यूपी से बेंगलुरु आकर गोलगप्पा बेचने वाले तमाम नौजवानों की कहानी

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गोलगप्पों को आप चाहे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मान लीजिए या फिर कम साफ-सफाई में तैयार होने की वजह से पेट के लिए नुकसानदायक, मगर इन गोलगप्पों का टेस्ट ऐसा होता है कि लोग इन सब बातों की परवाह किए बगैर इनकी तरफ खिंचे चले आते हैं। उबले हुए आलू, मिर्च और मसाले के साथ भरे गोलगप्पों का टेस्ट लाजवाब होता है। लेकिन दिखने में काफी छोटा बिजनेस इतना आसान भी नहीं है। आईये मिलें कुछ ऐसे ही नौजवानों से जो यूपी की गलियों को छोड़ कर बैंगलोर की सड़कों पर गोलगप्पे बेच रहे हैं...

30 वर्षीय उत्तर प्रदेश से बेंगलुरु आये अनिरुद्ध।
30 वर्षीय उत्तर प्रदेश से बेंगलुरु आये अनिरुद्ध।
क्या आपको मालूम हैं गोलगप्पे बेचने वालों को कमाई का पूरा पैसा अपने मालिक को देना होता है। चाहे वे 100 रुपये कमाएं या फिर 500 रुपये। उनका मालिक ही उन्हें गोलगप्पे बनाने की पूरी सामग्री देता है, लेकिन ठेले लगाने के एवज में जगह देने के लिए पुलिस को हफ्ता ठेले लगाने वाले ही देते हैं।

नजाने कितने प्रवासी अपने गांव को छोड़कर यहां बेंगलुरु में गोलगप्पे बेचने का काम करते हैं। ये सभी दुकानदार हर 3-4 महीने में अपने घर वापस घूमने के लिए जाते हैं और वहां से किसी न किसी साथी को इसी धंधे में शामिल कराने के लिए ले आते हैं। बेंगलुरु जैसे शहर की चमक-धमक और आसानी से काम मिल जाने की वजह से तमाम युवा इस पेशे की ओर खिंचे चले जाते हैं।

30 साल के अनिरुद्ध उत्तर प्रदेश के इटावा जिले से बेंगलुरु सिर्फ घूमने और देखने आए थे। वह किसी मजबूरी या असहाय होकर नहीं बल्कि अपने पैशन के लिए गोलगप्पे बेचते हैं। उन्हें बेंगलुरु में गोलगप्पे बेचने का कोई आइडिया नहीं था। उनके एक दोस्त ने उनसे यह काम करने को कहा और वह लग गए। वह कहते हैं, 'गोलगप्पे बेचकर मेरा कोई नुकसान नहीं हो रहा है। मैं घूमता भी हूं और गोलगप्पे भी बेचता हूं, दोनों काम एक साथ होते हैं।' 

अनिरुद्ध की ही तरह कई सारे प्रवासी बेंगलुरु में किसी 'मालिक' के अंडर गोलगप्पे बेचते हैं। ये मालिक उन्हें गोलगप्पे बेचने की पूरी सुविधा देने के साथ ही रहने और खाने का भी इंतजाम करते हैं।

गोलगप्पों को आप चाहे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मान लीजिए या फिर कम साफ-सफाई में तैयार होने की वजह से पेट के लिए नुकसानदायक, मगर इन गोलगप्पों का टेस्ट ऐसा होता है कि लोग इन सब बातों की परवाह किए बगैर इनकी तरफ खिंचे चले आते हैं। 

उबले हुए आलू, मिर्च और मसाले के साथ भरे गोलगप्पों का टेस्ट लाजवाब होता है। लेकिन दिखने में काफी छोटा बिजनेस इतना आसान भी नहीं है। बेंगलुरु के एमजी रोड पर गोलगप्पे का ठेला लगाने वाले अनिरुद्ध बताते हैं, 'हमारी रोज की दिनचर्या सुबह 5 बजे से आलू उबालने के साथ ही शुरू हो जाती है। इसके बाद हम इन पूरियों (गोलगप्पों) को तेल में तलकर तैयार करते हैं। मालिक हमें हर महीने 4,000 रुपये देता है। हम चार लोग एक साथ रहते हैं और एक ही काम करते हैं।'

यूपी के दिपक 20 रूपये में 6 पूरी बेचकर 5,000 रुपये महीना कमाते हैं।
यूपी के दिपक 20 रूपये में 6 पूरी बेचकर 5,000 रुपये महीना कमाते हैं।

मॉनसून का सीजन आने के साथ ही अनिरुद्ध अपने भविष्य को लेकर चिंतित भी हैं। बारिश के मौसम में गोलगप्पे गीले हो जाते हैं और ग्राहकों की संख्या भी कम हो जाती है। हालांकि कुछ विक्रेता ऐसे भी होते हैं जो छतरी लगाकर बारिश से बचने का जुगाड़ भी कर लेते हैं।

मगर इन गोलगप्पे बेचने वालों को कमाई का पूरा पैसा मालिक को देना होता है। चाहे वे 100 रुपये कमाएं या 500 रुपये। मालिक ही उन्हें गोलगप्पे बनाने की पूरी सामग्री देता है। हालांकि ठेले लगाने के एवज में जगह देने के लिए पुलिस को हफ्ता यही ठेले लगाने वाले ही देते हैं। अनिरुद्ध बताते हैं, 'यह बहुत ही भीड़-भाड़ वाला इलाका है इसलिए हमें रोज पुलिस वालों को 60 रुपये हफ्ता (घूस) देना पड़ता है। इसके बाद ही हमें ठेला लगाने दिया जाता है। इससे हमें कोई समस्या भी नहीं होती।

मॉनसून का सीजन आने के साथ ही अनिरुद्ध अपने भविष्य को लेकर चिंतित भी हैं। बारिश के मौसम में गोलगप्पे गीले हो जाते हैं और ग्राहकों की संख्या भी कम हो जाती है। हालांकि कुछ विक्रेता ऐसे भी होते हैं जो छतरी लगाकर बारिश से बचने का जुगाड़ भी कर लेते हैं।

अजय, जिला जालौना, उत्तर प्रदेश।
अजय, जिला जालौना, उत्तर प्रदेश।

उत्तर प्रदेश के ही जालौन जिले के रहने वाले 30 साल के अजय एक छतरी लगाकर अपने ठेले पर आराम कर रहे हैं। वह इस काम को अपने और मालिक दोनों के लिए फायदेमंद बताते हैं। अजय के मुताबिक, 'मैं हर महीने 6,000 रुपये कमा लेता हूं। रहने और खाने का पूरा खर्चा मेरा मालिक उठाता है। यहां तक कि वह गांव में मेरे बच्चों की फीस भी देता है।' अजय बताते हैं कि उनके गांव और यहां के गोलगप्पों के दाम में काफी अंतर है। गांव में जहां 10 रुपये के 8 गोलगप्पे मिलते हैं वहीं बेंगलुरु में 25 रुपये के सिर्फ 6 गोलगप्पे मिलते हैं।

हालांकि अजय को बाकी दुकानदारों की तरह पुलिस को हफ्ता नहीं देना होता। वह बताते हैं कि अगर कोई लंबे समय से किसी जगह पर दुकान लगा रहा है तो वहां फिर कोई दूसरा गोलगप्पे वाला नहीं आता। इलाहाबाद के मेजा के रहने वाले 24 साल के वीरेंद्र बाकी दुकानदारों से अलग खुद के लिए काम करते हैं। उन्हें किसी मालिक को पैसे नहीं देने होते। अजय बताते हैं कि इससे उन्हें हर महीने 15,000 रुपये के आस-पास आमदनी हो जाती है। उनका पूरा परिवार ही इस बिजनेस में है।

अनिरुद्ध बताते हैं कि वह रक्षाबंधन तक ही यहां हैं उसके बाद वे घर घूमने के लिए चले जाएंगे, क्योंकि अभी मालिक के पास लड़कों की कमी है। ऐसे ही नजाने कितने प्रवासी अपने गांव को छोड़कर यहां बेंगलुरु में गोलगप्पे बेचने का काम करते हैं। ये सभी दुकानदार हर 3-4 महीने में अपने घर वापस घूमने के लिए जाते हैं और वहां से किसी न किसी साथी को इसी धंधे में शामिल कराने के लिए ले आते हैं। 

बेंगलुरु जैसे शहर की चमक-धमक और आसानी से काम मिल जाने की वजह से तमाम युवा इस पेशे की ओर खिंचे चले जाते हैं। तो अगली बार आप जब कभी इन दुकानदारों के पास जाएं तो इनसे थोड़ा सा मुस्कुराकर बात जरूर करें, क्योंकि इनके संघर्ष बहुत बड़े हैं, जो गोलगप्पे के चटपटे पानी में घुल कर हमें ये सोचने ही नहीं देते कि हां इसमे भी किसी की कड़ी मेहनत बी लगी है।

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