अपने बारे में उल्टी-सीधी बातों को खुद हवा देते थे फ़िराक़ 

उर्दू कविता को बोलियों से जोड़ कर उसमें नई लोच और रंगत पैदा करने वाले जाने-माने शायर फ़िराक़ गोरखपुरी

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फ़िराक़ गोरखपुरी जितने महान शायर, प्रकांड विद्वान, निजी जीवन में उतने ही जटिल भी, मिलनसार भी, मुंहफट-दबंग, स्वाभिमानी भी और गजब के हाजिरजवाब भी। इतना ही नहीं, वह अपने बारे में ही तमाम उल्टी-सीधी बातों को खुद ही हवा दिया करते। हमेशा अपने दु:ख को बढ़ा-चढ़ाकर बतियाना उनका शौक सा रहा।

फिराक़ गोरखपुरी
फिराक़ गोरखपुरी
फ़िराक़ साहब ने ग़ज़ल और रुबाई को नया लहजा और नई आवाज़ अदा की। इस आवाज़ में अतीत की गूंज भी है, वर्तमान की बेचैनी भी। फ़ारसी, हिन्दी, ब्रजभाषा और हिन्दू धर्म की संस्कृति की गहरी जानकारी की वजह से उनकी शायरी में हिन्दुस्तान की मिट्टी रच-बस गई है।

उर्दू कविता को बोलियों से जोड़ कर उसमें नई लोच और रंगत पैदा करने वाले जाने-माने शायर फ़िराक़ गोरखपुरी (रघुपति सहाय) का 28 अगस्त को जन्मदिन होता है। ब्रिटिश हुकूमत के राजनीतिक बंदी रहे फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत ग़ज़ल से की। उन्होंने परंपरागत भावबोध और शब्दों के साथ उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उनके अपने जीवन का सामाजिक दुख-दर्द ही उनकी शायरी में ढलता गया। वैसे भी उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है, जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए हैं। 

अपने जीवन के कड़वे सच और आने वाले कल के प्रति उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फ़िराक़ ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया। फ़ारसी, हिंदी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रच-बस गई। साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से सम्मानित फ़िराक़ को उनका दांपत्य जीवन कभी रास नहीं आया। उनका विवाह ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ था। पत्नी के साथ एक छत के नीचे रहते हुए भी वह अनबन की जिंदगी बिताते रहे। वह लिखते हैं -

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुजरे हैं इक बुजुर्ग
हम लोग भी मुरीद इसी सिलसिले के हैं

फ़िराक़ साहब अपनी रचनाओं में जितने प्रकांड, निजी जीवन में उतने ही जटिल रहे। वह मिलनसार, स्वाभिमानी थे और गजब के हाजिरजवाब भी लेकिन अपने बारे में तमाम उल्टी-सीधी बातें खुद करते रहते थे। उनके यहाँ उनके द्वारा ही प्रचारित चुटकुले आत्मविज्ञापन प्रमुख हो गये। वह हमेशा अपने दु:ख को बढ़ा-चढ़ाकर बयान किया करते थे। उनकी वेश-भूषा, पहनावे में तो अजीब सी लापरवाही झलकती थी- टोपी से बाहर झाँकते हुये बिखरे बाल, शेरवानी के खुले बटन, ढीला-ढाला (और कभी-कभी बेहद गंदा और मुसा हुआ) पैजामा, लटकता हुआ इजारबंद, एक हाथ में सिगरेट और दूसरे में घड़ी, गहरी-गहरी और गोल-गोल- डस लेने वाली-सी आँखों में उनके व्यक्तित्व का फक्कड़पन लहराता रहता था। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म और रुबाई तीनों विधाओं में लिखा। रुबाई, नज़्म की ही एक विधा है, लेकिन आसानी के लिए इसे नज़्म से अलग कर लिया गया है। उनके कलाम का सबसे बड़ा और अहम हिस्सा ग़ज़ल रही और यही उनकी पहचान बनी। 

फ़िराक़ साहब ने ग़ज़ल और रुबाई को नया लहजा और नई आवाज़ अदा की। इस आवाज़ में अतीत की गूंज भी है, वर्तमान की बेचैनी भी। फ़ारसी, हिन्दी, ब्रजभाषा और हिन्दू धर्म की संस्कृति की गहरी जानकारी की वजह से उनकी शायरी में हिन्दुस्तान की मिट्टी रच-बस गई है। यह तथ्य भी विचार करने योग्य है कि उनकी शायरी में आशिक और महबूब परंपरा से बिल्कुल अलग अपना स्वतंत्र संसार बसाये हुए हैं। वैसी ही उनकी शायरी का अल्हड़पन बेमिसाल अंदाजेबयां से भरपूर -

यूँ माना ज़ि‍न्दगी है चार दिन की।
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी।
ख़ुदा को पा गया वायज़ मगर है
ज़रूरत आदमी को आदमी की।
बसा-औक्रात दिल से कह गयी है
बहुत कुछ वो निगाहे-मुख़्तसर भी।
मिला हूँ मुस्कुरा कर उससे हर बार
मगर आँखों में भी थी कुछ नमी-सी।
महब्बत में करें क्या हाल दिल का
ख़ुशी ही काम आती है न ग़म की।
भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली।
लड़कपन की अदा है जानलेवा
गज़ब ये छोकरी है हाथ-भर की।
है कितनी शोख़, तेज़ अय्यामे-गुल पर
चमन में मुस्कुहराहट कर कली की।
रक़ीबे-ग़मज़दा अब सब्र कर ले
कभी इससे मेरी भी दोस्ती थी।

बीसवीं सदी के इस महान शायर की विद्वता से क्या हिंदी, क्या उर्दू, क्या सियासत, क्या साहित्य, जिसने भी उन्हें पढ़ा-सुना, हक्का-बक्का हो लिया। जिस समय हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए महात्मा गाँधी ने 'असहयोग आन्दोलन' छेड़ा, फ़िराक़ साहब अपनी नौकरी छोड़कर उनके साथ हो लिए। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। डेढ़ साल बाद जेल से छूटे तो जवाहरलाल नेहरू ने 'अखिल भारतीय कांग्रेस' के दफ्तर में 'अण्डर सेक्रेटरी' की जगह पर उन्हें रखवा दिया। बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने यह पद छोड़ दिया। इसके बाद 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में वर्ष 1930 से लेकर 1959 तक अंग्रेज़ी के प्रोफेसर रहे। फिराक़ गोरखपुरी एक बेहद मुँहफट और दबंग शख्सियत थे। एक बार वह एक मुशायरे में शिरकत कर रहे थे। काफ़ी देर बाद जब उन्हें मंच से रचना-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया, माइक संभालते ही बोले- 'हजरात! अभी आप कव्वाली सुन रहे थे। अब कुछ शेर सुनिए'। इसी तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोग हमेशा फिराक़ और उनके सहपाठी अमरनाथ झा को लड़ा देने की कोशिश करते रहते थे। एक महफिल में फिराक़ और झा दोनों ही थे। एक साहब दर्शकों को संबोधित करते हुए बोले- 'फिराक़ साहब हर बात में झा साहब से कमतर हैं।' इस पर फिराक़ तुरंत उठे और बोले- 'भाई अमरनाथ मेरे गहरे दोस्त हैं और उनमें एक ख़ास खूबी है कि वो अपनी झूठी तारीफ बिलकुल पसंद नहीं करते।' इस हाज़िरजवाबी ने कुछ पल के लिए हर किसी हैरान कर दिया। सन् 1962 में भारत-चीन लड़ाई के दौरान उनकी यह गजल लोगों की जुबान पर छा गई थी -

सुखन की शम्मां जलाओ बहुत उदास है रात।
नवाए मीर सुनाओ बहुत उदास है रात।
कोई कहे ये खयालों और ख्वाबों से
दिलों से दूर न जाओ बहुत उदास है रात।
पड़े हो धुंधली फिजाओं में मुंह लपेटे हुये
सितारों सामने आओ बहुत उदास है रात।

फ़िराक़ साहब ने खुद अपने बारे में ख़ास-लाजवाब अंदाज में लिखा था कि 'आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों, जब ये ख्याल आयेगा उनको, तुमने फ़िराक़ को देखा था।' जिंदगी के आखिरी दौर में कभी उन्होंने बड़ी खूबसूरत मासूमियत से जिंदगी और साहित्य के बीच के अपने किरदार को कुछ इस तरह जुबान दी थी - 'अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साजे़- गजल, नये तराने छेडो़, मेरे नग्‍़मों को नींद आती है।' इससे पहले फ़िराक़ यह भी लिख गए कि 'मिट्टी के बर्तनों में, दीपकों में, खिलौनों में, यहाँ तक कि चूल्हे-चक्की में, छोटी-छोटी रस्मों में और हिन्दू की हर साँस में रुबाइयों की ध्वनियाँ, हिन्दू लोकगीतों को सुखद संगीत का सुख होता है। मुस्लिम कल्चर बहुत ऊँची चीज है, और पवित्र चीज है, मगर उसमें प्रकृति, बाल जीवन, नारीत्व का वह चित्रण या घरेलू जीवन की वह बू–बास नहीं मिलती, वे जादू भरे भेद नहीं मिलते, जो हिन्दू कल्चर में मिलते हैं।' वह उर्दू साहित्य जगत को ग़ज़लों, नज़्मों और रुबाइयों की ऐसी बहुमूल्य दौलत से सराबोर कर गए, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है -

दयारे-गै़र में सोज़े-वतन की आँच न पूछ।
ख़जाँ में सुब्हे-बहारे-चमन की आँच न पूछ।
फ़ज़ा है दहकी हुई रक्‍़स में है शोला-ए-गुल
जहाँ वो शोख़ है उस अंजुमन की आँच न पूछ।
क़बा में जिस्म है या शोला जेरे-परद-ए-साज़
बदन से लिपटे हुए पैरहन की आँच न पूछ।
हिजाब में भी उसे देखना क़यामत है
नक़ाब में भी रुखे-शोला-ज़न की आँच न पूछ।
लपक रहे हैं वो शोले कि होंट जलते हैं
न पूछ मौजे-शराबे-कुहन की आँच न पूछ।
फ़ि‍राक आईना-दर-आईना है हुस्ने -निगार
सबाहते-चमन-अन्दर-चमन की आँच न पूछ।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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