16 साल के लड़के ने किया देश का नाम ऊंचा, जीता 2.9 करोड़ का साइंस पुरस्कार

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बेंगलुरु में रहने वाले समय गोडिका को ब्रेकथ्रू जूनियर चैलेंज पुरस्कार मिला है। इस पुरस्कार के तहत उन्हें 2.9 करोड़ रुपये की धनराशि और उनके स्कूल को भी 72 लाख रुपये का पुरस्कार मिला। 

इस प्रतियोगिता की बीते साल 1 सितंबर को हुई थी जिसमें 13 से 18 साल के छात्रों को रिसर्च करने के लिए लाइफ साइंस, गणित या फिजिक्स विषय से जुड़े जटिल मुद्दों पर विडियो बनाने थे।

बेंगलुरु के 16 साल के समय गोडिका ने ऐसा कारनामा कर दिया है जिससे उनके घर-परिवार और स्कूल से लेकर पूरा देश गर्व कर रहा है। दरअसल समय को ब्रेकथ्रू जूनियर चैलेंज पुरस्कार मिला है। इस पुरस्कार के तहत उन्हें 2.9 करोड़ रुपये की धनराशि और उनके स्कूल को भी 72 लाख रुपये का पुरस्कार मिला। इतना ही नहीं नेशनल स्कूल में पढ़ने वाले समय को 250,000 यानी लगभग 1.8 करोड़ रुपये की कॉलेज स्पॉन्सरशिप भी मिलेगी जो कि उनकी आगे की पढ़ाई और रिसर्च में मदद करेगी।

समय ने लाइफ साइंस के क्षेत्र में अपना आइडिया दिया था। दरअसल कैंसर, अल्जाइमर या पार्किन्सन जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए सिर्फ मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं होती। व्रत या भूखे रहने और सेल्फ-क्लीनिंग सिस्टम के पीछे काम करने वाला मैकेनिज्म, ऑटोफजी न केवल आपको स्वस्थ रखने में मदद करता है बल्कि इस तरह की गंभीर न्यूरोलॉजिकल और बायोलॉजिल बीमारियों से दूर रखने में भी मदद करता है। इसी आइडिया से प्रेरित होकर नेशनल पब्लिक स्कूल कोरमंगला (बेंगलुरु) से पढ़ाई करने वाले समय गोडिका ने वीडियो बनाया था।

बीते साल सितंबर में समय ने इस विषय पर बने वीडियो को 'ब्रेकथ्रू जूनियर चैलेंज' में सबमिट किया था। उन्हें टॉप-30 में भी जगह मिली थी। इसके बाद वीडियो पर आने वाली प्रतिक्रियाओं के आधार पर विजेता का चयन किया गया। इस प्रतियोगिता को फेसबुक, गूगल और खान अकैडमी ने स्पॉन्सर किया था। ब्रेकथ्रू चैलेंज में एंगेजमेंट, क्रिएटिविटी, सजावट और कठिनाई जैसे मुख्य कारकों पर फोकस किया जाता है।

इस प्रतियोगिता की बीते साल 1 सितंबर को हुई थी जिसमें 13 से 18 साल के छात्रों को रिसर्च करने के लिए लाइफ साइंस, गणित या फिजिक्स विषय से जुड़े जटिल मुद्दों पर विडियो बनाने थे। समय ने दुनियाभर के 6,000 स्टूडेंट्स को पीछे करते हुए सेमीफाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली थी। इसके बाद विजेता और उपविजेताओं की घोषणा की गयी। समय ने कहा, 'मेरे कुछ रिश्तेदार न्यूरो की समस्या से पीड़ित हैं इसलिए मैंने उनकी समस्याओं को लेकर रिसर्च करना शुरू किया। इस विषय ने मेरे भीतर कौतूहल पैदा किया और पता चला कि व्रत रखने या भूखे रहने से इन बीमारियों को खत्म करने में काफी मदद मिलती है।

समय योशिनोरी ओशुमी के काम से काफी प्रभावित हैं जिन्हें साल 2016 के लिए मेडिसिन के क्षेत्र में उनके सेल्युलर ऑटोफजी काम में नोबल पुरस्कार मिला है। इस प्रतियोगिता में दुनिया के 8 भौगोलिक क्षेत्रों के स्टूडेंट्स शामिल हैं। इसमें भारत, एशिया (चीन समेत), मिडल ईस्ट (अफ्रीका), यूरोप, ऑस्ट्रेलिया/ न्यूजीलैंड, साउथ अमेरिका, नॉर्थ अमेरिका, सेंट्रल अमेरिका/ मैक्सिको के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। समय ने अपने विडियो में इस बायोलॉजिकल प्रोसेस को कई सारे अनोखे और दिलचस्प एनिमेटेड स्टोरी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है। उन्होंने बताया कि क्षतिग्रस्त हो चुके अंग और ऊतक सड़-गल कर एनर्जी क्रिएट करते हैं जिससे बीमारियों को खत्म करने में काफी मदद मिलती है।

समय के इस आइडिया में उनकी टीचर प्रमिला मेनन ने काफी मदद की। प्रमिला समय की क्लासटीचर भी रह चुकी हैं और उन्होंने ही समय को इस आइडिया के बारे में बताया था। हालांकि उन्हें भी इस काम के लिए इनाम मिला। पुरस्कार के तौर पर प्रमिला को 50,000 डॉलर यानी लगभग 36 रुपये मिलेंगे। समय की वजह से ही उनके स्कूल नेशनल पब्लिक स्कूल को 72 लाख रुपये मिलेंगे जिससे कि एक हाई क्वॉलिटी साइंस लैब विकसित की जाएगी। समय ने कहा, 'मैं न्यूरोसाइंस में उच्च शिक्षा हासिल करना चाहता हूं और इस स्कॉलरशिप में मुझे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में पढ़ने का रास्ता आसान हो जाएगा।'

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