शादी-ब्याह में सजा हुआ घर लगता है रेल का ये डिब्बा, यात्री खुद करते हैं देखरेख

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 नासिक और मुंबई के बीच घूमने वाले लोग पंचवटी एक्सप्रेस के इस 'आदर्श' कोच के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं कि इसका रख रखाव खुद यात्री करते हैं। हालांकि इस कोच में केवल वे यात्री ही यात्रा कर सकते हैं जिनके पास मासिक सीजन (एमएसटी) का टिकट हो। वे हर रोज इस कोच से आ और जा सकते हैं।

ट्रेन के अंदर का नजारा
ट्रेन के अंदर का नजारा
शराब पीने, तंबाकू खाने और कार्ड खेलने पर सख्त प्रतिबंध के अलावा, आदर्श कोच के यात्री स्वच्छता दिशानिर्देशों का पालन करते हैं, दिन के दौरान लाइट बंद करते हैं, सीट कवर और पर्दे बदलते हैं, नियमित कीट नियंत्रण का इस्तेमाल करते हैं और छोटी-छोटी रखरखाव की जरूरतों का ख्याल रखते हैं !

'रेलवे आपकी संपदा है, कृपया इसे गंदा न करें' ये लाइन आपको लगभग हर रेलवे स्टेशन पर लिखी हुई मिल जाएगी। लेकिन इसका पालन शायद ही कोई करता हो। रेलवे स्टेशन पर अक्सर गंदगी की शिकायतें आती रहती हैं। यहां तक कि रेल डिब्बे के अंदर भी आपको कई बार गंदगी को लेकर शिकायत करनी पड़ी होगी। लेकिन पंचवटी एक्सप्रेस का एक डिब्बा ऐसा भी है जिसमें बैठते ही आपको किसी शादी-ब्याह से सजे घर का अनुभव होगा।

पंचवटी एक्सप्रेस के सी-3 डिब्बे ने पिछले साल अपनी दसवीं सालगिरह मनाई। नासिक और मुंबई के बीच घूमने वाले लोग पंचवटी एक्सप्रेस के इस 'आदर्श' कोच के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं कि इसका रख रखाव खुद यात्री करते हैं। हालांकि इस कोच में केवल वे यात्री ही यात्रा कर सकते हैं जिनके पास मासिक सीजन (एमएसटी) का टिकट हो। वे हर रोज इस कोच से आ और जा सकते हैं।

द हिंदू की खबर के मुताबिक, रेलवे कर्मचारियों द्वारा नियमित सफाई के अलावा, इस कोच की देखरेख अपने यात्रियों द्वारा की जाती है। यात्री झाड़ू लगाने और फ्लोर की सफाई करने या जाले हटाने को लेकर बिना सोचो समझे सफाई में लग जाते हैं। आपको बता दें कि ये कोच किसी भी तरह के प्लास्टिक कचरे से मुक्त होता है। इसके अंदर डस्टबिन को अच्छे से रखा गया है। इसके अलावा पेस्ट कंट्रोल भी इस कोच के अंदर रखा है। कोच प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स से लैस है, जिसमें नियमित यात्रियों के नाम और उनके विवरण हैं, जिनको पास मुफ्त सेवाएं मिलती हैं। यात्रियों को एमएसटी खरीदने से लेकर दुर्घटना बीमा कवर के बारे में सहायता प्रदान की जाती है।

अपने अनुभव के बारे में बताते हुए, रेल परिषद नाम की एनजीओ के अध्यक्ष बिपिन गांधी, जिन्होंने रेलवे से यात्रियों को यहां शामिल होने की इजाजत दिलाने में मदद की, वे कहते हैं कि, रेलवे अधिकारी मुझ पर हंसते थे। लेकिन अब मुझे लगता है कि मैंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है। यात्रियों के बीच जागरूकता की आवश्यकता थी और मैंने सोचा कि क्यों एक कोच से शुरू ही इसे शुरू किया जाए।?

2001 में, बिपिन ने अपने एनजीओ, रेल परिषद की स्थापना की, और अगले कुछ वर्षों में आदर्श कोच की अवधारणा पर विचार-विमर्श करने वाले साथियों के साथ इस पर चर्चा की। 2007 में, रेल परिषद के 20 सदस्यों के एक प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय रेलवे के अधिकारियों से मुलाकात की और पंचवटी एक्सप्रेस पर एक विशेष कोच को प्राप्त करने में सफल रहे। जिसके बाद 29 मार्च, 2007 को आदर्श कोच पहल भारतीय रेलवे से पूर्ण समर्थन के साथ शुरू की गई। रेल परिषद टीम द्वारा लिया गया पहला कदम साढ़े तीन घंटे की यात्रा को चार सीजन में विभाजित करना था, प्रत्येक सीजन एक अलग एक्टिविटी के लिए समर्पित था।

नासिक और इगतपुरी स्टेशनों (7 से 8 बजे) के बीच पहला सत्र समाचार पत्र पढ़ने और व्यक्तिगत कॉल का जवाब देने के लिए रिजर्व था। इगतपुरी और कसरा (सुबह 8 बजे से 8.30 बजे) के बीच अगला स्लॉट नाश्ता का समय था। कसरा और कल्याण के बीच अगले 10 मिनट यात्रियों के लिए चुप रहने और मेडिटेट करने के लिए थे, जबकि कल्याण से दादर तक यात्रा के अंतिम भाग फोन कॉल और वार्तालापों के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

स्नूजपोस्ट के मुताबिक, ट्रेन में प्रथम श्रेणी के सीजन टिकट रखने वाले यात्रियों को कोच में सफर करने की अनुमति होती है साथ ही सभी को रेलवे के नियमों का पालन करना पड़ता है। यही नहीं ये कोच आपको, मोबाइल फोन का इस्तेमाल, शराब, तंबाकू और कार्ड खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता है। शराब पीने, तंबाकू खाने और कार्ड खेलने पर सख्त प्रतिबंध के अलावा, आदर्श कोच के यात्री स्वच्छता दिशानिर्देशों का पालन करते हैं, दिन के दौरान लाइट बंद करते हैं, सीट कवर और पर्दे बदलते हैं, नियमित कीट नियंत्रण का इस्तेमाल करते हैं और छोटी-छोटी रखरखाव की जरूरतों का ख्याल रखते हैं !

गांधी आगे कहते हैं कि, 'हम अब उन्हें यात्री नहीं बुलाते वे अब हमारे सदस्य हैं। वर्तमान में हम 400 'सदस्य' हैं और ये नंबर बढ़ रहा है।' ट्रेन ने अपने इस खास कोच में कई विशेष अवसरों जैसे जन्मदिन और सालगिरह की मेजबानी की है। 2013 में, नासिक के एक जोड़े ने इसी कोच में शादी कर लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया था। दरअसल इसे पहली ट्रेन में हुई शादी कहा जा रहा है। 

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