बिज़नेस की समस्या का समाधान करने का जुनून रखते हैं उद्यमी गौतम कपूर

उद्योग और व्यापारिक घराने में पैदा होने वालों के लिए खुद व्यापार करना इसलिए भी आसान होता है कि वे काम करते करते सीख जाते हैं और विरासत में मिले व्यापार को संभालते हुए जीवन गुज़ार देते हैं। कभी कुछ नया दे पाते हैं और कभी नहीं दे पाते। कुछ नया देना और उस नये के लिए ही जीना जिनका मकसद हो, ऐसे लोगों की तादाद बहुत कम है। ऐसे लोग अपने काम और लक्ष्य में बहुत स्पष्ट होते हैं। उनकी आँख पक्षी पर नहीं बल्कि उसकी आँख पर होती है। उनका उद्देश्य केवल व्यापार या उद्योग करना नहीं होता, बल्कि ऐसा उद्योग करना होता है, जो किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करे। गौतम कपूर ऐसे ही युवा उद्यमियों में से एक हैं। उनको उद्यम की प्रवृत्ति विरासत में मिली। पिता पहले से बिज़नेस में थे। उनको काम करते देखकर बहुत बचपन से ही गौतम कपूर के मन में भी बिज़नेस करने की धुन सवार हो गयी थी, लेकिन उनका दिलो दिमाग हमेशा इस बात के बारे में विचार करता रहा कि बाज़ार में कौनसी समस्या है, जिसका समाधान उन्हें करना है और फिर पेमेंट गेटवे, लॉजिस्टिक और शिपिंग में वो मुकाम हासिल किया कि जिसे देखकर लोग मिसाल दें।

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गौतम कपूर बिगफूटरिटेल सोल्युशन प्राइवेट लिमिटेड के सीओओ हैं और कार्टरॉकेट तथा उसकी सहयोगी कंपनियों के फाऊँडर हैं। साहिल गोयल और विशेष खन्ना के साथ मिलकर उन्होंने बाज़ार को बहुत सारी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया है। ऐसा नहीं है कि वे बचपन से ही बहुत ही हुशियार और कक्षा में प्रथम आने वाले विद्यार्थियों में रहे हों, लेकिन जो कुछ किया और जो कुछ पाया अपनी मेहनत, लगन और आत्मविश्वास के साथ ही। वे बचपन के बारे में बताते हैं, 'मैं पढ़ाई में एवरेज था। मार्क काफी मेहनत के बाद आते थे। टाप 10 और 15 में कैसे जगह पाऊँ, इसके लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। मेरे लिए पढ़ाई में उपलब्धियाँ हासिल करना आसान चीज़ नहीं थी।'

आम तौर पर देखा जाता है कि माँ बाप अपने बच्चों को क्या बनाएं, इसके बारे में पहले से फैसला करते हैं। बच्चों को उसी डगर पर आगे ले जाते हैं, और बच्चों पर माँ बाप के सपनों को साकार करने का दबाव बना रहता है। गौतम कपूर बताते हैं कि उनके साथ स्थिति कुछ अलग थी। उन्हें इस मामले में कभी मजबूर नहीं किया गया कि वे ऐसा ही या वैसा ही करें। वे बताते हैं,

माता पिता की ओर से मुझ पर कोई दबाव नहीं था कि क्या बनना है। 'मैं अपनी हद तक अपने काम के लिए जिम्मेदार था। उनकी तरफ से कभी भी कोई दबाव नहीं रहा। वे मुझपर पूरा विश्वास करते थे कि मैं जो भी करूँगा, अच्छा ही करूँगा। मेरे अपने भीतर भी एक आत्मविश्वास था। डॉक्टर और इंजीनियर बनने की बात तो बाद की है, पढ़ने के विषयों में कामर्स लेना है या साइंस लेना है, इसका निर्णय भी मुझ पर ही था। इतना ही नहीं, दसवीं के बाद ग्यारवीं और डिग्री के स्तर पर भी सारे निर्णय लेने में मुझे पूरी आज़ादी दी गयी थी। अपने विषय चुनने की पूरी छूट थी। पैरेंट्स इतना ज़रूर कहते कि जो भी करना है अच्छे से ईमांदारी से करो।'

गौतम बताते हैं कि उद्योग में आना बहुत पहले से तय था। बचपन में ही यह सोच बन गयी थी कि उन्हें कारोबार ही करना है। बिज़नेस में अपनी जगह बनानी है। वे बताते हैं,

'मुझे बचपन से ही व्यापार का शौक था। अपने माता पिता की मदद किया करता था। मेरा परिवार व्यापार से जुड़ा था और जब तब मैं उस व्यापार में उनका सहयोग करता रहता था। जब मैं स्कूल और कॉलेज में था, तब भी पिता के साथ कुछ न कुछ काम किया करता था। वेबसाइट बनाना, ईमेल करना, पिताजी के कंपनी के ब्रांड का लोगो चेंज करना आदि बिना पिताजी के कहे ही मैं इन सब कामों में शामिह हुआ करता था। अंत्रप्रेन्युअरशिप का स्पार्क शुरू से ही मुझमें रहा।'

गौतम के दिमाग में एक ही बात थी। व्यापार, उद्योग, बिज़नेस। जब दोस्तों में भी आपस में बातचीत होती तब भी इन्हीं विषय पर बातें होती थीं। काम करने का इतना जुनून था कि उन्होंने एमबीए की पढ़ाई नहीं की, जिसका उन्हें कुछ हद तक अफसोस रहा, लेकिन धुन के पक्के होने के कारण उन्होंने अपने अनुभवों से ही उद्यमिता में नयी नयी बातें सीखीं। वे बताते है,

'बिज़नेस का जुनून कुछ ऐसा था कि सोचा एमबीए बाद में करेंगे। यही सोचकर के एमबीए की शिक्षा टाल दी, लेकिन वह बाद कभी आया नहीं, हालाँकि मैं सोचता हूँ कि वह सही निर्णय नहीं था।'

आज गौतम कपूर न केवल अपने परिवार में बल्कि देश भर अपनी कंपनियों को लेकर ख्याति रखते हैं। कार्टरॉकेट, शिप रॉकेट और क्राफ्टली जैसे सेवाओं के लिए उनकी कंपनियों को जाना जाता है। इस व्यापार की शुरूआत के से पहले वे कुछ दिन तक अपने पारिवारिक बिज़नेस में रहे और कुछ दिन संडेचार्टर कंपनी में काम किया। उसके बाद अपने मित्र साहिल के साथ मिलकर नयी कंपनी खोल ली। इस कंपनी के बारे में वे बताते हैं कि साहिल अमेरिका में थे और गौतम पारिवारिक व्यापार में काम कर रहे थे। वह व्यापार अब भी जारी है। वे बताते है, 'साहिल और मैं स्कूल से साथ थे और हर समय कुछ न कुछ शुरू करने के आइडिया सोचा करते थे। फिर जब कॉलेज के बाद व्यापार करने की बात आयी तो हमने सोचा कि ऐसी कौनसी प्राब्लम है, जो हम साल्फ करना चाहते हैं। बहुत सारे आइडियाज़ पर बातचीत हुई। साहिल के परिवार में एक शू मैन्युफैक्चरर थे। उद्यमता में वे उन्नत विचार रखते थे। वह अपने जूतों का ऑनलाइन कारोबार शुरू करना चाहते थे। उस समय भारत में फ्लिपकार्ट अभी अभी शुरू हुआ था। सब को ऑन लाइन व्यापार के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी और इस विषय पर बात भी कम ही होती थी।'

चूँकि साहिल उनकी फैमली में 'कंप्युटर वाला' के रूप में जाने जाते हैं तो उन्हें ई कामर्स स्टोर के लिए अप्रोच किया गया। उनसे कहा गया कि सर्विस प्रोवाइडर्स की जानकारी प्राप्त करें। साहिल के साथ गौतम भी उस काम पर लग गये। उन्होंने देखा कि यूएस कैनडा और दूसरे यूरोपियन देशों में तो टेक्नोलॉजी के सर्विस प्रोवाइडर थे, लेकिन भारत में ऐसा कोई नहीं मिला, जो ई होस्टिंग की टेक्नोलोजी प्राप्बलम का समाधान कर सके। उस समय कई सारे प्रश्न थे कि टेक्नोलॉजी कहाँ से आएगी, मार्केटिंग कैसे होगी, एस एम एस तथा ई मेल की क्या व्यवस्था होगी। गौतम कहते हैं,

'विकल्प यही था कि किसी विदेशी कंपनी की सेवा लेकर बहुत सारे रुपये खर्च कीजीए, लेकिन खर्च कर भी लें, फिर भी जो परिणाम अच्छे ही मिलेंगे यह भी स्पष्ट नहीं थे। हमने सोचा कि इस प्राब्लम को साल्फ करने के लिए कुछ करना चाहिए।'

गौरव बताते हैं के भारत में आज भी अधिकतर रोज़गार उद्यम से उपलब्ध होता है और उनके दिमाग में यही था उद्यमियों की समस्या का समाधान करने के लिए कुछ करना चाहिए। इस बाज़ार में उन्हें काफी संभावनाएँ नज़र आयीं, लेकिन समस्याएँ भी उतनी ही थीं। वे बताते हैं,

'जब आगे बढ़े तो कई समस्या सामने आयी। पहले तो हमें लगा था कि यहाँ भुगतान की समस्याएं हैं, लेकिन फिर मालूम हुआ कि लॉजिस्टिक्स भी बड़ी समस्या है। हालाँकि बड़े पेमेंट गेटवेज़ आ गये थे, फिर भी वे 20 से 30 हज़ार रुपये एक बार के लिए चार्ज करते थे। उसके बाद 3 प्रतिशत अलग से लेते थे। हमने तय किया कि हम पेमेंट गेटवे की में इस तरह के चलन को कम करेंगे। हमने पेमेंट गेटवेज़ के सामने प्रस्ताव रखा कि हम मर्चेंट देंगे, ज्यादा मर्चेंट से कमिशन कमाइए, लेकिन पैसे मत लीजिए। हालाँकि हमने निवेश के तौर पर 20 से 50 अकाउँट के लिए पैसे दिये। आज देश में 28 पेमेंट गेटवेज़ हैं, जिनमें से तीन के साथ हमारी पार्टनरशिप है। दूसरी समस्या शिपमेंट की थी। फेडेक्स, फर्स्ट फ्लाइट, डीटीडीसी, वहाँ शिपमेंट की पद्धति सरकारी कार्यालयों की तरह थी। उस समस्या के समाधान के लि शिपरॉकेट के नाम से सेवा शुरू की और आज यह सबसे बड़ी कंपनी बन गयी है।'

आज गौतम और उनके साथियों की तारीफ होती है। इस बारे में वे कहते हैं कि जब आपके आस पास रहने वाले आपकी तारीफ करते हैं आपके पेरेंट्स दोस्त और साथी लोग आप पर गर्व करते हैं तो काफी खुशी होती है। हालाँकि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह उनकी शोहरत होगी, लेकिन मन में पक्का था। इरादा तगड़ा था कि कुछ अलग काम करेंगे। वे कहते हैं,

'यह ज़रूर था कि जो करूँगा, वो काफी बड़ी चीज़ होगी, कीमती होगी, उसका काफी महत्व होगा। अख़बारों में अपना नाम छपेगा, या मेरा इंटरव्यू लिया जाएगा, ऐसा नहीं सोचा था, लेकिन सोच हमेशा से यही थी कि मैं ऐसा काम करूँ, जिससे लोगों को लाभ हूँ।'

इस क्षेत्र में आने वाली समस्याओं के बारे में गौतम कहते हैं कि समस्या व्यापार की हो या व्यक्तिग, व्यक्तिगत रूप से बिज़नेस में आने वाली हो या फिर व्यापार से व्यक्तिगत जीवन में आने वाली हो, समस्याएं तो आती रहती हैं, यह कभी रुकने वाली नहीं हैं। वे अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, 'विवाह नहीं हुआ था तो वहाँ की ज़रूरतें नहीं थीं, ऑफिस में रात दिन गुज़ार देते थे, ऑफिस में ही दो तीन दिन कब निकल निकल जाते पता ही नहीं चलता था। काम भी यहीं, खाना भी यहीं, सोना भी यहीं। तीन चार साल वैसे ही बिताए। अब वैसा नहीं होता। घर की जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ती है।'

गौतम का मानना है कि बिज़नेस में कामयाबी नाकामी के दौर चलते रहते हैं। वे कहते हैं कि डाउन टाइम आते हैं। व्यापार में अपनी ग़लती का खमियाज़ा आपको ही नहीं बल्कि आपके कर्मचारियों को भी भुगतना पड़ता है। इसलिए जब आपको लगता है कि आपने ग़लत किया है, उससे बाहर निकलना बड़ी चुनौती होती है और फिर उसे दोबारा न करने की प्रतिज्ञा भी लेनी पड़ती है। बिज़नेस लेवल पर आपको सुधार करना भी बड़ी चुनौती ही है। आप जिनके साथ काम कर रहे हैं, तो आपकी ग़लती का प्रभाव उन पर भी पड़ता है।

कई बार ऐसा होता है कि जोश में दोस्तों के साथ काम तो शुरू किया जाता है, लेकिन जोडियाँ बीच में दरक जाती हैं। गौतम को विश्वास है कि उन्होंने अपने दोस्तों के साथ जो काम शुरू किया, वह काफी दूर तक जाएगा। वे कहते हैं कि फैसला दोस्त के साथ कंपनी शुरू करने का था। दोस्ती तो काफी दिन से है, लेकिन हम दोनों(साहिल-गौतम) अलग अलग तरह का व्यक्तित्व रखते हैं। उसकी अपनी विशेषताएं हैं मेरी अलग है, लेकिन दोनों का संकल्प एक है।

कई बार ऐसा होता है कि कारोबार शुरू करते समय तथा निवेश करते समय जब काम करने वालों की नियुक्तियाँ शुरू हो जाती तो इसमें उचित और उपयुक्त लोगों का चुनाव सबसे बड़ी चुनौती होती है। गौतम को लगता है कि शुरू में उन्होंने इसमें कुछ ग़लतियाँ कीं, लेकिन बाद में उसे संभाल लिया। वे बतातै हैं,

'हमने शुरू में कुछ ग़लतियाँ ज़रूर कीं। फंडिंग के समय विकास की ओर आगे बढ़ना होता है। लोगों को हायर करने के दौरान कुछ सावधानियाँ बरती ज़रूरी होती हैं कि उन्हें किस काम पर कितने वेतन पर लें। हमारी ग़लती थी। हमने ज्यादा हायर कर लिया था। ग़लती को दोहराते या जारी रखते तो कंपनी बंद करनी पड़ती। अब उन लोगों को हटाना था। जिम्मेदारी हमने ली और इसे उचित तौर तरीकों से संभाला। आठ दस लोगों को कंपनी छोडने के लिए कहना था, क्यों कि उन्हें बनाए रखना। कंपनी के लिए हित में नहीं था। यह मुश्किल होता है, लेकिन उन लोगों के साथ बैठकर बात करना कि आप क्यों ऐसा कर रहे हैं यह सबसे महत्वपूर्ण होता है। लोग मान भी गये।'

गौतम का मानना है कि किसी भी व्यापार के मुल में व्यापार होना चाहिए। वे कहते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बिज़नेस में बिज़नेस होना चाहिए। इतना ज़रूर सोचना होगा कि इस काम में कितने पैसे लगेंगे, कितना टाइम दिया जाएगा, कितना पैसा कमाएँगे और यह कमाने के लिए कितना समय लगेगा। बिज़नेस मॉडल बहुत स्पष्ट होना चाहिए। केवल निवेश लेना और उसे खर्च करना ही व्यापार नहीं होता। रुपया खर्च करते समय यह नहीं सोचना कि यह रुपया वापिस कैसे आएगा, काफी ग़लत तरीका होता है। व्यापार शुरू करो या नौकरी करो तो यह ज़रूर सोचना चाहिए। 

बिज़नेस शुरू करते समय की अपनी मनःस्थिति का उल्लेख करते हुए गौतम बताते हैं कि काफी आत्मविश्वास था। समस्या की पहचान कर ली थी। सब के साथ शुरू में ऐसा ही होता है। लगता है कि दुनिया भर की समस्याओं को हम हल कर सकते हैं, लेकिन हर दूसरे तीसरे महीने में सोच पैदा होती है कि आगे क्या होगा। हमने एक साल तक अपनी जेब से खर्च किये। अच्छे लोगों को नियुक्त करना सही समय समय सही कास्ट पर सही लोगों को नियुक्त करना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

गौतम कपूर ने अपने साथियों के साथ शुरू की गयी कंपनियों में कई सारी उपब्धियाँ अर्जित कीं। आज कार्टरॉकेट इंडिया का नंबर 1 ई कॉमर्स प्लेटफार्म है, जो ई कॉमर्स मर्चेंट्स को अपनी सेवाएँ प्रदान करता है। कंपनी की पोजिशन काफी अच्छी है। वे मार्केट को एक पिरामिड की तरह देखते हैं। टॉप से लेकर बॉटम तक सभी को अपनी सेवाएँ देने की कोशिश कर रहे हैं। बड़ी कंपनियों से लेकर घर से काम करने वालों तक कई लोगों को सेवाएँ दे रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि कार्टरॉकेट, जिसके साथ आज 4000 ग्राहक हैं, भविष्य में 10 हज़ार से अधिक हों और ज्यादा राजस्व की ओर उनका ध्यान हैं। शिपरॉकेट के 2000 ग्राहक हैं। इसको 40 हज़ार ग्राहकों तक ले जाना है और इसका विस्तार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करना है। क्राफ्टली छोटे सेलर्स के लिए है। इसके द्वारा ढाई लाख छोटे व्यापारियों को सेवा देने का लक्ष्य उन्होंने रखा है।

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Dr Arvind Yadav is Managing Editor (Indian Languages) in YourStory. He is a prolific writer and television editor. He is an avid traveler and also a crusader for freedom of press. In last 19 years he has travelled across India and covered important political and social activities. From 1999 to 2014 he has covered all assembly and Parliamentary elections in South India. Apart from double Masters Degree he did his doctorate in Modern Hindi criticism. He is also armed with PG Diploma in Media Laws and Psychological Counseling . Dr Yadav has work experience from AajTak/Headlines Today, IBN 7 to TV9 news network. He was instrumental in establishing India’s first end to end HD news channel – Sakshi TV.

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