बलबीर सिंह पुण्यतिथि विशेष: 'रंग' के बाद सँवारेगा कौन महफ़िल को!

हिंदी कविता के प्रतिष्ठित सर्जक बलबीर सिंह 'रंग' की पुण्यतिथि पर विशेष...

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भारत का गांवों का देश, किसानों का देश, रंग जी गांव के, किसान परिवार के कवि लेकिन अपनी ओजस्वी रचनाओं से, छायावाद की मासूम-मांसल वृत्ति-प्रवृत्ति को मंचों से बार-बार झकझोरते, झटके पर झटके देते रहे इस जन-गण-मन के प्यारे कवि ने स्वतंत्रता संग्राम को मुखर स्वर ही नहीं दिया, उससे गहरे सरोकार भी रखे। हिंदी कविता के प्रतिष्ठित सर्जक बलबीर सिंह 'रंग' की आज पुण्यतिथि है।

बलबीर सिंह रंग (फाइल फोटो)
बलबीर सिंह रंग (फाइल फोटो)
 रंग जी की वे रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। रंग जी और उनके बाद की पीढ़ी ने गीत को केवल गीत समझकर जिया। उनके समकालीन और उनकी अँगुली पकड़कर मंच पर चढ़े अनेक गीतकार शिल्प और कथ्य की दृष्टि से रंग जी तक नहीं पहुंच सके।

देश के अतिप्रतिष्ठित कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह 'रंग' की आज (8 जून) पुण्यतिथि है। रंग जी के व्यक्तित्व और कृतित्व में अनूठा साम्य रहा है। वह उस धारा के गीत-कवि रहे हैं, जो गीत उत्तर छायावाद के बाद रचे गए। उस समय के प्राय: समस्त गीत-कवियों का छंद-विधान समरूप होते हुए भी भाव-पक्ष और भाव-भूमि पृथक-पृथक रही। रंग जी ने हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के साथ मुक्तक भी रचे लेकिन उनके गीत खाटी बोलचाल की भाषा में रचे गए। उन गीतों में संप्रेषण का टटकापन बना रहा। वैसे भी उस दौर के कवि सृजन को अपने जीवन में भी जिया करते थे।

आज, जब भी रंग जी के बाद की पीढ़ी के गीत-कवियों के नामों की चर्चा होती है, उनमें से कई एक को रंग-स्कूल छात्र माना जाता है। हिंदी-उर्दू रचना-समग्र के भविष्य पर सवाल उठाते हुए रंग जी लिखते हैं - 'रंग के बाद सँवारेगा कौन महफ़िल को, कोई तो नाम बताओ, बड़ी कृपा होगी।' रंग जी अपनी पीढ़ी के उन गिने-चुने कवियों में रहे हैं, जिन्होंने हिंदी गीत को मुहावरेदारी से बचाकर मौलिक चिंतन का आधार दिया। वह जितना अपनी रचना-शक्ति की वजह से जाने, पहचाने गए, उतने ही मंचों पर अपनी सशक्त प्रस्तुतियों के कारण प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। उनका एक गीत है - 'बन गई आज कविता मेरी'। उसकी कुछ पंक्तियां देखिए -

युग के आहत उर की पीड़ा बन गई आज कविता मेरी ।
अपने मानव की परवशता मैंने कवि बन कर पहचानी,
दुख-विष के प्याले पीकर ही तो सुख मधु की मृदुता जानी,
संघर्षों के वातायन से- मैंने जग का अंतर झाँका,
जग से निज स्वार्थ कसौटी से मेरी निश्छलता को आँका,
जग भ्राँति भरा, मैं क्राँति भरा जग से कैसी समता मेरी,
युग के आहत उर की पीड़ा बन गई आज कविता मेरी।

'रंग' जी का जन्म एटा (उ.प्र.) के गांव नगला कटीला में 14 नवंबर 1911 को एक किसान परिवार में हुआ था। की पारंपरिक शिक्षा किसी विश्वविद्यालय में नहीं हुई किंतु उनके गंभीर अध्ययन की छाया उनकी कविताओं में देखी जा सकती है। पाँच दशकों तक वे मंचों पर गीत और ग़जल के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में छाए रहे। उनके बाद ख्यात कवि रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी, गोपालदास नीरज, भारत भूषण, मुकुटबिहारी सरोज आदि हिंदी के लोकप्रिय कवि के रूप में सामने आए। जिन दिनो रंग जी की महफिलें आबाद हुआ करती थीं, उसी दौर में हिंदी गीत के विख्यात हस्ताक्षर गोपाल सिंह नेपाली का भी मंचों पर बड़ा रंग था।

रंग जी को खुदे के अच्छे गीतकार होने का कोई गर्व नहीं था, लेकिन वह सृजन के स्वाभिमान से कभी विरत नहीं रहे। वह लिखते भी हैं - 'मैं परंपरागत किसान हूँ, धरती के प्रति असीम मोह और पूज्य-भावना किसान का जन्मजात गुण है, यही उसकी शक्ति है और यही उसकी निर्बलता। मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझमें भी यही संस्कार सबसे प्रबलतम रूप में रहा है। ग्रामीण जीवन की वेदनाएँ, विषमताएँ और हास-विलास दोनों ही मेरी कविता की प्रेरणा और पूँजी हैं।' उनकी एक चर्चित कविता है, 'तुम्हारे गीत गाना चाहता हूँ' -

चाहता हूँ मैं तुम्हारी दृष्टि का केवल इशारा,
डूबने को बहुत होता एक तिनके का सहारा,
उर-उदधि में प्यार का तूफ़ान आना चाहता है,
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।
एक योगी चाहता है बाँधना गतिविधि समय की,
एक संयोगी भुलाना चाहता चिंता प्रलय की,
पर वियोगी आग, पानी में लगाना चाहता है,
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

पुस्तक के रूप में रंग जी की रचनाएँ चौथे दशक में ही आ चुकी थीं। 1950 के बाद जब नई कविता और नवगीत आकार ले रहे थे, तब मंचों पर रंग जी का जनवादी स्वर गूँज रहा था। यथार्थवादी धरातल पर साफ़-सुथरी भाषा का ओज तब कितना संप्रेषणीय और प्रासांगिक था, आज उसकी कल्पना कठिन है। रंग जी की वे रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। रंग जी और उनके बाद की पीढ़ी ने गीत को केवल गीत समझकर जिया। उनके समकालीन और उनकी अँगुली पकड़कर मंच पर चढ़े अनेक गीतकार शिल्प और कथ्य की दृष्टि से रंग जी तक नहीं पहुंच सके। नीरज के 'कारवां गुज़र गया' या बच्चन के 'इस पार प्रिये' की तरह एक समय में रंग जी का यह गीत गीत-प्रेमियों के मन और कंठ में प्रतिष्ठित हो गया था, 'कवि क्यों गीत लिखा करता है?' -

कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?
याद उसे क्यों गा कर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पा कर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?
जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगा कर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।
जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।
गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।
माना मन के गीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?

वरिष्ठ पत्रकार अशोक बंसल बताते हैं कि सिने गीतकार कवि शैलेन्द्र के जीवन के तमाम क़िस्से ऐसे हैं, जिन्हें न कभी लिखा गया, न कभी सुनाया गया। ऐसा ही एक क़िस्सा मथुरा की रेलवे कॉलोनी धौली प्याऊ का है। इस क़िस्से को उद्घाटित करने वाले कवि रंग जी सन 1984 तक मथुरा के कवि डॉ. अनिल गहलौत के संपर्क में रहे। शैलेन्द्र तब किशोरी रमन इंटर कॉलेज में 12वीं के छात्र थे। तुकबंदी करते थे। धौली प्याऊ कॉलोनी में एक कवि सम्मलेन का आयोजन हुआ। उन दिनों बलबीर सिंह 'रंग' का नाम गीतकारों की फ़ेहरिस्त में बड़े सम्मान से लिया जाता था। रंग जी को कवि सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया। कवि सम्मेलन की शुरुआत हुई, कवियों के नाम बोले गए, उन्हें कविता पाठ के लिए बुलाया गया।

एक के बाद एक ऐसे अनेक कवियों ने काव्यपाठ किया लेकिन कविता पाठ को आतुर एक दुबले पतले नौजवान का नाम संचालक ने नहीं पुकारा। नौजवान की बेचैनी देखने लायक थी। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे रंगजी ने यह भांप लिया। उन्होंने उस वक़्त संचालक को टोका और नौजवान कवि को कविता पाठ का न्यौता देने को कहा दिया। तब संचालक ने नौजवान को कविता पाठ के लिए बुलाया। यह और कोई नहीं बल्कि गीतकार शैलेन्द्र ही थे। रंगजी ने बताया था कि इस नौजवान की कविता को लोगों ने खूब पसंद किया था।

शैलेन्द्र ने मथुरा के मंच पर पहली बार कविता पढ़ी थी। रंग जी ने उत्साह बढ़ाया था, इसे शैलेन्द्र भूले नहीं। कुछ ही सालों में मुंबई जाकर शैलेन्द्र प्रसिद्ध हो गए। रंग जी को जब भी मुंबई जाने का मौक़ा मिला, शैलेन्द्र ने उन्हें अपने घर में ही ठहराया। रंग जी की रचनाओं में जीवन के प्रति आसक्ति का भाव सबसे हटकर एक अलग रंग पैदा करने की सामर्थ्य रखता है। काल का कठोर सामना करने को वह हमेशा तत्पर दिखाई देते। जीवन के इस एक और सत्य का रूप रंग जी की इस 'आज फिर आई जवानी की हवा' कविता में देखिए -

आज फिर आई जवानी की हवा।
कुछ न कह पाई जवानी की हवा।
कौन है जिसको जवानी से न प्यार,
और फिर उसकी कहानी से न प्यार?
किस को संघर्षों ने झकझोरा नहीं,
किस के जीवन में नहीं आई बहार?
कौन है ऐसा धरणि का देवता,
जिसने ठुकराई जवानी की हवा।
आज फिर आई जवानी की हवा।
कांप उठते हैं हिमालय के शिखर,
चांद-सूरज भूमि पर आते उतर।
ठहर पाते हैं उनन्चासों पवन,
और त्रिभुवन में जलधि जाते बिखर।
जब कि चलती है कभी बे रोक-टोक,
ले के अँगड़ाई जवानी की हवा।
आज फिर आई जवानी की हवा।
आज मेरी आग पानी हो गयी,
बात भी क्या थी कहानी हो गई।
मद भरे जीवन के भूखे प्यार की
प्यास भी तो अब पुरानी हो गई।
देखकर मुझ को व्यथाओं से भरा-
नयन भर लाई जवानी की हवा।
आज फिर आई जवानी की हवा।
जिसके पाने को स्वयंम् मैं खो गया,
जिसके कारण क्या से क्या हो गया।
जिसकी कोमल कल्पना की छांह में-
हार कर उन्माद मेरा सो गया।
उस अधूरे स्वप्न के विश्वास पर,
मैंने तरसाई जवानी की हवा।
आज फिर आई जवानी की हवा।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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