मिलिए, वंचित तबके के 158 बच्चों की 'अनु मां' से

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अनुभूति भटनागर एक मिसाल हैं कि कैसे एक व्यस्त जीवन और करियर के बीच भी समाजसेवा की जा सकती है। अनुभूति समाजशास्त्र में डॉक्टरेट की पदवी ले चुकी हैं। वह एक प्रमाणित कोच हैं, एक कलाकार हैं, लेखक हैं और साथ ही हैं एक भावुक सामाजिक कार्यकर्ता भी।

बच्चों की 'अनु मां', साभार: वर्डप्रेस
बच्चों की 'अनु मां', साभार: वर्डप्रेस
उन्होंने 2012 में अपने एनजीओ, निओ फ्यूजन क्रिएटिव फाउंडेशन की शुरूआत की थी। वो कई वंचित झुग्गी बस्तियों के बच्चों लिए 'अनु मां' बन गईं। अपनी पेंटिंग और कला करियर के साथ साथ अनुभूति इस जिम्मेदारी का निर्वहन भी बहुत अच्छी तरह से कर रही हैं। 

उनका प्रोजेक्ट 'सपने हुए अपने' 2 शहरों, जयपुर और गुड़गांव में अपनी परियोजना चला रहा है। इन सेंटरों में 158 किशोर बच्चों को शिक्षा और प्रशिक्षण मिल रहा है। इसके साथ ही अनुभूति ने स्कूल छोड़ने वालों के लिए एक खुला स्कूल शुरू कर दिया है, जहां बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में सीबीएसई का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है।

अनुभूति भटनागर एक मिसाल हैं कि कैसे एक व्यस्त जीवन और करियर के बीच भी समाजसेवा की जा सकती है। अनुभूति ने समाजशास्त्र में डॉक्टरेट की पदवी ले चुकी हैं। वह एक प्रमाणित कोच हैं, एक कलाकार हैं, लेखक हैं और साथ ही हैं एक भावुक सामाजिक कार्यकर्ता। उन्होंने 2012 में अपने एनजीओ, निओ फ्यूजन क्रिएटिव फाउंडेशन की शुरूआत की थी। वो कई वंचित झुग्गी बस्तियों के बच्चों लिए 'अनु मां' बन गईं। अपनी पेंटिंग और कला करियर के साथ साथ अनुभूति इस जिम्मेदारी का निर्वहन भी बहुत अच्छी तरह से कर रही हैं।

2012 के मध्य में अचानक से उन्हें कुछ गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा और 3 महीनों के लिए बिस्तर पर रहना पड़ा। उस समय उनकी बड़ी बेटी कुहू ने उनके बारे में एक लेटर लिखा था, जिसमें उन्होंने अपनी मां को अपना रोल मॉडल बताया था। यह खत अनुभूति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया। उस समय तक वह अपनी जिंदगी से खुश तो थीं लेकिन फिर भी कहीं न कहीं अपने भीतर वह आत्म संतुष्टि की तलाश कर रही थीं। समाजशास्त्र में डॉक्टरेट होने के नाते, वह सामाजिक मुद्दों पर बारीकी से देखती थीं और हमेशा समाज के लिए काम करना चाहती थीं। लेकिन अपने परिवार और कला करियर में इतनी व्यस्त थीं, कभी इस योजना को वक्त ही नहीं दे पा रही थीं।

जब लिया अपने दिल का फैसला-

उस खत को पढ़ने के बाद वो समय आया, जब उन्होंने समाज को वापस देने का फैसला किया। कई स्कूलों में जहां गंदी बस्ती बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए काम हो रहा था, उनसे मिलकर अपना मिशन शुरू किया। उन्होंने विभिन्न संस्थानों में क्ले-मॉडलिंग कार्यशालाओं की शुरुआत की। लेकिन उन्होंने जल्द महसूस किया कि सिर्फ इन कार्यशालाओं के जरिए वह अपने मिशन को पूरा नहीं कर पाएंगी। तब उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपने फाउंडेशन की नींव रखी।

सितंबर 2016 में, क्राउड फंडिंग की मदद से उन्होंने अपनी योजना के आधार के लिए धन जुटाने में कामयाबी हासिल की। अब उनका प्रोजेक्ट 'सपने हुए अपने' 2 शहरों, जयपुर और गुड़गांव में अपनी परियोजना चला रहा है। इन सेंटरों में 158 किशोर बच्चों को शिक्षा और प्रशिक्षण मिल रहा है। इसके साथ ही अनुभूति ने स्कूल छोड़ने वालों के लिए एक खुला स्कूल शुरू कर दिया है, जहां बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में सीबीएसई का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। उनके फाउंडेशन का उद्देश्य वंचित और माइग्रेटेड समुदायों में स्कूल छोड़ने वालों बच्चों के भविष्य, बाल श्रम, करियर और रोजगार जैसे समस्याओं को हल करना है।

सेंटर पर शिक्षा के साथ अन्य गुण भी सिखाए जाते हैं, साभार: फेसबुक
सेंटर पर शिक्षा के साथ अन्य गुण भी सिखाए जाते हैं, साभार: फेसबुक

क्योंकि बच्चे ही देश का भविष्य हैं-

ये संस्था किशोरों की सहायता करती है, क्योंकि यह वह चरण है जब बच्चों को अत्यंत सावधानी बरतने की जरूरत होती है। कई कारणों से, उदाहरण के लिए वित्तीय या प्रवासन, की वजह से बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। कुछ लड़कियां जो घरेलू सहायक के रूप में काम कर रही थीं वो अब उच्च कक्षा में पढ़ रही हैं और कुछ नृत्य प्रशिक्षक भी बन गई हैं। अनुभूति की इस जरूरी पहल ने कईयों की प्रशंसा प्राप्त की है। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान दिए गए हैं। उनका सपना है, 2025 तक सभी राज्यों में फाउंडेशन की शाखाओं को खोलना। ताकि कोई भी बच्चा गरीबी से न हार जाए।

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