अब कहां दफनाए जाएंगे मुर्दे: राजधानी दिल्ली में भर चुके हैं कब्रिस्तान

राजधानी दिल्ली में मरने वालों के लिए जगह नहीं! 

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मृतकों के लिए जगह एक ऐसी समस्या बन गई है, जिससे पूरी दुनिया का इंतज़ामिया जूझ रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में भी इस मुसीबत ने दस्तक दे दी है। दिल्ली सरकार को सौंपी गई अल्पसंख्यक आयोग की एक ताजा रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि नए कब्रिस्तान के इंतज़ामात किए जाएं क्योंकि पुराने कब्रिस्तान भर चुके हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
 जर्मनी जैसे कई देशों में वर्षों से कब्रों का दोबारा इस्तेमाल किया जाने लगा है। स्पेन और ग्रीस में तो कब्र की जगह ज़मीन के ऊपर शवकक्ष को किराए पर दिया जा रहा है, जहां शव कई साल तक पड़े रहते हैं।

देश की राजधानी दिल्ली में अल्पसंख्यक आयोग ने पिछले वर्ष ‘दिल्ली में मुस्लिम कब्रिस्तानों की समस्याएं एवं स्थिति’ पर ह्यूमन डेवलपमेंट सोसाइटी के माध्यम से एक विस्तृत आकलन कराया था, जिसके चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। बताया गया है कि दिल्ली में हर साल औसतन तेरह हजार मुस्लिमों का अंतिम संस्कार किया जाता है लेकिन पिछले साल तक उपलब्ध कब्रिस्तानों में 29,370 लोगों को ही दफनाने की जगह बची रह गई। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग (डीएमसी) की एक रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि ऐसे हालात में दफन के लिए कोई जगह मिलना मुश्किल हो रहा है, बशर्ते इस दिशा में तत्काल कोई जरूरी कदम न उठा लिया जाए।

दिल्ली के विभिन्न इलाकों में 704 मुस्लिम कब्रिस्तान हैं, जिनमें से केवल 131 में ही मृतकों को दफनाया जा रहा है। कुल 131 कब्रिस्तानों में से 16 पर मुकदमे चल रहे हैं, जिससे वहां किसी को दफनाया नहीं जा सकता है, जबकि 43 पर विभिन्न संस्थाओं ने अतिक्रमण कर लिया है। एक दिक्कत ये भी है कि ज्यादातर कब्रिस्तान छोटे हैं, जो 10 बीघा या उससे कम क्षेत्रफल वाले हैं और उनमें से 46 प्रतिशत कब्रिस्तान पांच बीघा या उससे कम क्षेत्रफल वाले हैं।

दरअसल, मृतकों के लिए जगह एक ऐसी समस्या बन गई है, जिससे पूरी दुनिया में इंतज़ामिया जूझ रहा है। इसी तरह वर्ष 2013 में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया था कि अगले 20 साल में इंग्लैंड के आधे कब्रिस्तानों में जगह पूरी तरह ख़त्म हो सकती है। कुछ साल पहले जॉन मैकमैनस की एक रिपोर्ट में दुनिया भर के कब्रिस्तानों पर जब नजर दौड़ाई गई तो कई रोचक और दुखद जानकारियां प्रकाश में आई थीं। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत ही नहीं, दुनिया के और भी कई हिस्सों में शवों को दफ़नाने या अंतिम संस्कार की समस्या गंभीर होती जा रही है। समय के साथ ये कब्रिस्तान लगभग भर चुके हैं। कई देशों में तो कब्रिस्तानों में जगह ही नहीं बची है और वहाँ कब्र किराए पर मिल रही हैं।

ब्रिटेन के शहर सबसे पहले इस समस्या की जद में आए, लेकिन देश की हरी-भरी जगहें भी इससे अछूती नहीं हैं। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की तरह उस समय भी समाधान दिया गया था कि पुरानी कब्रों से अवशेषों को हटा कर उसी कब्र में और गहरे दफनाया जाए ताकि उन्हें दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाया जा सके। जर्मनी जैसे कई देशों में वर्षों से कब्रों का दोबारा इस्तेमाल किया जाने लगा है। स्पेन और ग्रीस में तो कब्र की जगह ज़मीन के ऊपर शवकक्ष को किराए पर दिया जा रहा है, जहां शव कई साल तक पड़े रहते हैं। जब ये गल जाते हैं तो इन्हें सामुदायिक कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया जाता है, ताकि उस जगह को फिर से इस्तेमाल किया जाए सके।

गौरतलब है कि 24 दिसंबर 1999 को दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1999 के अंतर्गत इस संस्था का का गठन किया गया था। इस अधिनियम के अनुसार, अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदाय में मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में, भारत के संविधान द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रदान किये गये अधिकार और हितों की रक्षा करना इस आयोग के जरूरी दायित्व हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से जारी ह्यूमन डेवलपमेंट सोसाइटी की ताजा रिपोर्ट में कब्रिस्तानों के लिए भूमि आवंटन और अस्थायी क़ब्रों के प्रावधान आदि के महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए हैं।

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि अब अस्थायी क़ब्रों की तत्काल कोई व्यवस्था ज़रूरी हो गई है ताकि एक ही स्थान पर कुछ सालों बाद किसी अन्य को दफनाया जा सके और अतिक्रमण हटाकर नए क़ब्रिस्तान बनाने की शीघ्र पहल की जाए। यानी क़ब्रिस्तान के लिए नई ज़मीनों का आवंटन किया जाए। मौजूदा क़ब्रिस्तानों की चहारदीवारी बनाई जाएं। वहां गार्ड भी नियुक्त किए जाने चाहिए ताकि अतिक्रमण, कब्जे आदि की कोई अप्रिय स्थिति पैदा न हो।

भारत में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के तहत व्यवस्था दी गई है कि अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए रक्षा उपायों को लागू करने की वकालत करना आयोग का काम है। आयोग अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव की समस्या का अध्ययन तथा उसको दूर करने के लिए सुझाव देता रहता है। वह संवैधानिक तौर पर अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक तथा शैक्षिक विकास के मुद्दे का समय-समय पर अध्ययन और विश्लेषण करता रहता है। कब्रिस्तान संबंधी ताजा रिपोर्ट उसी अध्ययन का परिणाम है।

अल्पसंख्यकों के सामने आने वाली मुश्किलों से संबंधित रिपोर्ट समय-समय पर आयोग केंद्र एवं दिल्ली सरकार को उपलब्ध कराता रहता है। अभी साल जून में गुरदासपुर (पंजाब) अल्पसंख्यक सेल के चेयरमैन मुनव्वर मसीह ने पंचायत भवन में विभिन्न विभागों के अधिकारियों की बैठक में बताया था कि पंजाब के करीब-करीब सभी गांवों में मसीह समुदाय के श्मशानघाटों को लेकर कोई न कोई समस्या चल रही है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के कैराना (मुजफ्फरनगर) में इसी महीने अल्पसंख्यक समुदाय ने गुहार लगाई है कि घरों के गंदे पानी की निकासी के माकूल बंदोबस्त नहीं होने के कारण कब्रिस्तान तालाब बन गए हैं।

कस्बे में एक ओर मुस्लिम कब्रिस्तान हैं, तो दूसरी ओर हरीजन बच्चा कब्रिस्तान। दोनों में गंदा पानी जमा हो गया है, जिससे कब्रिस्तानों में मुर्दों की बेहुरमती हो रही है। दोनों समुदायों के लोग इस बारे में एसडीएम को अवगत करा चुके हैं। मोहल्लों में जल निकासी का माकूल इंतजाम नहीं है। घरों का गंदा पानी कब्रिस्तानों में जमा होने से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग गुस्से में हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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