निकाय चुनाव: देखन में छोटे लगें घाव करें गम्भीर

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उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय के चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं। ये न केवल प्रदेश की योगी सरकार के कामकाज और इकबाल की परीक्षा होगी बल्कि नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों का लिटमस टेस्ट भी होगा।

चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश यादव (फोटो साभार- ट्विटर हैंडल)
चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश यादव (फोटो साभार- ट्विटर हैंडल)
कांग्रेस ने फिरोजाबाद से शहजहां परवीन और मुरादाबाद में रिजवान कुरेशी को टिकट देकर सामाजिक समीकरण तो बैठाया ही है वहीं इस चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का पार्टी के प्रति रुझान का भी अंदाजा लग जाएगा। 

निकाय चुनाव में समाजवादी पार्टी की रणनीति पर विचार किया जाए तो उसने बड़े ही करीने से प्रत्याशियों के चयन में सभी जातियों और वर्गों को जोडऩे का प्रयास किया है।

यूपी में निकाय चुनाव के पहले फेज का मतदान संपन्न हो गया। 24 जिलों की 5 नगर निगम, 71 नगर पालिका परिषद और 154 नगर पंचायतों के लिए वोट डाले गए। कुल लगभग 55 फीसदी मतदान हुआ। खुशी की बात है कि इतने बड़े प्रदेश में प्रथम चरण का निकाय चुनाव हिंसा रहित संपन्न हुआ। बता दें, सीएम योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को गोरखपुर के वॉर्ड नंबर- 68 के प्राइमरी स्कूल में वोट डाला। उन्होने कहा कि मुझे विश्वास है कि प्रदेश की शहरी जनता भाजपा को अपना पूर्ण समर्थन देगी।

दरअसल, उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय के चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं। ये न केवल प्रदेश की योगी सरकार के कामकाज और इकबाल की परीक्षा होगी बल्कि नोटबंदी और जी.एस.टी. जैसे फैसलों का लिटमस टेस्ट भी होगा। साथ ही यह तय होगा कि सोशल मीडिया पर धमाचौकड़ी मचाने वाला विपक्ष जमीन पर कितना वजूद रखता है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे दूरगामी परिणाम वाले निर्णयों के चलते भाजपा के प्रति जनता की नाराजगी की आंच पर विपक्ष की सियासी हांडी को कितना ताप मिला, इसकी भी पैमाइश होगी। लिहाजा यह चुनाव केवल सत्तारूढ़ दल के लिए ही नहीं अपितु विपक्ष के लिए भी काफी मायने रखने वाले हैं। कह सकते हैं कि साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में संभावनाओं के प्रवेश द्वार पर दस्तक जैसी होगी निकाय चुनाव का परिणाम।

सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यह चुनाव इसलिए भी ज्यादा अहमियत रखते हैं कि अगर चुनाव परिणाम गड़बड़ाया तो 2019 के लोकसभा चुनाव पर इसका प्रभावी असर पड़ेगा क्योंकि भाजपा के बारे में यह अवधारणा है कि शहरी मतदाताओं में पार्टी की पकड़ हमेशा मजबूत रही है। अगर नींव कमजोर होगी तो इमारत के ढहने का खतरा भी लाजमी है। 2017 का निकाय चुनाव कितना अहम् है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय निकाय चुनाव में पहली बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 12 नवम्बर से चुनावी सभाएं शुरू कर चुके हैं। वहीं सपा के राष्ट्रीय सचिव राजेंद्र चौधरी ने कहा है कि फिलहाल अखिलेश के चुनाव प्रचार मैदान में उतरने का कोई कार्यक्रम नहीं है।

जहां तक मुद्दों का सवाल है तो हर व्यक्ति परेशान है और सरकार ने खुद ही उन्हें मुद्दे उपलब्ध करा दिए हैं। कांग्रेस प्रवक्ता वीरेंद्र मदान ने बताया कि इस बार निकाय चुनाव बेहद अहमियत रखते हैं क्योंकि इसके बाद सीधे 2019 का लोकसभा चुनाव होगा, लिहाजा निकाय चुनाव से पार्टी का आधार मजबूत होगा। चुनाव में पार्टी के राज्य स्तरीय नेता प्रचार करेंगे। जहां जरूरत पड़ेगी वहां केंद्रीय नेताओं से मदद ली जाएगी।

सभी प्रमुख राजनीतिक दल साल 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस स्थानीय निकाय के चुनाव पूरे दमखम के साथ सामाजिक, जातिगत समीकरण को साधते हुए बड़ी संजीदगी से लड़ रहे हैं। प्रत्याशियों के चयन में भी छोटे-बड़े पहलुओं का ध्यान रखा गया। प्रदेश में चार बार सत्तारूढ़ हो चुकी बसपा पहली बार अपने चुनाव चिन्ह पर नगरीय निकाय चुनाव लड़ रही है। गत विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद बसपा के लिए नगरीय निकाय चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं। शायद इसीलिये निकाय चुनाव के जरिए 'कमबैक' करने की तैयारी कर रही बसपा ने उन प्रत्याशियों को भी टिकट देने से गुरेज नहीं किया है जो विरोधी पार्टियों के बागी हैं, लेकिन अपने वॉर्ड में सीट निकालने का दमखम रखते हैं।

दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में पहली बार नगर निकाय चुनाव में ताल ठोंक रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली यह पार्टी इन स्थानीय चुनावों को राज्य में अपनी सियासी पारी की औपचारिक शुरुआत मान रही है। निकाय चुनाव को लेकर अन्य दल भी कमर कस चुके हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कह चुके हैं कि अगर लखनऊ मेट्रो, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, समाजवादी पेंशन योजना, समाजवादी आवास योजना समेत उनकी पिछली सरकार के तमाम विकास कार्यों को देखते हुए वोट पड़े तो ज्यादातर नगर निकायों में पार्टी के प्रत्याशी चुने जाएंगे।

उ.प्र. के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में कांग्रेस अकेली है जिसका संगठनात्मक ढांचा तुलनात्मक रूप से सबसे कमजोर है। पिछले कई निकाय चुनाव में भी प्रदर्शन काफी खराब रहा है, पर इस बार लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस भी हर सम्भव प्रयास में जुटी हुई है कि इस चुनाव में भले ही प्रदर्शन बहुत अच्छा रहे अथवा नहीं पर संगठन के तौर पर जिलों-शहरों में कार्यकर्ताओं की मजबूत टीम खड़ी हो जाए। कांग्रेस इन चुनावों के माध्यम से अपने परम्परागत ब्राह्मण मतदाताओं को वापस पार्टी में लाने की रणनीति पर गम्भीरता से काम कर रही है।

पार्टी 16 महापौरों के पदों पर सर्वाधिक 07 जगहों से ब्राह्मण प्रत्याशियों को टिकट देकर उन्हें पुन: घर वापसी का सम्मान दिए जाने का स्पष्ट संदेश दे रही है, वहीं आगरा, सहारनपुर और झांसी से मेयर पद पर व्यापारी वर्ग से जुड़े लोगों को टिकट दिये हैं। इनमें पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य भी शामिल हैं जबकि गोरखपुर और वाराणसी में राकेश यादव एवं शालिनी यादव को टिकट देकर समाजवादी पार्टी की मुश्किलें बढ़ाई हैं तो मेरठ से ममता बाल्मीक को उतार कर दलितों को भी संदेश दिया है।

कांग्रेस ने फिरोजाबाद से शहजहां परवीन और मुरादाबाद में रिजवान कुरेशी को टिकट देकर सामाजिक समीकरण तो बैठाया ही है वहीं इस चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का पार्टी के प्रति रुझान का भी अंदाजा लग जाएगा। ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित कांग्रेस का वोट बैंक रहा है, पर क्षेत्रीय दलों के प्रादुर्भाव से कांग्रेस के जातीय समीकरण गड़बड़ा जाने से उ.प्र. में कांग्रेरस हाशिये पर आ गई। गत वर्ष विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों को वापस लाने के लिए दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था पर सपा से चुनावी गठबंधन के चलते शीला दीक्षित को आगे नहीं लाया गया था। इसी रणनीति के चलते निकाय चुनाव में मेयर पद पर ब्राह्मणों को सर्वाधिक सात टिकट दिये गए हैं।

निकाय चुनाव में समाजवादी पार्टी की रणनीति पर विचार किया जाए तो उसने बड़े ही करीने से प्रत्याशियों के चयन में सभी जातियों और वर्गों को जोडऩे का प्रयास किया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बड़ी चतुराई से जहां महापौर के पदों पर सवर्णों और मुस्लिमों को प्रत्याशी बनाया, एक भी यादव को टिकट नहीं दिया और पार्षद चुनाव में परम्परागत एम-वाई फैक्टर लागू करते हुए यादवों, मुस्लिमों एवं पिछड़ों को टिकट देकर आगे रखा, इसका सीधा लाभ मेयर पद के ब्राह्मण, मुस्लिम और वैश्य सवर्ण प्रत्याशियों को अपने सजातीय वोटों के साथ-साथ यादव, मुस्लिम और पिछड़ी जातियों के वोट आसानी से ट्रांसफर हो जाएंगे और पार्षदों को सवर्ण मेयर उम्मीदवारों को वोट मिलने की सम्भावना से सपा बेहतर चुनावी स्थिति में आ सकती है।

पार्षद चुनाव 15 से 25 हजार मतदाताओं के बीच होता है और सामान्यत: इन चुनावों में किसी सीट पर एक वर्ग या जाति का वर्चस्व नहीं रहता है। इतना ही नहीं समाजवादी पार्टी ने फैजाबाद-अयोध्या मेयर पद पर किन्नर गुलशन बिन्दु को टिकट देकर प्रदेश के लगभग 1.50 लाख किन्नर मतदाताओं को भी अपने फोल्ड में लाने का प्रयास किया है। पार्षद चुनावों में 25-50 वोटों का अन्तर भी मायने रखता है। इस बार निकाय चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि नोटबंदी और जीएसटी के चलते छोटे व्यापारी और उद्यमियों में भाजपा के प्रति नाराजगी है जो उसका परम्परागत वोट बैंक भी रहा है, उस पर गैर भाजपा दलों की पैनी नजर है। वहीं भाजपा भी दलित और अतिपिछड़ों को अपनी तरफ मोड़ने में लगी है। वहीं सभी राजनीतिक दलों ने टिकट बांटने में अपने परम्परागत जातिगत समीकरणों में बदलाव करते हुए अगड़ी-पिछड़ी हिन्दू मुस्लिम रणनीति में कम-ज्यादा ही सही, बदलाव से यह संकेत भी मिलता है कि प्रदेश की जातिगत राजनीति में भी परिर्वतन आ रहा है, जो अच्छा संकेत है।

भाजपा ने भी रणनीति में कुछ फेर बदल किया है जहां पार्टी ने लोकसभा-विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों को एक भी सीट नहीं दी थी और परहेज था पर इस बार निकाय चुनाव में सपा से भाजपा में आये बुक्कल नवाब के बेटे को टिकट देकर मुस्लिम मतदाताओं को संदेश दिया है कि मुस्लिम भाजपा के लिए अछूत नहीं हैं। राजधानी लखनऊ के महापौर की सीट भाजपा के लिए सबसे ज्यादा प्रतिष्ठापूर्ण है। यह अटलजी का क्षेत्र रहा है, गृहमंत्री राजनाथ सिंह यहां से सांसद हैं, दिनेश शर्मा उपमुख्यमंत्री बनने से पहले महापौर थे, ऐसे में मुस्लिम सभासद देकर मुस्लिम वोटों को साधने का भी प्रयास किया गया है।

हालांकि निकाय चुनावों में महापौर-मेयर को छोड़ दें तो 15 से 25 हजार मतदाताओं के मध्य होने वाला पार्षद का चुनाव छोटे स्तर का जरूर है पर प्रदेश की चुनावी राजनीति को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। इन चुनाव परिणामों से काफी हद तक 2019 में होने वाले लोक सभा चुनाव की ज्यादा नहीं तो थाड़ी-बहुत बयार का अंदाज लगेगा ही। केन्द्र और प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकारें बनने के बाद प्रदेश की तुष्टीकरण वाली राजनीति को बड़ा झटका लगा है और विशेष रूप से मुस्लिम वर्ग सकते में है।

चुनावी विश्लेषकों का मानना है अब चाहे 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव हो या होने जा रहे निकाय चुनाव, मुस्लिम वर्ग की रणनीति होगी कि मुस्लिम वोट किसी भी दशा में विभाजित न हो। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक विश्लेषकों के मत सही होते हैं या जनता फिर एक बार हैरतंगेज चुनाव परिणामों से रूबरू होगी। खैर यह तो परिणाम आने के बाद ही ज्ञात होगा किंतु इतना तो तय है कि आकार और हैसियत में छोटे दिखने वाले निकाय चुनाव इस बार घाव गंभीर करेंगे।

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