मोबाइल रिपेयर शॉप से खड़ी कर ली डेढ़ सौ करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी

जो कभी छोटा सा स्टॉल लगा करता था मोबाइल रिपेयर आज चला रहा है करोड़ों की कंपनी...

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इसे कहते हैं नामुमकिन को मुमकिन बना देना। दक्षिण दिल्ली के यंग बिजनेस मैन युवराज अमन सिंह ने बेरोजगारी की हालत में किसी वक्त दक्षिण दिल्ली में सोनी एरिक्सन के बाहर छोटा सा स्टॉल लगाकर मोबाइल रिपेयरिंग का मामूली सा काम शुरू किया था, आज उनकी कंपनी का रूप ले चुका काम सालाना डेढ़ सौ करोड़ के टर्नओवर तक पहुंच चुका है।

अमन सिंह
अमन सिंह
 वह अमेरिका के मिड्डलसेस यूनिवर्सिटी से बिज़नेस इनफार्मेशन सिस्टम्स और मैनेजमेंट की डिग्री ले चुके हैं। वह पहले अपने पत्नी के भाई के साथ इंग्लैंड में काम करते थे। वर्ष 2003 में भारत लौट आए। टाटा टेलीसर्विसेस की फ्रैंचाइज़ी ले ली। इनकम न होने से ये काम भी छोड़ दिया।

जो लोग मुश्किलों, मुसीबतों में संघर्ष से डर जाते हैं, हार मान लेते हैं, वे अपनी जिंदगी में कभी आगे नहीं बढ़ पाते हैं लेकिन जो हालात से जूझने से डरते, घबराते नहीं, मैदान छोड़कर भागते नहीं, हार नहीं मानते, वे खुद अपनी मंजिलें आसान कर लेते हैं। एक ऐसी ही कामयाबी की दास्तान लिखी है मोबाइल रिपेयर का काम शुरू कर आज अपनी कंपनी सालाना टर्नओवर डेढ़ सौ करोड़ रुपए पहुंचाने वाले दक्षिण दिल्ली के यंग बिजनेस मैन युवराज अमन सिंह ने। वह अमेरिका के मिड्डलसेस यूनिवर्सिटी से बिज़नेस इनफार्मेशन सिस्टम्स और मैनेजमेंट की डिग्री ले चुके हैं। वह पहले अपने पत्नी के भाई के साथ इंग्लैंड में काम करते थे। वर्ष 2003 में भारत लौट आए। टाटा टेलीसर्विसेस की फ्रैंचाइज़ी ले ली। इनकम न होने से ये काम भी छोड़ दिया।

वर्ष 2005 में टाटा के एक कर्मचारी के संपर्क में आने पर वह सोनी एरिक्सन के बाहर छोटा सा स्टॉल लगाकर मोबाइल रिपेयरिंग करने लगे। स्टॉल के नाम पर बस एक टेबल और एक कुर्सी लेकिन काम चल निकला। बाद में वह एक और कंपनी से जुड़ गए। उसके माध्यम से वह एप्पल, सैमसंग, सोनी, नोकिया, एचटीसी, जीओमी और ब्लैकबेरी कंपनियों से वापस आए मोबाइल फोन नए अनबॉक्सड फोन और सेकेंडहैंड फोन खरीद कर उन्हें रिपेयर करने लगे। इसके साथ वे सेट 40 प्रतिशत कम दाम पर ग्राहकों को बेचने लगे। धीरे-धीरे युवराज अमन सिंह ने दक्षिण दिल्ली स्थित अपने ऑफिस से एक साल में ही पचास हजार मोबाइल रिपेयर कर बेच दिए, जिससे भारी मुनाफा हुआ।

अपनी टीम के साथ युवराज अमन सिंह
अपनी टीम के साथ युवराज अमन सिंह

वह उन फोन सेट्स को रिपेयर करते हैं, जो निर्माता से वारंटी के साथ आते हैं। रिपेयरिंग के बाद उन्हें ऑनलाइन बेच दिया जा रहा है। अब तो वह टेबलेट्स, पॉवरबैंक्स और मोबाइल के एक्सेसरीज के साथ भी डील करने लगे हैं। इस तरकीब से अपनी मेहनत से किस्मत आजमाने पर युवराज के कारोबार का पहले साल ही टर्नओवर लगभग 20 करोड़ का रहा। सैमसंग कंपनी के साथ उनकी डील हुई। उसके पुराने फोन सेट्स ख़रीदे और उन्हें ठीक कर फ्लिपकार्ट के माध्यम से बेच डाला। अब तो उनके मोबाइल सेट्स शॉपक्लयूस, अमेज़ॉन, ईबे, स्नैपडील, क्विकर, जंगली और जोपर पर भी बिक रहे हैं। अब उनका कारोबार अमेरिका तक दस्तक दे चुका है। वहां भी उन्होंने अपनी शाखा खोल ली है। युवराज ने अपने प्रोडक्ट को तीन श्रेणियों में बांट रखा है। पहला फ़ोन जिसमें खरोंच न हो, दूसरा जिसके कांच में खरोंच हो, तीसरा जिसमें फ़ोन थोड़ा क्षतिग्रस्त हो। युवराज़ ने नॉएडा में भी अपनी एक फैक्ट्री बना ली है, जो की इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम्स को रेपियर करके एक्सपोर्ट करती है।

सच है कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। युवराज अमेरिका या लंदन में ही रुक जाते तो शायद उन्हें इतनी बड़ी सफलता नहीं मिलती। आज उनकी कंपनी का टर्न ओवर डेढ़ सौ करोड़ तक पहुंच चुका है। धंधा लगातार बढ़ता जा रहा है। उनका हाथ समय की नब्ज पर है और कामयाबी कदम चूम रही है। जब युवराज ने एक मोबाइल फोन कंपनी की दुकान के बाहर टेबल डाल कर अपने बिजनेस की शुरुआत की थी, तब उन्हें भी पता नहीं रहा होगा कि धीरे-धीरे वह दुकान एक दिन इतनी लोकप्रिय हो जाएगी। आज उनकी कंपनी सभी ब्रांडेड मोबाइल कंपनियों से वापस लौटाए मोबाइल, नए अनबॉक्सड मोबाइल और यूज्ड मोबाइल खरीदती है और उसे अपने दिल्ली (15000 स्क्वॉयर फुट) और बेंगलुरु (3000 स्क्वॉयर फुट) स्थित फैक्ट्री में मरम्मत कर ग्राहकों बेचती है।

नोएडा में भी उनकी एक फैक्ट्री है जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम्स की मरम्मत करके एक्सपोर्ट किया जाता है। आज उनके प्रोडक्ट रॉकिंग डील कंपनी से प्रमाणित होते हैं। तीन महीने से लेकर एक साल तक की वारंटी के साथ मिलते हैं। सुधार के वक्त लगभग दो दर्जन परीक्षण से होते हैं। इस दौरान उनके डिस्प्ले, साउंड, कीटच, पोर्ट्स, क्लिप्स, कैमरा और हार्डवेयर का परीक्षण किया जाता है। अपने बिजनेस को एक छोटे से लेवल से स्टार्ट करने वाले युवराज अमन सिंह ने दिल्ली में एक मामूली मोबाइल रिपेयरिंग की शॉप से 150 करोड़ रूपए के टर्नओवर वाली एक कंपनी तो खड़ी कर ही ली, ये कंपनी आज कस्टमर को सेटिस्फेक्शन देने के साथ ही कई लोगों को रोजगार भी दे रही है।

इस तरह आज के युवा अपनी कामयाबियों की दास्तान लिख रहे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफ़ोन और टैबलेट्स की मरम्मत कितनी कठिन है, यह ज्यादातर लोगों को पता है। जिसका आईपैड फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो जाए, उसके लिए ये तो एक घटना हुई लेकिन एक्स्ट्राऑर्डिनरी के लिए यह एक धंधे का आइडिया हो जाता है। एक युवक ने बैठे-बैठे एक दिन ट्वीट किया कि क्या वह अपना टूटा स्मार्टफ़ोन ख़ुद बना सकता है? उसके एक फॉलोअर ने उसे एक लिंक ट्वीट किया, जहाँ मात्र 15 पाउंड में स्क्रीन रिप्लेसमेंट किट मिल रही थी। यही किट ऐपल स्टोर पर 200 पाउंड में मिल रही थी। इसके बाद उसने उस लिंक पर क्लिक करके वो किट खरीद लिया। इस तरह उसने ऐपल आईपैड की स्क्रीन ठीक करने के मिशन पर अपना पहला क़दम रख दिया।

इसके बाद वह आईफिक्सइट डॉट कॉम वेबसाइट पर पहुंचा। यह वेबसाइट एक क्राउडसोर्स वेबसाइट (आम लोगों के पैसे से चलने वाली) है और इस पर उपकरणों की मरम्मत के बारे में वीडियो ट्यूटोरियल होते हैं। वहां उसे आईपैड मरम्मत वाली गाइड वैसे तो काफ़ी बढ़िया दिख रही थी लेकिन वह थी बहुत जटिल और बारीकियों वाली। वेबसाइट पर उसे 'बेहद कठिन' की श्रेणी में रखा गया था लेकिन उसने तय किया कि वह पीछे नहीं हटेगा। इसके बाद सर्च करते हुए वह 'रीस्टार्ट प्रोजेक्ट' पर पहुंचा। यह ऐसे स्वयंसेवियों का समूह है, जो नौसिखुआ लोगों को अपने गैजेट बनाने में मदद करता है। पिछले एक साल में यह समूह 40 देशों में फैल चुका है।

अब यह समूह दफ़्तरों में, शाम को या सप्ताहांत में होनी वाली पार्टियों में 'लंच आवर क्लिनिक' का आयोजन करता है। वह लोगों को सलाह देता है कि अपने गैजेट की मरम्मत कैसे करें? ज़ाहिर है इन क्लिनिक में शामिल होने वालों को मरम्मत में शामिल जोखिम के लिए भी तैयार रहना होता है। अब उस युवक रतन कुमार ने आईपैड ठीक करने के काम को ही अपना बिजनेस बना लिया है। जमकर उसे कमाई हो रही है। वह बताता है कि गैजेट की मरम्मत में बिजली के झटके लगने और उंगुलियों में कांच की किरचें चुभने का भी ख़तरा रहता है। उसका आईपैड तो काफ़ी पुराना था और वह जोखिम उठाने के लिए तैयार भी था, इसलिए वह 'रीस्टार्ट प्रोजेक्ट' के लंदन में आयोजित एक इवेंट में पहुँच गया।

वहां उसे हीट गन नामक औजार मिला, जो हेयर ड्रायर जैसा होता है। इसका उपयोग कल-कारखानों में किया जाता है। इस हीट गन का प्रयोग उस गोंद को नरम करने के लिए किया जाता है जिससे गैजेट को जोड़ा गया होता है। गैजेट के जोड़ नरम हो जाने के बाद प्लास्टिक और मेटल के दूसरे औजारों की सहायता से इसे खोलना पड़ता है। उसके लिए अपने आईपैड पर पहला चीरा चलाना सचमुच कंपा देने वाला था। निर्देश गाइड को पढ़कर और ट्यूटोरियल वीडियो को देखकर उसे आखिरकार कामयाबी मिल ही गई।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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