छात्रा ने पॉकेट मनी बचाकर दृष्टिबाधित बच्चों को बांटे सात लैपटॉप

पॉकिट मनी का इससे बेहतर इस्तेमाल और क्या होगा...

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माता-पिता के साथ कैलिफोर्निया (अमेरिका) में रह रहीं, वहां के डोर्थी वैली हाईस्कूल की 12वीं की छात्रा अनन्या गुप्ता ने अपने जेबखर्च से जुटाए पैसे से देहरादून में दृष्टिबाधित छात्र-छात्राओं को सात लैपटॉप बांट कर उनकी अंधेरी राहों पर नई रोशनी बिखेरी है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अनन्या अभी डोर्थी वैली हाईस्कूल में 12वीं की छात्रा हैं। उनके नाना हरीश गोयल का परिवार देहरादून की साकेत कॉलोनी में रहता है। इसके चलते उनका दून आना-जाना लगा रहता है। वर्ष 2015 में दून आई अनन्या ने एनआईवीएच में एक इंटर्नशिप प्रोग्राम में हिस्सा लिया था, जिसके बाद उनके मन में जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करने की इच्छा जागी थी।

कम उम्र में ही बच्चे जब किसी ऐसे काम को अंजाम देने लगें कि बड़े अपनी सामाजिक समझदारी और निष्ठा का स्वयं आत्मालोचना करने लगें, उन्हें नई पीढ़ी के हुनर पर फक्र होने लगे तो मान लेना चाहिए कि समाज में आज भी मनुष्यता के सरोकार पहले की तरह ही सुरक्षित और जरूरी बने हुए हैं। कैलिफोर्निया (अमेरिका) में रह रहे अनुराग गुप्ता और मां निधि गुप्ता की पुत्री अनन्या ने अपने जेबखर्च से जुटाए पैसे से देहरादून में दृष्टिबाधित छात्रों को लैपटॉप बांट कर कुछ ऐसा ही सबक दिया है। कुछ इसी तरह रेवाड़ी (हरियाणा) के भारती सीनियर सेकंडरी स्कूल के छात्र-छात्रा अपनी पॉकेट मनी से स्कूल के जरूरतमंद बच्‍चों की मदद कर रहे हैं।

इस साल फरवरी में इन छात्र-छात्राओं ने जेब खर्च के लिए मिलने वाले पैसों की बचत कर स्कूल में ही सातवीं कक्षा में पढ़ने वाले दिव्‍यांग छात्र वरुण को व्हील चेयर देकर उसकी मदद की। भविष्य में भी इसी तरह जरूरतमंद बच्चों की मदद करने के लिए इन बच्‍चों ने भारतीय फिजिकल सोसाइटी बनाई है। बच्चों का कहना है कि वे लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ जरूरतमंदों की मदद करते रहेंगे। रेसलर संग्राम सिंह स्कूल पहुंचकर इन बच्चों का हौसला आफजायी कर चुके हैं। इसी तरह डीपीएस आरके पुरम की दृष्टि बाधित छात्रा लावन्या झा ह्यूमैनिटीज से 12वीं कक्षा में 487 अंक हासिल कर तीसरी टॉपर रही हैं। वह आंखों की रोशनी के बगैर कभी हौसला नहीं हारी हैं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज से बीए साइकोलॉजी ऑनर्स करना चाहती हैं। वह रोजाना तीन से चार घंटे पढ़ाई करती हैं।

कैलिफोर्निया (अमेरिका) में 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा अनन्या गुप्ता ने अपनी पॉकेट मनी से सात लैपटॉप खरीदकर एनआईवीएच, देहरादून के जरूरतमंद छात्रों को बांटे। जरूरतमंदों को लैपटॉप देने के लिए अनन्या भारत पहुंचीं और खुद दृष्टिबाधित छात्रों को हाथोहाथ दिए। इन लैपटॉप में उन्होंने अत्याधुनिक साफ्टवेयर इंस्टॉल किए हैं, जिससे उन्हें काम करने में दिक्कत न हो। अनन्या के पिता अनुराग गुप्ता और मां निधि गुप्ता कैलिफोर्नियाक में रहते हैं। अमेरिका में जन्मी अनन्या भारत से विशेष लगाव रखती हैं। अमेरिकन इंग्लिश के साथ ही वह फर्राटेदार हिंदी भी बोलती हैं। पिता अनुराग गुप्ता बताते हैं कि वह घर पर दोनों बेटियों के साथ हिंदी ही बोलते हैं। यही कारण है कि उनकी दोनों बेटियों को अमेरिका में रहने के बावजूद बहुत अच्छी हिंदी बोलनी आती है।

अनन्या अभी डोर्थी वैली हाईस्कूल में 12वीं की छात्रा हैं। उनके नाना हरीश गोयल का परिवार देहरादून की साकेत कॉलोनी में रहता है। इसके चलते उनका दून आना-जाना लगा रहता है। वर्ष 2015 में दून आई अनन्या ने एनआईवीएच में एक इंटर्नशिप प्रोग्राम में हिस्सा लिया था, जिसके बाद उनके मन में जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करने की इच्छा जागी थी। उस वक्त कुछ दृष्टिबाधित छात्र-छात्राओं ने अनन्या को बताया था कि वह नौकरी करना चाहते हैं लेकिन खुद का लैपटॉप न होने के कारण उनको दिक्कतें होती हैं। उस वक्त तो अनन्या अमेरिका लौट गईं लेकिन दृष्टिबाधित छात्र-छात्राओं के शब्द लगातार उनके कानों में गूंजते रहे। वह अपनी पॉकेट मनी के पैसे धीरे-धीरे जोड़ने लगीं। इसके साथ ही इस मिशन में उन्होंने कुछ अन्य छात्र-छात्राओं को शामिल कर लिया। इस तरह उन्होंने करीब दो लाख रुपए इकट्ठे कर डाले।

इसके बाद वह फिर भारत लौटीं और यहीं से सात लैपटॉप खरीदे। दृष्टिबाधित छात्रों की फिजिकल स्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने स्क्रीन रीडर समेत अन्य जरूरत के साफ्टवेयर उन सातो लैपटॉप में इंस्टॉल कराए। गत दिवस एनआईवीएच, देहरादून में आयोजित संक्षिप्त कार्यक्रम में उन्होंने अपने हाथों से सात दृष्टिबाधित बच्चों को लैपटॉप समर्पित कर दिए। किन छात्रों को पहले लैपटॉप दिए जाएं, इसके लिए उन्होंने बार-बार स्क्रीनिंग की। इसके बाद सात जरूरतमंद बच्चों का चयन किया गया। उनके छोटे नाना कर्नल प्रदीप गोयल ने बताते हैं कि ऐसे बच्चों को चुना गया, जिन्हें लैपटॉप की जरूरत हो और वह अपवंचित वर्ग के हों। इसके लिए बच्चों से कई बार बातचीत भी करनी पड़ी।

इसी तरह दो साल पहले भाटपाररानी, देवरिया (उ.प्र.) के चार छात्रों आशीष जायसवाल, अभिनव पाठक, अमजद हुसैन व मोहम्मद सलीम के मन में पढ़ाई के साथ स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने का विचार आया तो उन्होंने वह कर दिखाया, जिसे लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी स्थानीय निकाय एवं पंचायतें नहीं कर सकी थीं। किसी तरह पैसे जुटाकर इन युवाओं ने अपने पास से 30 कूड़ा पात्र खरीदकर विभिन्न स्थानों पर रखवाए हैं। स्वच्छता का सपना पूरा करने के लिए जब ये युवा सड़कों पर उतरे तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस सफर में वे बढ़ते गए, युवा जुड़ते गए। वे सबसे पहले कस्बे में झाड़ू लेकर निकले और पूरे दिन सफाई की। पहले तो लोगों ने इसे हल्के में लिया, लेकिन जब सफाई दिखने लगी तो फिर लोग साथ आते गए और कारवां बढ़ता गया।

इस समय इन युवाओं की टीम में 150 सदस्य हैं। प्रत्येक शनिवार को यह टोली एक गांव या कस्बे के किसी हिस्से को चुनती है और वहां सफाई कर लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करती है। उनके प्रयास से फल, चाट का ठेला लगाने वाले दुकानदार भी कचरा निस्तारण के लिए कूड़ापात्र रखने लगे हैं। 60 प्रतिशत दुकानों पर इन युवाओं का यह प्रभाव दिखता है।

अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, निकट अतीत में अनिता शर्मा ने दृष्टिबाधित छात्र या छात्राओं की सहायता के लिए 'वाइस फॉर ब्लाइंड' संगठन बनाया है। उनका कहना है कि हमारे समाज का यह सच नहीं, रूढ़ि है कि दृष्टिबाधित बच्चों को एक विशेष प्रकार की शिक्षा (ब्रेल लिपि) के माध्यम से ही पढ़ाया जा सकता है। कोई भी शिक्षित व्यक्ति दृष्टिबाधित बच्चों को पढ़ा सकता है। उसके लिए ब्रेल लिपि का ज्ञान अनिवार्य नहीं है। उनकी शिक्षा-दिक्षा भी सरकार द्वारा चलाए गये पाठ्यक्रम के अनुसार ही होती है। सामान्यतः कक्षा आठवीं तक सरकारी पाठ्यक्रम की पुस्तकें ब्रेल लिपि में उपलब्ध हैं। कक्षा नौवीं से आगे की कक्षाओं के लिए ब्रेल लिपि में पर्याप्त अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है जिसके लिए पाठ्य सामग्री को दृष्टिसक्षम लोग रेकार्ड करते हैं और उस रेकार्ड की गई अध्ययन सामग्री को दृष्टिबाधित बच्चे सुनकर याद करते हैं।

अब सवाल उठता है कि आप उनकी सहायता कैसे कर सकते हैं? आप उनकी पाठ्य सामग्री को रेकार्ड कर सकते हैं। आज के समय में ज्यादातर लोगों के पास कम्प्यूटर या लैपटॉप उपलब्ध है और स्मार्ट फोन भी, जिसमें रिकार्डिंग की सुविधा होती है। इसके अलावा आप ऑडेसिटि या जेट ऑडियो सॉफ्टवेयर को गूगल से डाउनलोड कर सकते हैं और उसके माध्यम से आप दृष्टीबाधित बच्चों के लिए उनकी आवश्यकता के अनुसार पाठ्य पुस्तिका या जो 20-30 प्रश्न-उत्तर की गाइड आती है, उसे रेकार्ड कर सकते हैं। आप जब ऐसे बच्चों से जुड़ेंगे तो वो स्वंय ही आपको किताब देंगे। इसे आपको खरीदना नहीं है। सिर्फ आपको अपना अमूल्य समय रिकार्डिंग के माध्यम से उनको देना होगा। रिकार्ड की गई पाठ्य सामग्री की सीडी बनाकर उनको देनी होगी। यदि आप सीडी का व्यय उठाने में सक्षम हैं तो आप अपने पास से भी सीडी दे सकते हैं अन्यथा आप उन बच्चों से पुस्तक के साथ खाली सीडी भी ले सकते हैं।

कई दृष्टिबाधित बच्चों की सालभर की मेहनत परीक्षा के समय सहलेखक के अभाव में व्यर्थ हो जाती है। आप उनके लिए परीक्षा के समय सहलेखक का कार्य कर सकते हैं। इसके अंर्तगत दृष्टिबाधित बच्चे उत्तर बोलते हैं आपको उन उत्तरों को उत्तर-पुस्तिका पर लिखना होता है और पेपर पढ़कर उनको प्रश्न बताना होता है। बैंक, रेलवे तथा अन्य प्रशासनिक प्रवेश परिक्षाएं ज्यादातर रविवार को आयोजित होती हैं। इसमें भी सहलेखक की आवश्यकता होती है। आप अपने आस-पास के कक्षा 11वीं एवं 12वी के बच्चों को सहलेखक कार्य के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। जो लोग रिटायरमेंट के बाद घर में रहते हैं, वह भी अपने अनुभवों से दृष्टिबाधित बच्चों को आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं तथा अपनी शैक्षणिक योग्यता का लाभ उन्हे पढ़ा कर दे सकते हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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