की महिला प्रशिक्षु अधिकारी रिजु बाफना ने यौन उत्पीड़न की शिकायत के सन्दर्भ में अदालत में अपना बयान दर्ज कराने के दौरान झेली मुश्किलों का हवाला फेसबुक पर देते हुए बताया कि यौन अपराध के मामलों में अदालत को किसी महिला शिकायतकर्ता के लिए जैसी संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी, वह नदारद थी।

न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराते समय एक वकील ललित शर्मा उनके साथ ही खड़े सारी बातें सुन रहे थे। उनके अलावा कई और लोग भी उस समय अदालत में मौजूद थे, जिससे उन्हें बयान देने में काफी सकुचाहट महसूस हो रही थी। उन्होंने जब मजिस्ट्रेट से बाकी लोगों को वहां से हटाने का अनुरोध किया, तो पास खड़े वकील शर्मा ने डांटते हुए उन्हें याद दिलाया कि वे अफसर होंगी कहीं और की, कोर्ट में उनकी नहीं चलेगी। बफना ने साफ किया कि वह एकान्त की मांग अधिकारी नहीं बल्कि एक महिला होने की हैसियत से कर रही हैं और कानून में इसकी व्यवस्था भी है।

तमाम संवैधानिक अधिकारों से यथा-समानता, जीने का अधिकार, सम्मान के साथ जीने का अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता (शिक्षा, अपनी पसंद का विवाह आदि) का अधिकार, शरीर को किसी चोट, अपमान से बचाने का अधिकार होने के बावजूद स्त्री असुरक्षित है तो बस पुरुष के इस मानसिकता के कारण जो हर जगह व्याप्त है-इन्साफ के क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में, साहित्य के क्षेत्र में, कम ही संख्या में सही शिक्षक बच्चियों को बच्ची नहीं समझते, साहित्यकार तक अपने लेखन, सम्पादन में स्त्री के प्रति क्रूरता में सारी हदें पार कर जाते हैं। यह सच है कि आज जो भी सुरक्षा स्त्री को मिली है, वह भी न्याय की तरफ से ही वरना परिवार, समाज, राजनीतिज्ञ तो उसकी मिट्टी पलीद करने में ही लगे हैं।

किन्तु यह भी विडम्बनापूर्ण परन्तु आश्चर्यजनक सत्य है कि समाज के सर्वश्रेष्ठ और संदेह से परे तक सम्मानित माने-समझे जाने वाले क्षेत्र न्यायपालिका से भी, महिलाओं के देह-दमन के अशोभनीय समाचार निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। न्याय के प्रांगण से बचाओ...बचाओ की चीख-चिल्लाहट, अस्मत के बदले इंसाफ की दास्तां या किसी न्यायमूर्ति द्वारा नौकरी पाने-बचाने की ऐसी शर्मनाक शर्तें सचमुच गंभीर चेतावनी है। न्यायालय तो न्याय का मंदिर है और न्यायाधीश न्याय की देवी का पुजारी, आराधक और साधक। उसका चिंतन, आचरण और कृति जिस आसन पर वह बैठता है उसके आदर्श और अपेक्षाओं के अनुरूप होना ही उसे न्यायाधीश का बाना पहनने का अधिकारी बनाता है। किंतु जस्टिस गांगुली से लेकर जस्टिस दत्तू तक के दामन पर यौन उत्पीडऩ की पड़ी छीटों ने आम आदमी के विश्वास को हिला दिया है।

दीगर है कि यह न्यायाधीश तो एक स्तर, एक मुकाम हासिल कर चुके हैं, यहां तो न्यायपालिका में यौन दुर्व्यवहार की हालत तो ऐसी हो गई है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट को महिला प्रशिक्षु न्यायाधीश से दुर्वयवहार करने के आरोप में 11 प्रशिक्षु न्यायाधीशों को बर्खास्त करने की सिफारिश करनी पड़ती है। इन प्रशिक्षु न्यायाधीशों ने महिला से छेड़छाड़ के बाद सार्वजनिक रूप से हंगामा भी किया था। जिन्हें लोग भगवान की तरह देखते हों, ऐसे न्यायाधीशों को आरोपों से घिरते देखने पर उनका चिंतित होना स्वाभाविक है।

भारतीय समाज 'न्यायधीश की बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक चरित्र को, 'स्त्री के कौमार्य और पवित्रता' की तरह ही देखता-समझता है। अगर संविधान के रक्षकों पर ही, स्त्री अस्मिता के भक्षक बनने के गंभीर आरोप (सही या गलत) लग रहे हैं, तो यह अपने आप में बेहद संगीन है। न्याय मंदिरों के 'स्वर्ण कलश ही कलुषित होने लगे, तो फिर लज्जा कहां फरियाद करेगी? अब जब महिला जज और वकील स्वयं को असुरक्षित और असहज महसूस कर रही हैं तो आम महिला पीडि़ता की क्या बिसात होगी?

कह सकते हैं कि व्यवस्था के चलन के मुताबकि दर्द, आंसू, कराह, बदनामी, ताने, तिजारत, प्रलोभन और धमकियों के तेजाबी सैलाब को पार करने का माद्दा हो तो महिला इन्साफ के बारे में सोचे वरना हादसा या बुरा ख्वाब समझ लेने में ही भलाई है क्योंकि बलात्कार समेत महिलाओं के यौन उत्पीडऩ के मामलों पर विधि एवं न्याय मन्त्रालय से मिले आंकड़ों पर नजर डालें तो 23 राज्यों के उच्च न्यायालयों में लम्बित 32,080 मामलों में सबसे ज्यादा 8,215 रेप के मामले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लम्बित हैं। जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में बलात्कार के मामलों पर निर्णय आने की स्थिति अत्यन्त दयनीय हैं, यहां पर भी सर्वाधिक 15,926 मामले उत्तर प्रदेश की अदालतों में अटके पड़े हैं।

कहा जाता है कि न्याय में विलम्ब भी अन्याय है। तो हमारी सूबे की अदालतें भी अन्याय कर रही हैं। कचेहरी जहां के बारे में कहा जाता है कि, कचेहरी तो बेवा का तन देखती है, कहां से खुलेगा बटन देखती है। पुलिस थाना जहां दुराचार पीड़िता का निगाहों से ही कई बार बलात्कार हो जाता है और समाज, जिसकी मर्दानगी के किस्से एनसीआरबी के आंकड़ों में दर्ज हैं, उसके बरक्स इन्साफ की कांपती लौ सुव्यवस्थित अव्यवस्था के थपेड़ों के दरम्यान हव्वा की बेटियों को इन्साफ कैसे मिलेगा? सवाल मुकदमों के जल्द निपटारों का तो है ही किन्तु उससे बड़ा सवाल है न्यायालय के वातावरण का, जहां पर औरत खुद को बाजार से भी ज्यादा असहाय पाती है।

मोटे तौर पर भारतीय समाज जेण्डर के प्रति असम्वेदनशील है जिसमें पुरुष पितृसत्तात्मक मूल्यों से लाभान्वित होते रहे हैं। हमारे ज्यादातर कानून महिलाओं को उनकी पारम्परिक भूमिकाओं में ही देखना चाहते हैं। स्त्रीत्व और मातृत्व के आदर्शों पर खरी न उतरने वाली महिलाओं को समाज के साथ विधि अदालतों में भी अपमानित किया जाता है। इन सबसे अपने हक के लिए लड़ रही और न्याय की आस लगाये महिलाओं की हिम्मत टूटने लगती है। उनका डर तब और बढ़ जाता है जब वह परम्परागत अदालतों के डरावने माहौल को देखती है जहां की न्यायिक प्रक्रिया लम्बी और तकनीकी होती है और वकील मोटी फीस वसूलते हैं।

पारम्परिक अदालतों में महिलाओं के व्यक्तित्व और चरित्र पर कीचड़ उछाला जाता है। आपराधिक मामलों में वकील महिला को भरमाने की कोशिश करते हैं, फिजूल के सवाल पूंछकर उसे बेइज्जत करते हैं और कई बार उससे घटनाओं को बार-बार बताने के लिए कहते हैं। अदालतों के बाहर कई प्रकार के चोर-उचक्के, डाकू, बलात्कारी, जुआरी, तस्कर, रिश्वतखोर तथा कातिल आदि पेशेवर मुजरिम खड़े होते हैं। उसी स्थान पर अविवाहित लड़कियां, विधवायें, तलाक के केस से सम्बन्धित औरतें, जमीन-जायदाद या बच्चे की कस्टडी के झगड़े को लेकर महिलायें भी उपस्थित होती हैं, इस अवसर पर कुछ अपराधी किस्म के लोग, उन पर फब्तियां कसने, अश्लील इशारे करने से बाज नहीं आते।

ऐसी औरतों के साथ उन के घर की कोई न कोई अन्य औरत भी आई होती है। ये पहले ही अपने साथ हुए अत्याचार व अन्याय के कारण दुखी होती है, फिर ऐसे पेशेवर अपराधी किस्म के लोगों के हाथों, अदालतों में आकर भी, मानसिक तथा शारीरिक टॉर्चर का शिकार होती हैं। ऐसे लोगों को इन जलील हरकतों से रोकने या उन पर निगाह रखने के लिए किसी जिन्दा सीसीटीवी कैमरे का प्रबन्ध नहीं होता। अदालती परिसर में कई बार एक दूसरे की जान की दुश्मन बने पक्षों की सुरक्षा का भी कोई इन्तजाम नहीं होता। इसीलिए कभी-कभी अदालतों के बाहर मुवक्किलों अथवा गवाहों को जान से मार देने की खबरें भी पढऩे-सुनने को मिल जाती हैं।

इस प्रकार की अदालतों के बाहर सारा-सारा दिन खड़े रहना किसी सजा से कम होता है। केवल बैठने की व्यवस्था की ही बात नहीं, अमूमन अदालतों के बाहर न पीने वाले पानी की व्यवस्था होती है और न ही शौचालयों की। मर्द तो फिर भी इधर-उधर दीवारों अथवा पेड़ों की आड़ में काम चला लेते हैं पर औरतों के लिए यह बहुत गम्भीर समस्या होती है, अगर उनके साथ छोटे बच्चे भी आये हों तो उन की हालत और भी दयनीय हो जाती है। गौरतलब है कि अगर स्कूल, कॉलेजों में अलग लेडीज स्टाफ रूम, रेलगाड़ी में महिलाओं के लिए अलग कम्पार्टमेन्ट, यहां तक कि रेलवे स्टेशनों व बस स्टैण्ड, एयरपोर्ट पर महिलाओं के लिए अलग विश्राम/ प्रतीक्षालय तथा सीटों का प्रबन्ध होता है। तो फिर इन अदालतों में प्रताडि़त औरतों व बच्चों के लिए अलग व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

यदि मुकदमा दर्ज करते समय हरेक व्यक्ति से कोर्ट फीस प्राप्त की जाती है तो फिर वहां मजबूरी के मारे आने वालों के लिए आवश्यक सुविधायें क्यों नहीं प्रदान की जाती? आम अदालतों के ये अनुभव बेहद कड़वे होते हैं इसलिए महिलाओं के लिए न्याय की लड़ाई को कम कष्टप्रद बनाने के लिए ऐसे मंच की जरूरत महसूस की गयी जहां महिलायें बेझिझक स्वयं प्राधिकरणों के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकें। इस तरह महिला अदालतें बनीं।

देश में पहली महिला अदालत आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने हैदराबाद में 1987 में खोली जिसमें एक महिलाओं के अपहरण, उसकी गरिमा को क्षति पहुंचाने और बलात्कार जैसे अपराधों की सुनवाई हो सकती थी। पीठासीन अधिकारी एक महिला उपन्यायाधीश को बनाया गया था। इसका पदनाम 'अतिरिक्त- मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट -सह-सहायक सत्र न्यायाधीश' रखा गया। इस अदालत की सफलता से उत्साहित होकर देश के अन्य भागों में भी दिल्ली समेत महिला अदालतें स्थापित की गयीं। 1994 में महिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में महिला अदालतें खोली गयीं।

हालांकि महिला अदालतों को महिलाओं के लिए विशेष मंच के तौर पर बनाया गया था लेकिन आम अदालतों के परिसर में स्थित होने के कारण इनसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाये। महिला अदालतों में भी दूसरी अदालतों की तरह भीड़-भाड़ रहती है। आम अदालतों की तरह महिलाओं को जगह के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ती है, लोग उन्हें घूरते हैं। इसके अलावा कोर्ट रूम में बहुत सारे लोगों की मौजूदगी उन्हें अपना बयान देने में असहज बना देती है क्योंकि समाज का एक बड़ा तबका उन्हें चरित्रहीन या घर-फोड़ू महिला के तौर पर देखता है।

कई बार जब न्यायाधीश नहीं आते तो उनके मामले को आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाली दूसरी अदालतों में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। सरकारी वकीलों पर काम का दबाव ज्यादा होता है। लोगों की समझ में सरकारी वकील अयोग्य होते हैं और उन्हें विपक्ष आसानी से खरीद सकता है। महिलाओं के लिए सबूत या गवाह लाना मुश्किल होता है क्योंकि उनके खिलाफ ज्यादातर अपराध बन्द कमरों में होते हैं और उनमें घर के लोग शामिल होते हैं। ऐसी स्थिति में वह कई बार केस हारने के कगार पर पर होती है क्योंकि विधि सन्देह से परे प्रमाणों की मांग करती है।

कई जज भी स्वयं उन पर समझौता और तालमेल बनाने का दबाव बनाते हैं। और तब उस महिला पीडि़ता को समझ आता है कि बिकता है इंसाफ यहां अदालत में, यहां मुकदमों की तारीखें बिकती हैं। अदालतों की तो दीवारें भी पैसे मांगती हैं। दरअसल इंसाफ की तिजारत में जज को बगैर सेट किये काम नहीं पूरा हो सकता है। लेकिन जज तक पैसा पहुंचने का रास्ता नीचे से ही हो कर जाता है। लिहाजा कचेहरी पीडि़ता से हर स्तर पर नजराने की ख्वाहिश रखती है। वो चाहे महिला अदालत हो या कि पारम्परिक अदालत, कोई फर्क नहीं पड़ता। अब सवाल है कि कचेहरी बदलेगी कैसे?

अदालत के बदलने का सबसे सार्थक मापदंड न्याय प्राप्ति की राह में सहजता और पारदर्शिता के प्रतिशत का उत्तरोत्तर बढऩा है। न्यायाधीश ही केंद्र है, वही परिधि और वृत है न्यायालय के सम्मान की स्थापना का। आदर्श न्याय की स्थिति से ही यह संभव है। आदर्श न्याय को स्पष्ट करने के लिए मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है। एक भक्त ने रामचरित मानस के मर्मज्ञ से पूछा-जयन्त ने तो सीता के पांव पर चोंच से प्रहार किया था, उसने सीता को चोट पहुंचाई किन्तु भगवान राम ने उसे केवल एक आंख लेकर छोड़ दिया। दूसरी ओर रावण ने सीता का अपहरण तो किया लेकिन लंका के सुन्दर उपवन में महिला रक्षकों की निगरानी में रखा। रावण ने सीता से अनुनय-विनय तो की, प्रलोभन भी दिये किन्तु अपनी बात मनवाने के लिए कभी बल प्रयोग नहीं किया, फिर भी भगवान राम ने उसके प्राण ले लिए। जयन्त को केवल दण्ड, किन्तु रावण को प्राणदण्ड क्यों?

तब कथा मर्मज्ञ ने जवाब दिया कि जयंत ने कौवे का वेश धारण कर सीता पर चोंच से प्रहार किया जो कौवे का स्वभाव है किन्तु रावण ने साधू का वेश धारण कर सीता का अपहरण किया और इस प्रकार रावण ने साधू के वेश की मर्यादा का उल्लंघन किया। रावण का अपराध बड़ा है, जयंत का छोटा। इसलिए रावण को कठोर दंड मिला। सार यह है कि आम आदमी का नैतिकता एवं उत्कृष्ट आचरण के पथ से भटकना उतना गम्भीर नहीं जितना एक न्यायाधीश का भटकना। न्यायालय के भीतर और बाहर वह जहां भी है, आदर्श के ऊंचे मानदंडों का पालन-अनुसरण उससे अपेक्षित है। न्यायाधीश की निष्पक्षता और नैतिकता का संदेह से परे होना अपरिहार्य है। गर ऐसा संभव हो पाया तब तो सत्यमेव जयते अन्यथा कवि तो गा ही रहा है कि

कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है, भला आदमी किस तरह से फंसा है,

कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है, उसी की कसम लो जो हाजिर नहीं है।

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