अपनी ग़लती से सबक ले इस महिला ने पैरेंट्स के लिए बनाया ऐडमिशन इंफॉर्मेशन पोर्टल

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वॉल स्ट्रीट जर्नल एक आर्टिकल के मुताबिक़, दिल्ली नर्सरी स्कूल का ऐडमिशन प्रॉसेज़, हार्वर्ड में दाखिले से भी ज़्यादा कठिन है क्योंकि स्कूलों के बीच प्रतियोगिता इतनी बढ़ गई है कि दौड़ में मासूम बच्चे और उनके मां-बाप पिसते हैं। कुछ ऐसा ही अंजली के साथ भी हुआ।

अंजलि श्रीवास्तव
अंजलि श्रीवास्तव
अंजली ने अपने करियर की शुरूआत, 2003 में जालंधर से बतौर कम्प्यूटर साइंस प्रोफ़ेसर की थी। इसके बाद वह अपनी नौकरी छोड़कर यूएस चली गईं। भारत आने के बाद अंजली ने फुल-टाइम पैरेंट की जिम्मेदारी निभाने का फ़ैसला लिया। 

जैसा कि अक्सर महिलाओं के साथ होता है, अंजली श्रीवास्तव को भी यूएस में नौकरी कर रहे अपने पति के साथ शिफ़्ट होने के लिए भारत में कॉलेज प्रोफ़ेसर की नौकरी छोड़कर विदेश जाना पड़ा। कुछ वक़्त बाद अंजली मां बन गईं और उनके ऊपर एक नई भूमिका को अच्छी तरह से निभाने की जिम्मेदारी आ गई। कुछ वक़्त बाद अंजली अपने परिवार के साथ भारत वापस आ गईं और यहीं से उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया। देश वापस आकर अंजली अपने परिवार के साथ दिल्ली में रह रही थीं। समय आ गया था, जब अंजली को अपने बेटे का दाखिला दिल्ली के अच्छे स्कूल में कराना था।

वॉल स्ट्रीट जर्नल एक आर्टिकल के मुताबिक़, दिल्ली नर्सरी स्कूल का ऐडमिशन प्रॉसेज़, हार्वर्ड में दाखिले से भी ज़्यादा कठिन है क्योंकि स्कूलों के बीच प्रतियोगिता इतनी बढ़ गई है कि दौड़ में मासूम बच्चे और उनके मां-बाप पिसते हैं। कुछ ऐसा ही अंजली के साथ भी हुआ। इस घटना के बाद अंजली ने तय किया वह अपनी पर्सनल और प्रोफ़ेशनल योग्यता के तालमेल से कुछ ऐसा बदलाव करेंगी कि अब कोई भी मां ऐसी ग़लती न करे। इतना ही नहीं, अंजली ने इस चीज़ को न सिर्फ़ साकार करके दिखाया, बल्कि अभिभावकों को यह सुविधा वह मुफ़्त में दे रही हैं।

अंजली की मां, स्कूल टीचर थीं। अंजली खेल में भी काफ़ी अच्छी रही हैं और सॉफ़्टबॉल में उन्होंने तीन बार राष्ट्रीय स्तर पर पंजाब टीम की कप्तानी की है। कम्प्यूटर साइंस में उन्होंने मास्टर डिग्री ली है। अंजली ने अपने करियर की शुरूआत, 2003 में जालंधर से बतौर कम्प्यूटर साइंस प्रोफ़ेसर की थी। इसके बाद वह अपनी नौकरी छोड़कर यूएस चली गईं। भारत आने के बाद अंजली ने फुल-टाइम पैरेंट की जिम्मेदारी निभाने का फ़ैसला लिया। जब उनके बच्चे की उम्र ढाई साल थी और उसका दाखिला प्लेस्कूल में होना था, उस दौरान ही अंजली 15 दिनों की फ़ैमिली ट्रिप पर चली गईं और जानकारी के अभाव में उनसे ऐडमिशन की डेट्स मिस हो गईं। जब तक वह वापस लौटीं, सभी अच्छे स्कूलों में दाखिले की तारीख़ निकल चुकी थीं। अंजली कहती हैं, "मैं बिल्कुल बौखलाई हुई थी। मुझे याद है कि मेरे पास ऐसा कोई भी आसान तरीक़ा नहीं था, जो यह बता सके कि किन स्कूलों में ऐडमिशन अभी भी खुले हुए हैं।"

थोड़ी जानकारी जुटाने पर उन्हें पता चला कि उन्हें नियमित रूप से जानकारी के लिए उन्हें न्यूज़पेपर्स चेक करने होंगे और एक-एक करके सभी स्कूलों की वेबसाइट्स खंगालनी होंगी या फिर स्कूलों में फोन करके पूछना होगा। वह अपने बच्चे का ऐडमिशन फ़ॉर्म लेने के लिए एक स्कूल में कतार में थीं और इस दौरान ही बाक़ी अभिभावकों से बातचीत करने पर उन्हें पता चला कि सभी लगभग एक ही जैसी समस्या से गुज़र रहे हैं।

अंजली बताती हैं कि वह और उनके पति, दोनों ही टेक्निकल बैकग्राउंड से ताल्लुक रखते हैं और इसलिए उन्होंने इस समस्या का तकनीकी सॉल्यूशन ढूंढने का मन बनाया। इस क्रम में 'स्कूल ऐडमिशन इंडिया डॉट कॉम' (SchoolAdmissionIndia.com) की शुरूआत हुई। अंजली बताती हैं कि अपने स्टार्टअप के लिए उन्हें अपने अंदर वही पैशन महसूस हुआ, जो एक वक़्त पर उन्हें सॉफ़्टबॉल के लिए होता था। अंजली ने अपने पति के साथ मिलकर बेहद कम लागत के साथ एक वेबसाइट शुरू की और स्कूलों में दाखिले से जुडीं लगभग सभी महत्वपूर्ण जानकारियां एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध कराईं, जैसे कि फ़ीस, ऐप्लिकेशन जमा करने की तारीख़, ज़रूरी दस्तावेज़ आदि।

अंजली बताती हैं कि 2008 में उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ने के बारे में सोचा। वह अपने पति के साथ नोएडा के एक-एक स्कूल में व्यक्तिगतरूप से जाकर, वहां के रिज़ल्ट्स के फोटोज़ खींचकर लाईं और अपनी वेबसाइट पर पोस्ट किया। इस काम के बाद उनकी वेबसाइट की लोकप्रियता बेहद तेज़ी से बढ़ने लगी। कुछ वक़्त में ही स्कूल ऐडमिशन इंडिया एनसीआर का सबसे ज़्यादा सर्च किया जाने वाला इनफ़र्मेशन पोर्टल बन गया। अंजली कहती हैं, "इस स्पेस में काम करने वाले बाक़ी पोर्टल्स विज्ञापनों का सहारा लेते हैं और स्कूलों के साथ अभिभावकों की जानकारियां भी साझा करते हैं, लेकिन यह काम हमारे उसूलों के ख़िलाफ़ है। " अंजली ने बताया कि वह लगातार अपने प्लेटफ़ॉर्म की तकनीक को बेहतर करने की कोशिश में लगी हुई हैं, ताकि लोगों तक और भी बेहतर ढंग से जानकारी पहुंच सके।

उन्होंने वेबसाइट से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, "शुरूआत में वेबसाइट को संभालना, बेहद चुनौतीपूर्ण था। मुझे स्कूलों से सटीक जानकारी पता लगाकार, साइट पर अपडेट करनी पड़ती थी और इसके बाद ताज़ा ऐडमिशन डेट्स संबंध में न्यूज़लेटर्स भेजने होते थे। इसके बाद मैंने अभिभावकों को वॉट्सऐप और टेलीग्राम ग्रुप पर साथ लाने के बारे में सोचा और फिर एक मोबाइल ऐप भी तैयार किया।"

पहले ही साल उन्हें 500 रजिस्टर्ड यूज़र्स मिले और फिर आने वाले एक साल में यह आंकड़ा 6 गुना हो गया। इस साल ही अंजली ने अपने पति प्रांजल के साथ मिलकर कोड फायर टेक्नॉलजीज़ की शुरूआत की। यह एक सॉफ़्टवेयर सर्विस स्टार्टअप था, जिसमें अंजली ने एचआर की भूमिका संभाली और फ़िलहाल इसके माध्यम से ही 'स्कूल ऐडमिशन इंडिया' को फ़ंडिंग मिल रही है।

2012 के अंत तक स्कूल ऐडमिशन इंडिया को 15 हज़ार रजिस्टर्ड यूज़र्स मिल गए और यूज़र्स अपनी ओर से भी प्लेटफ़ॉर्म पर जानकारियां साझा करने लगे। आपको बता दें कि बिना किसी विज्ञापन या मार्केटिंग के यूज़र्स का आंकड़ा अब 70 हज़ार तक पहुंच चुका है। जहां तक 'कोड फ़ायर' की बात है तो इस स्टार्टअप में 45 लोगों की कोर टीम काम कर रही है। यह स्टार्टअप, वेब और मोबाइल ऐप्लिकेशन्स से लेकर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और ब्लॉकचेन की तकनीकी सुविधाएं मुहैया करा रहा है।

अंजली ने बताया कि अन्य शहरों के लोग भी उनसे अपील करते हैं कि स्कूल ऐडमिशन इंडिया के ऑपरेशन्स को बढ़ाया जाए ताकि वे भी उसका लाभ उठा सकें। इस मांग को ध्यान में रखते हुए अंजली लगातार इस दिशा में प्रयास भी कर रही हैं। अंजली ने बताया कि अब स्कूलों को उनके प्लेटफ़ॉर्म पर सेल्फ़-रजिस्ट्रेशन की सुविधा दी जा रही है। उन्होंने जानकारी दी कि पिछले 5 से 6 महीनों में 100 स्कूलों ने रजिस्ट्रेशन करवा भी लिया है।

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