अपने विचारों की गूँज से बाहर निकलें

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करीब दो महीने पहले ब्रिटेन ने एक रोमांचकारी जनमत संग्रह के बाद यूरोपियन यूनियन से अलग होने का फैसला किया। शेयर बाजार गिरे, विश्लेषकों ने विश्व अर्थव्यवस्था के फिर से पतन की भविष्यवाणी की, यूरोपियन यूनियन के विघटन के प्रश्न भी उठे। मगर भारत के संदर्भ में यह चहल-पहल शायद अंग्रेज़ी के अख़बारों तक ही सीमित रही। आखिर एक छोटे से शहर में रहने वाले व्यक्ति के लिए, हज़ारों मील दूर एक देश में होने वाली राजनैतिक उथल पुथल से क्या लेना, खासकर जब वो एक ऐसे देश में हो, जिससे हमारा पिछले सत्तर सालों से साबक़ा छूट गया है।

मेरे विचार से मतलब है- क्योंकि जिन कारणों से ब्रिटेन का यूरोप से अलगाव हुआ वो एक विश्व स्तर की आर्थिक और राजनैतिक बीमारी के प्रत्यक्ष लक्षण हैं। और भले ही चाहे भाषा अलग हो, वो माध्यम जिससे ब्रिटेन के अलगाववादी, डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थक, ISIS के प्रचारक लोगों से जुड़ रहे हैं, वो वही माध्यम है, जिस पर हमारे देश में आज कश्मीर में हिंसा, दलितों के हक़ और आर्थिक सुधारों के बारे में चर्चा हो रही है।

मेरा इशारा सोशल मीडिया द्वारा लाये गए हमारे व्यावहारिक परिवर्तन में है, जिसने हमें धीरे-धीरे अपने ही कट्टरवाद के बुलबुले में क़ैद कर दिया है। एक बार फिर से हम ब्रिटेन के जून में हुए जनमत संग्रह पर ग़ौर करते हैं। एक तरह से देखें तो यूरोप समर्थकों और यूरोप विरोधियों के बीच बस छोटा सा अंतर था - 52 फीसदी बनाम 48 फीसदी। मगर अगर आप उन दिनों किसी समर्थक से यदि पूछते कि आपके मित्रों का किस तरफ रुझान है?- तो शायद जवाब होता - जी हर कोई यूरोप में रहने के पक्ष में है। अगर आप किसी विरोधी से पूछते, तो वो कहता कि सब यूरोप से निकलने के पक्ष में हैं। अगर इन रूझानों से हम चलते तो शायद जनमत का परिणाम एकतरफा होना चाहिए था। परंतु नहीं हुआ। डर की बात ये हैं कि ये लोग सच कह रहे थे। फ़र्क़ सिर्फ इतना ही है कि फेसबुक और ट्विटर के युग में हम उन्हीं को सुनते हैं, जो हमारी विचारधारा का समर्थन करते हैं, हमारे पोस्ट्स को लाइक करते हैं। हमारी हर गतिविधि का व्यापारिक विश्लेषण होता है, और हमें वही चुनिंदा खबरें वापस दिखाई जाती हैं जो हमारे ख्यालों से मेल करती हों। परिणामतः हम मानने लगते हैं कि हमारे तर्कों का आंकड़े भी समर्थन करते हैं। धीरे-धीरे हर कोई अपने बुलबुले, अपने अंतरमहल में क़ैद हो जाता है, जहाँ उसे अपने पसंद के नेताओं, धर्मगुरुओं और अर्थशास्त्रियों की ही सलाह मिलती है। मेरे विचार में आर्थिक प्रगति और वैश्वीकरण के लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि जहाँ आज सूचना की भरमार है, वहीं उसके उपभोक्ताओं की पसंद संकीर्ण और कट्टर हो गयी है।

नतीजा ये कि किसी भी सामाजिक और आर्थिक विषय पर आज सामाजिक वर्गों का मतभेद इतना गहरा होने लगा है कि कोई आपसी समझौता संभव ही नहीं है। चूँकि हम सिर्फ अपने ही ख्यालों की गूँज सुनते हैं, उनसे मिलते जुलते वीडियोस और आंकड़े हमें एक चेतन अल्गोरिथम द्वारा परोसे जाते हैं कि हमें अपने विरोधी झूठे और प्रपंची लगने लगते हैं। या फिर किसी काल्पनिक दुनिया के वासी।

सूचना प्रसारण की तटस्थता ख़त्म होने लगी है। चाहे अमरीका की प्रवासी नीति हो या आतंकवाद के खिलाफ मुहीम, चाहे भारत सरकार की कश्मीर नीति हो या चीन के आर्थिक सुधारों का दूसरा दौर, हर सिलसिले में राजनैतिक गुटों में मतभेद बढ़ रहे हैं। दुःख ये है कि इस प्रकार की एकतरफा ख़बरों के विचार मंथन से जो उपाय निकलते हैं, वो उतने ही छिछले होते हैं, जैसे अमरीका में अपराध और बेरोज़गारी को सुलझने के लिए मेक्सिको सीमा पे एक दीवार खड़ी करना। या भारत की बढ़ती युवा जनसँख्या को नौकरी दिलाने के लिए आरक्षित श्रेणियों के और टुकड़े करना, सार्वजनिक परिवहन के साधनों में निवेश न करके Uber और Ola की दरों को काबू में करने के लिए कानून बनाना।

इन हालातों में ये नामुमकिन नहीं है की भविष्य में दुनिया के सीमाएं व्यापर और प्रवास के लिए बंद हो जाएँगी। वैश्वीकृत कंपनियों के बीच प्रबंधन और तकनीक का अदान प्रदान ठप्प पड़ जायेगा। युवा रोज़गार बनाने के बजाय मांगते फिरेंगे और आयातित वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा के आभाव में उद्योगों की गुणवत्ता ढीली पड़ती जाएगी। आधुनिक समाज की ओर पिछले पांच सौ वर्षों से बढ़ते कदम रुक जायेंगे।

कुछ कोशिश शायद आप हम अपनी तरफ से तो कर ही सकते हैं। अगली दफा जब आप अपने राजनैतिक और आर्थिक आदर्शों के विरोध में कुछ पढ़ें या देखें तो अपनी रूढ़ियों की आरामदेही से निकालकर थोड़ा ये नज़रिया भी जानने की कोशिश करें। शायद हमारे इन छोटे प्रयासों से मजबूर होकर इन्टरनेट का चेहरा भी थोड़ा निष्पक्ष हो जाय!

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