बहुत कठिन है डगर नोबेल की

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नोबेल पुरस्कार विश्व का सबसे बड़ा पुरस्कार है। इसकी स्थापना महान वैज्ञानिक अल्फ्रेड बेर्नहार्ड नोबेल के नाम पर हुई है। जिस तरह अल्फ्रेड नोबेल का जीवन बड़ी ही कठिनाइयों में बीता लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी, उसी तरह ज्यादातर नोबले विजेता का जिंदगीनामा प्रेरक भले रहा है लेकिन हजार तरह की मुश्किलों से भरा भी रहा है... आईये एक नज़र डालें...!!

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
आज जब इस साल अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता रिचर्ड थेलर भारत की नोटबंदी की तारीफ कर रहे हैं तो एक तरफ 13 बैंकों की ओर से केंद्र सरकार को फर्जी कंपनियों के बारे में जानकारी मुहैया कराने की बात सुर्खियों में है, दूसरी तरफ नोबेल पुरस्कार की कठिन राह यह सिखाती है कि फर्श से अर्श पर पहुंचने के बीच इतने बड़े इनाम के हकदारों को कितनी तरह की कठिनाइयों से जीवन में दो-चार होना पड़ता है।

हर साल उन पांच लोगों को नोबल पुरस्कार दिया जाता है, जिन्होंने भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, साहित्य और शांति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया हो। आरंभ में पुरस्कार विजेता को 10 से 15 लाख दिए जाते थे। अब पुरस्कार राशि 36-37 लाख है।

नोबेल पुरस्कार विश्व का सबसे बड़ा पुरस्कार है। इसकी स्थापना महान वैज्ञानिक अल्फ्रेड बेर्नहार्ड नोबेल के नाम पर हुई है। जिस तरह अल्फ्रेड नोबेल का जीवन बड़ी ही कठनाइयों में बिता लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी, उसी तरह ज्यादातर नोबले विजेता का जिंदगीनामा प्रेरक भले रहा है लेकिन हजार तरह की मुश्किलों से भरा। सच ये रहा है कि ऐसे लोग अपनी मंजिल पर पहुंचकर ही थमे, रुके हैं, भारत में चाहें वह मदर टेरासा रही हों, रवींद्रनाथ टैगौरे, अमर्त्य सेन या कैलास सत्यार्थी।

आज जब इस साल अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता रिचर्ड थेलर भारत की नोटबंदी की तारीफ कर रहे हैं तो एक तरफ 13 बैंकों की ओर से केंद्र सरकार को फर्जी कंपनियों के बारे में जानकारी मुहैया कराने की बात सुर्खियों में है, दूसरी तरफ नोबेल पुरस्कार की कठिन राह यह सिखाती है कि फर्श से अर्श पर पहुंचने के बीच इतने बड़े इनाम के हकदारों को कितनी तरह की कठिनाइयों से जीवन में दो-चार होना पड़ता है। भारत में सबसे पहला नोबल पुरस्कार 1913 में महान कवि रविन्द्र नाथ टैगोर को दिया गया था। इसके आलावा डॉ. सीवी रमन, डॉ. हरगोविंद खुराना, अमर्त्य सेन, मदर टेरेसा और कैलाश सत्यार्थी को मिला है। इन सभी नोबेल विजेताओं की कठिनाइयों से भरी जिंदगी संदेश देती है कि अपनी मेहनत और प्रतिभा से व्यक्ति जीवन में कोई भी बड़ी से बड़ी ऊंचाई हासिल कर सकता है। 

मदर टेरेसा ने बेसहारा और बेघर लोगों की मदद की। गरीब और बीमार लोगों की सेवा के लिए उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी नाम की संस्था बनाई और कुष्ठ रोगियों, नशीले पदार्थों की लत के शिकार बने लोगों और दीन-दुखियों के लिए निर्मल हृदय नाम की संस्था बनाई। कैलाश सत्यार्थी भारतीय बाल अधिकार कार्यकर्ता और बाल श्रम विरोधी हैं। उन्होंने 1980 में बचपन बचाओ आंदोलन की स्थापना की, जिसके बाद विश्व भर के 144 देशों के 83 हजार से अधिक बालश्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य किया। ज्यादातर नोबेल विजेताओं की जिंदगी कठिनाइयों भरी रही है। पाकिस्तान की नोबेल विजेता मलाला युसूफजई की जिंदगी की हकीकतों से दुनिया में भला कौन परिचित नहीं होगा।

उल्लेखनीय है कि नोबेल पुरस्कार विश्व का सबसे बड़ा पुरस्कार है। इसकी स्थापना महान वैज्ञानिक अल्फ्रेड बेर्नहार्ड नोबेल के नाम पर हुई है। अल्फ्रेड नोबेल का जीवन बड़ी ही कठनाइयों में बिता लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद कड़े परिश्रम से उन्होंने कई बड़े अविष्कार किये जिनमे सबसे मुख्य था डायनामाइट। बाद में अल्फ्रेड नोबल की गिनती संसार के सबसे धनी व्यक्तियो में होने लगी। उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। अल्फ्रेड नोबल की मृत्यु के बाद 1897 में उनकी वसीयत को खोलकर पढ़ा गया तो सभी दांग रह गए। उसमें लिखा था कि उनकी सारी जायदाद बेच कर उससे जो भी धन प्राप्त हो, उसे बैंक में जमा कर दिया जाए। उस धन से जो ब्याज की रकम प्राप्त हो, उससे हर साल उन पांच लोगों को पुरस्कार दिए जाएं, जिन्होंने भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, साहित्य और शांति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया हो। आरंभ में पुरस्कार विजेता को 10 से 15 लाख दिए जाते थे। अब पुरस्कार राशि 36-37 लाख है।

नोबेल पुरस्कार में पदक के साथ लगभग 5.35 करोड़ रुपये इस बार दिए जा रहे हैं। साहित्य के नोबेल पुरस्कार का ऐलान होने वाला है। स्वीडिश अकादमी बताएगी कि उसने नोबेल साहित्यकार की रचनाओं में क्या देखा और उससे ज्यादा आलोचक और समीक्षक उस पर प्रकाश डालेंगे। अकाडेमी विजेताओं का नाम तय करती है। नाम तय करने की प्रक्रिया में पहले कुछ लोगों की लिस्ट तैयार की जाती है और उन पर कमिटी के सदस्य वोट करते हैं। जानकारी के मुताबिक इमारत में एक स्टेज होता है, जहां एक बॉक्स रखा जाता है और हर सदस्य वहां ऊपर जाकर अपना मत देता है और नीचे आता है। वहीं से विजेताओं को फोन कर बताया जाता है कि नोबेल के लिए उनको चयनित किया जा चुका है।

साहित्य में नोबेल पाने वाले अमेरिकी कवि गीतकार बॉब डिलन पुरस्कार लेने के लिए नहीं गए थे। नोबेल विजेता ने अपने पत्र में व्यक्त सम्बोधन में कहा था कि मैं सड़क पर निकला हुआ था, जब मुझे हैरान करने वाली यह खबर मिली और कायदे से इसे समझने में मुझे कुछ मिनटों का वक्त भी लग गया। मैंने महान साहित्यिक शख्सियत, विलियम शेक्सपियर के बारे में सोचना शुरू किया। मैंने अनुमान लगाया कि वह खुद को नाट्यकार समझता होगा। वह साहित्य की रचना कर रहा था, यह ख्याल उसके जेहन में आया भी न होगा। उसके शब्द मंच के लिए लिखे गए थे। बोले जाने के लिए, पढऩे के लिए नहीं। जब वह हैमलेट लिख रहा था, मुझे यकीन है कि वह बहुत सी जुदा बातों के बारे में ही सोच रहा था। कलाकार के रूप में, मैंने 50 हजार लोगों के सामने भी प्रस्तुतियां दी हैं और 50 लोगों के सामने भी और मैं आपको बता सकता हूं कि 50 लोगों के सामने खड़ा होना ज्यादा कठिन होता है। 50 हजार लोगों का तो एक अकेला आकार बन जाता है लेकिन 50 लोगों के साथ ऐसा नहीं होता। हर शख्स का एक स्वरूप है, एक अलग पहचान, खुद में एक समूची दुनिया। वे ज्यादा स्पष्टता से चीजें समझते हैं। आपकी ईमानदारी और आपकी प्रतिभा की गहराई से उसका नाता, देख लिया जाता है। 

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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