जो कभी करती थी दूसरों के घरों में काम, अब करेगी देश की संसद को संबोधित

बेंगलुरू के स्लम में रहने वाली 17 वर्षीय कनक को बुलाया गया यूनिसेफ की तरफ से आयोजित प्रोग्राम में...

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 इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार 1 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे इस काल के गाल में फंसकर अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं उससे भी भयावग बात यह है कि इनमें से 70 प्रतिशत तो अकेली लड़कियां हैं। 

कनक फोटो साभार- न्यू इंडियन एक्सप्रेस
कनक फोटो साभार- न्यू इंडियन एक्सप्रेस
17 साल की कनक उन 30 बच्चों में से एक है जिन्हें यूनिसेफ की ओर से आयोजित किए जाने वाले प्रोग्राम में बुलाया गया है। इस प्रोग्राम में देशभर के कोने-कोने से ऐसे बच्चों को चुना गया है। 

आगामी 20 नवंबर को संसद में होने वाले आयोजन में कनक कर्नाटक का प्रतिनिधित्व करेगी और वह वहां पर 8 मिनट तक बोलेगी। उसे यहां तक पहुंचने के लिए तीन राउंड का ऑडिशन भी देना पड़ा जहां उसने कई राज्यों के बच्चों को पीछे छोड़ दिया।

देश के तमाम जरूरी मुद्दों के बीच बाल श्रम ऐसा मुद्दा है जिसकी समस्या देश के हर कोने में व्याप्त है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार 1 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे इस काल के गाल में फंसकर अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं उससे भी भयावग बात यह है कि इनमें से 70 प्रतिशत तो अकेली लड़कियां हैं। ऐसी ही एक लड़की कनक, जिसने अपने 12 साल एक बाल मजदूर के रूप में बिताए हैं, आने वाले 20 नवंबर को अब देश की संसद में बाल अधिकारों के बारे में बात करेगी। कनक ने अपने जीवन के सबसे कीमती दिन यानी अपना बचपन मजदूरी करने में गुजारा है।

17 साल की कनक उन 30 बच्चों में से एक है जिन्हें यूनिसेफ की ओर से की ओर से आयोजित किए जाने वाले प्रोग्राम में बुलाया गया है। इस प्रोग्राम में देशभर के कोने-कोने से ऐसे बच्चों को चुना गया है। कर्नाटक से जाने वाली कनक इकलौती लड़की है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि देशभर के बच्चे संसद को संबोधित करेंगे। कनक का बचपन बेंगलुरु के स्लम इलाके में गुजरा। उसकी मां दूसरे घरों में मेड का काम करती थीं तो वहीं पिता शारीरिक लाचारी की वजह से घर में ही कैद रहते थे। उसकी मां ने किसी तरह से जतन करके कनक को स्कूल भेजा, लेकिन कुछ ही दिन में पता चला कि उन्हें कैंसर की समस्या है।

इससे कनक की पढ़ाई चौथी कक्षा में ही छूट गई। दुख का पहाड़ तब टूटा जब कनक की मां ने उनका साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया और उनका देहांत हो गया। ऐसे में कनक को खाने के लाले पड़ रहे थे। इसलिए उसने घर चलाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। वह रोज तीन घरों में काम करने जाती थी जहां से उसे कुछ पैसे व खाने की चीजें मिल जाती थीं। कनक की मां का देहांत हो जाने के बाद उसे जबरन अपने रिश्तेदारों के साथ रहना पड़ा, जहां उसे कई तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ती थीं।

कनक के रिश्तेदार उसे शादी के गेस्ट हाउस में काम करने के लिए भेजते थे। वह अक्सर शादियों में काम करने के लिए जाती थी। ऐसे ही एक बार यशवंतपुर के एक मैरिज हॉल में शादी के दौरान वह काम कर रही थी कि तभी स्पर्श (SPARSH) एनजीओ के लोगों की नजर उस पर पड़ी। स्पर्श एनजीओ बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में काम करता है। यह 2011 की बात है। उन लोगों ने कनक को अपने साथ ले लिया और उसकी देखभाल करने लगे। आज वह अपनी पढ़ाई कर रही है। उसने 10वीं की परीक्षा में 80 प्रतिशत मार्क्स हासिल किए थे। वह बड़ी होकर वैज्ञानिक बनना चाहती है।

आगामी 20 नवंबर को संसद में होने वाले आयोजन में कनक कर्नाटक का प्रतिनिधित्व करेगी और वह वहां पर 8 मिनट तक बोलेगी। उसे यहां तक पहुंचने के लिए तीन राउंड का ऑडिशन भी देना पड़ा जहां उसने कई राज्यों के बच्चों को पीछे छोड़ दिया। कनक कहती है कि यह उसकी अब तक की जिंदगी का सबसे खूबसूरत लम्हा है। वह कहती है, 'मुझे लगता है कि बाल श्रम रोकने के लिए कई सारे कानून और प्रावधान हैं, लेकिन उनका असर न के बराबर होता है। मैं इसी के बारे में संसद में बात करने वाली हूं।' वह कहती है कि देश में उसके जैसे हजारों बच्चे हैं जो मजबूरी में मजदूरी करने लग जाते हैं।

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