समाज में जेंडर इक्वलिटी को लागू करवाने के लिए यह महिला बच्चों के साथ कर रही हैं काम

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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो-2015 की रिपोर्ट के अनुसार हर एक घंटे में 15 से 29 साल की उम्र का एक नौजवान आत्महत्या कर लेता है, जिसके लिए जिम्मेदार है हमारा समाज और हमारी शिक्षा व्यवस्था ...

अपर्णा विश्वनाथन (फोटो साभार- डेक्कन क्रॉनिकल)
अपर्णा विश्वनाथन (फोटो साभार- डेक्कन क्रॉनिकल)
अपर्णा अभी सीबीएसई बोर्ड से भी बात कर रही हैं ताकि स्कूलों में सोशल इंटेलिजेंस का दायरा बढ़ाया जा सके। उनका मानना है कि इससे बच्चे समझदार होंगे और महिलाओं के प्रति समाज की सोच भी बदलेगी। 

गांव जाकर उन्हें लगा कि गांव के बच्चों की जिंदगी अंधकार में जा रही है क्योंकि उन्हें न तो अच्छी शिक्षा मिल रही है और न ही सही मार्गदर्शन। इसलिए उन्होंने पत्रकारिता के पेशे को छोड़कर समाज सेवा करने का निर्णय ले लिया। इसके बाद रेस (RACE) की स्थापना हुई।

अपर्णा विश्वनाथन को स्त्री-पुरुष गैरबराबरी का अंदाजा तब हुआ था जब वे कॉलेज में थीं। उन्हें यह सब देखकर काफी बुरा लगा था। लेकिन वह लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हुईं और कॉलेज की प्रेसिडेंट बन गईं। कॉलेज खत्म करने के बाद वे पत्रकारिता में आईं, लेकिन यहां भी उनका मन नहीं लगा। उसके बाद वे ग्रामीण भारत का भ्रमण करने निकल पड़ीं। इसी दौरान उन्होंने गांव के बच्चों को देखा जिनका भविष्य सही मौके न मिलने के कारण बर्बाद हो रहा था। इसके बाद उन्होंने सामाजिक कार्यों में दिलचस्पी दिखाई और 2005 में रेस नाम की एक संस्था बनाई। यह संस्था कई राज्य के शिक्षा बोर्डों के साथ मिलकर मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव ला रही है।

आइए हम उनके इस सफर से आपको रूबरू कराते हैं। केरल की रहने वालीं अपर्णा की संस्था सामाजिक तौर पर पिछड़े बच्चों को कंफर्ट जोन के बाहर लाती है और उन्हें जिंदगी में कुछ करने के नए मौके उपलब्ध करवाती है। अपर्णा हालांकि सौभाग्यशाली रही हैं। क्योंकि उन्हें अपने कॉलेज जीवन से पहले कभी भी स्त्री-पुरुष गैरबराबरी का सामना नहीं किया। वह बताती हैं, 'एक समय बाद मुझे लगा कि एक लड़की होने के नाते कॉलेज में मुझ पर कुछ बंदिशें लगाई जा रही हैं। मुझे एक खास तरीके से व्यवहार करने के लिए कहा जा रहा है। इससे मैं एक बार तो कॉलेज ही छोड़ दिया था, लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे समझाया और मैं वापस कॉलेज गई।'

कॉलेज वापस लौटने पर अपर्णा ने लड़ाई लड़ी और उन्हें कॉलेज का प्रेसिडेंट बना दिया गया। उन्हें लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी थी इसलिए कॉलेज खत्म होने के बाद वे एक प्राइवेट न्यूज चैनल के साथ जुड़ गईं। खबरों की दुनिया में काम करने की वजह से उन्हें देशभर के कई दूरस्थ इलाकों में घूमने का मौका मिला। इसी दौरान उन्हें लगा कि गांव के बच्चों की जिंदगी अंधकार में जा रही है क्योंकि उन्हें न तो अच्छी शिक्षा मिल रही है और न ही सही मार्गदर्शन। इसलिए उन्होंने पत्रकारिता के पेशे को छोड़कर समाज सेवा करने का निर्णय ले लिया। इसके बाद रेस (RACE) की स्थापना हुई।

लेकिन इसी दौरान उनकी जिंदगी में काफी मुश्किलें भी आईं। 2005 में उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ और उनकी याददाश्त चली गई। लेकिन धीरे-धीरे उनकी हालत में सुधार हुआ और वे ठीक होने लगीं। इसके बाद उन्होंने फिर से अपना काम शुरू किया। एक वाकये को याद करते हुए वह बताती हैं कि एक बार उनका बेटा गिर गया और रोने लगा, तो लोगों ने उसका यह कहकर मजाक उड़ाना शुरू कर दिया कि वह लड़कियों के जैसे रो रहा है। इससे अपर्णा काफी दुखी हो गईं। उन्हें लगा कि यह सही नहीं है। अभी हमारे समाज में संवेदनशीलता की काफी कमी है।

उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो-2015 की रिपोर्ट के अनुसार हर एक घंटे में 15 से 29 साल की उम्र का एक नौजवान आत्महत्या कर लेता है। इसके लिए हमारा समाज और हमारी शिक्षा व्यवस्था ही जिम्मेदार है। उनका संगठन सोशल इंटेलीजेंस की अवधारणा को इस तरीके से छात्रों को समझाता है जिससे छात्र कंफर्ट जोन छोड़ देते हैं और विफलता से निपटने के लिए तैयार हो जाते हैं। वे शारीरिक प्रताड़ना की शिकार लड़कियों की भी मदद करती हैं। वह बताती हैं कि वे उन्हें वापस सामान्य जिंदगी में लाने में लगभग सफल हो ही जाती हैं।

अपर्णा अभी सीबीएसई बोर्ड से भी बात कर रही हैं ताकि स्कूलों में सोशल इंटेलिजेंस का दायरा बढ़ाया जा सके। उनका मानना है कि इससे बच्चे समझदार होंगे और महिलाओं के प्रति समाज की सोच भी बदलेगी। उन्होंने बताया कि वे कर्नाटक एजुकेशन बोर्ड के साथ भी बातचीत कर रही हैं। वे इसे पाठ्यक्रम का हिस्सा बनवाना चाहती हैं। वह कहती हैं कि कम उम्र में कई ऐसे हादसे हो जाते हैं जिससे बच्चों के मन पर बुरा असर पड़ता है और वे इससे बाहर नहीं निकल पाते। इसके लिए उन्हें काउंसिंलिंग देना और उन्हें सपोर्ट करना काफी जरूरी है।

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