यौन शोषण का दर्द झेल चुकी एक महिला कैसे बदल रही हैं समाज की रूढ़िवादी सोच, ज़रूर पढ़ें

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औरत जिसे जननी कहते हैं इसके कई रूप हैं एक मॉ, एक पत्नी, एक बहन, एक बेटी। लेकिन पुरुष प्रधान समाज ने इसी औरत को दबाने की कोशिश की है। उसे परदा करने के लिए कहा जाता है, स्कूल जाने से रोका जाता है, अकेले घूमने फिरने की आजादी नहीं होती। कोशिश होती है महिला को घर में ही कैद करने की। समाज में फैली ऐसी ही कुरीतियों को दूर करने की कोशिश कर रहीं हैं उत्तर प्रदेश के मुज्जफ्फरनगर में रहने वाली रेहाना अदीब। जो महिलाओं को शोषण से मुक्ति, उनको न्याय और सम्मान दिलाने का काम कर रही हैं।


रेहाना जब छोटी थीं तब उनके साथ उनके अपनों ने यौन शोषण किया। वो बताती है, 

“जब मैं 17-18 साल की थीं तब जानती थीं कि मेरे साथ कुछ गलत हुआ है। मैंने सुना था कि जिनके साथ गलत होता है उनका कोई साथ नहीं देता है। इसलिए इसकी शिकायत किसके पास करनी है, कहां जाना है? मैं नहीं जानती थीं।” 

तब वो ‘दिशा’ नाम एक संगठन के साथ जुड़ गई और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों के विरोध में होने वाले धरना प्रदर्शनों में वो बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगीं।


रेहाना बताती हैं कि 

"मैंने बचपन से देखा था कि लड़कियों से हमेशा कहा जाता था कि मेला देखने मत जाओ, सड़क पर सिर झुका के चलो, पर्दा करो, सिर ढक कर चलो। इससे मेरा मन बड़ा ही क्षुब्ध होता था कि ये सारी बंदिशे लड़कियों पर ही क्यों, लड़कों को क्यों कुछ नहीं कुछ कहा जाता।” 

रेहाना कहती हैं कि इंसान तभी कुछ करने की सोचता है जब उसे लगता है कि कुछ गलत हो रहा है और कैसे इसे सुधारा जाये। इसी सोच के साथ उन्होंने साल 1989 में अपने संगठन ‘अस्तित्व’ की स्थापना की। इस समय इनके संगठन में 18-20 कार्यकर्ता काम कर रहे हैं और करीब 6 हजार महिलाएं इनके संगठन से जुड़ी हैं। इनका संगठन मुज्जफ्फर नगर और सहारनपुर में काम कर रहा है।


रेहाना का संगठन गांवों, शहरों और कस्बों में लड़कियों और महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ता है। शुरूआत में उन्होंने महिलाओं से जुड़े छोटे मुद्दों को उठाया। वे लोगों को समझातीं थी की वे लड़कियों को भी लड़कों के समान अवसर दें। उन्हें भी आगे बढ़ने का हक है। धीरे धीरे वो रेप, दहेज और महिलाओं से जुड़े दूसरे मुद्दों को भी जोर शोर से उठाने लगीं। रेहाना अपने संगठन के जरिये उन लड़कियों की पढ़ाई दोबारा शुरू करवाती हैं जिनकी पढ़ाई किसी कारणवश बीच में छूट गयी हो। वो बाल विवाह रोकने का काम करती हैं और बच्चों के परिवार वालों को समझाती हैं की कम उम्र में शादी से क्या नुकसान हैं। साथ ही वो उन्हे उच्च शिक्षा के लिए भी प्रेरित करती हैं। इसके लिए वो अनेक स्कूल के साथ जुड़ी हैं।


रेहाना कहती हैं, 

"हमारी लड़ाई मर्दों से नहीं है बल्कि उस सिस्टम से है जो महिलाओं और पुरुषों में भेद करता है। जबकि हमारा संविधान कोई लिंग भेद की बात नहीं करता। तो समाज के कुछ लोग जो अपने को धर्म का ठेकेदार समझते हैं, क्यों भेद करते हैं।” 

रेहाना मानती है कि उनकी सबसे बड़ी लड़ाई लड़कियों के साथ होने वाले यौन शोषण से है। वे कहतीं हैं कि वे जब तक जीवित हैं तब तक इसके खिलाफ लड़तीं रहेंगीं, क्योंकि इससे लड़कियां इतनी कुंठित हो जाती हैं कि उनका उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। साम्प्रदायिक तौर पर संवेदनशील रहे मुज्जफरनगर और सहारनपुर में रेहाना ने पर्दा प्रथा के खिलाफ लगातार आवाज उठाती रहती हैं। उनका मानना है कि पर्दे में महिला की ऊर्जा और गतिशीलता कम हो जाती है। हर महिला को अपनी संस्कृति और सभ्यता का सम्मान दिल से करना चाहिए। अगर महिलाओं के दिल में इसके लिए सम्मान नहीं है तो पर्दा करने से क्या फायदा। रेहाना मानती हैं कि जहां पर वो काम कर रही हैं वो एक ऐसा क्षेत्र है जहां हिंदू-मुस्लिम समान अनुपात में रहते हैं। यहां पर धर्म के नाम पर दंगे कराये जाते हैं। इसलिए वो लोगों को समझाती हैं कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है जिस दिन इंसानियत खत्म हो जाएगी ये दुनिया भी उसी दिन समाप्त हो जाएंगी।


अपनी चुनौतियों के बारे में उनका कहना है कि उन्हें खाप और काठ पंचायतों से धमकी मिलती रहती है। उन्हें उन स्कूलों के शिक्षकों से भी विरोध का सामना करना पड़ता है जहां के सिस्टम में वो सुधार की मांग करती हैं। यही वजह है कि लगातार उनको फोन और दूसरे तरीकों से धमकियां मिलती रहती हैं। इतना ही नहीं अपना काम चलाने के लिए उनको बार बार जगह बदलनी पड़ती है। वो बताती हैं कि हिंदू उनसे कहते हैं कि तुम हिंदू परिवार में पैदा नहीं हुई इसलिए तुम उनकी बेटी नहीं हो। जबकि मुसलमान कहते हैं कि तुम पर्दा नहीं करती हो और तुमसे मिलने के लिए पुलिस, पत्रकार और दूसरे पुरूष आते हैं। ऐसे में जब तुम ही नहीं सुधरी हो तो तुम दूसरी औरतों को क्या सुधारोगी। बावजूद वो मानती हैं कि 

“हम भारतीय मुसलमान महिलाएं हैं और हम भारतीय संविधान के मुताबिक ही अपने अधिकार चाहती हैं, ना की धर्म के ठेकेदारों के बनाए गये कानूनों के मुताबिक।” 
I would like to quote myself as ‘a writer by chance’, as fate wants me to write. Now, writing has become my passion, my child, my engagement, and my contentment. Worked as a freelance writer in gathering social and youth oriented real stories.

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