एक नाई जो रोल्स रॉयस का मालिक है

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संघर्ष और जोखिम से कामयाबी तक का सफर...

कामयाबी की एक अनोखी और सच्ची कहानी....

एक ऐसी कहानी जो बन गयी है कामयाबी की मिसाल...

सॉफ्टवेयर की नगरी में आम आदमी का कमाल...

रमेश बाबू की संघर्ष और कामयाबी की अनोखी कहानी


मुश्किल शुरुआत

मेरा जन्म एक गरीब परिवार में हुआ। मेरा पिता नाई थे। जब मैं सिर्फ सात साल का था तब ही वो इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। 1979 में जब मेरे पिता की मौत हुई , तब तक तो सब ठीक था। लेकिन, उनकी मौत ने परिवार को हिला कर रख दिया। मानों, सब कुछ अचानक बिगड़ गया।बच्चों का पेट भरने के लिए मेरी माँ को लोगों के घर में नौकरी करनी पड़ी।

विरासत में पिताजी हमारे लिए बस एक दुकान छोड़ कर गए थे। बेंगलुरु के ब्रिगेड रोड पर ये दुकान थी, और वहीं वे लोगों के बाल काटते थे।

पिता की मौत के बाद मेरे चाचा ने दुकान का कामकाज संभाला। किराये के तौर पर चाचा हमें हर दिन 5 रुपये दिया करते थे। उन दिनों में भी पाँच रुपये बहुत ही मामूली रकम थी। पाँच रुपये में घर चलना बहुत ही मुश्किल-भरा काम था। मेरे भाई, मेरी बहन और मेरी पढ़ाई - लिखाई, खान-पान और दूसरी ज़रूरतें पाँच रुपये में पूरी हो ही नहीं सकती थीं। हम तीनों - बहन भाइयों ने मजबूरी में दिन में बस एक की बार भोजन करना शुरू किया। दूसरों के घर में नौकरी करने लगी मेरी माँ की मदद करने के मकसद से मैंने भी छोटे-मोटे काम करने शुरू किये। मिडिल स्कूल की पढ़ाई करते हुए ही मैंने अखबार और दूध की बोतलें बेचना शुरू किया। बड़ी की मुश्किल-भरे दिन थे वो। किसी तरह हम सभी ने मिलकर एक दूसरे की मदद करते हुए अपने वो दर्द भरे दिन गुज़ारे। जीवन की इसी उठा-पठक की बीच मैं अपनी दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की थी।

बदलाव की घड़ी

90 के दशक की बात है। मैं शायद ग्यारहवीं में था। एक दिन मेरी माँ और मेरे चाचा में जमकर लड़ाई हो गयी। अचानक ही चाचा ने दुकान का किराया देना बंद कर दिया था। इसी बात को लेकर लड़ाई हुई थी। उसी दिन मैंने अपनी माँ से कहा था कि पिताजी की दुकान अब से मैं चलाऊंगा। लेकिन, माँ ने इंकार कर दिया। माँ चाहती थी कि मैं अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूँ। ज़िद पर अड़कर मैं माँ को मनाने में कामयाब हुआ था। उस दिन से मैं भी दुकान जाने लगा। सुबह ही मैं दुकान चला जाता। बाल काटने की कला सीखने की शुरुआत हो गयी थी, लेकिन मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। सुबह दुकान, शाम को पढ़ाई और फिर रात को दुकान। …यही अब मेरी दिनचर्या बन गयी थी। दुकान रात में एक बजे तक खुली रहती , और मैं भी तब तक बाल काटने का हुनर सीख रहा होता। और, इन्हीें दिनों से लोग मुझे भी नाई बुलाने लगे थे। अब मेरी भी पहचान दुकान से थी और मैं भी नाई हो गया था।

ज़िन्दगी बदलने वाला वो आइडिया

1993 में मेरे चाचा ने एक कार खरीदी। न जाने क्यों मेरे मन में गुरूर जागा। सोचा मुझे भी कार खरीदनी चाहिए। छोटी-मोटी , जो भी बचत थी वो सब इक्कट्ठा की। फिर भी कार खरीदने के लिए रुपये कम पड़े। मैंने ठान लिया था कि कार खरीदनी है तो बस खरीदनी है , उसके लिए चाहे कुछ भी क्यों न करना पड़े। फैसला किया कि क़र्ज़ लिया जाय। क़र्ज़ लेने के लिए दादाजी की संपत्ति को गिरवी रखना पड़ा था। ज़िद पक्की थी सो कार खरीद ही ली। मैं अब मारुती वैन का मालिक था और मुझे इस बात का बड़ा फक्र था कि मैंने अपने चाचा से अच्छी और बढियाँ गाड़ी ली है।

गाड़ी ले तो ली थी, लेकिन क़र्ज़ का ब्याज छह हज़ार आठ सौ रुपये महीना था। ब्याज की रकम अदा करना अब मेरे लिए मुश्किल होने लगा था। मेरी मुश्किल को जानकर नंदिनी अक्का, जिनके यहाँ मेरी माँ काम करती थी, ने एक सुझाव दिया। सुझाव था - ब्याज की रकम अदा करने लिए गाड़ी को किराये पर दिया जाए। मुझे सुझाव अच्छा लगा और मैं मान गया। नंदिनी अक्का ने ही मुझे कारोबार के गुर सिखाये। वो मेरी गुरु बन गयीं। वो मेरी बहन जैसी ही हैं। मैं जो कुछ भी हूँ उसमें उनका बड़ा योगदान है। मेरे जीवन में जो बड़े परिवर्तन आये वो उन्हीं की वजह से थे। उन्होंने मुझे अपनी बेटी की शादी में भी बुलाया और लोगों से मेरा परिचय भी करवाया।

सफल कारोबारी बनने की शुरुआत

1994 से मैंने गाड़ियों को किराये पर देने के कारोबार को तेज़ी से आगे बढ़ाया। नंदिनी अक्का जिस कंपनी में काम करती थीं, वही कंपनी पहली कंपनी थी जहाँ मैंने अपनी गाड़ी किराये पर दी थी। इस तरह कमाई होने लगी और धीरे- धीरे कमाई बढ़ने लगी, कारोबार भी बढ़ने लगा। मैंने एक के बाद एक गाड़ियां खरीदनी शुरू कीं।। 2004 तक मेरे पास पांच-छह कारें थीं। चूँकि मुझे गाड़ियों को किराये पर देने के कारोबार में मज़ा आने लगा था और कमाई भी अच्छी होने लगी थी, मैंने हज़ामत वाली अपनी दुकान से किनारा करने का मन बना लिया था। चूँकि गाड़ियों को किराये पर देने वाले कारोबार में दूसरे बहुत सारे कारोबारियों से मुकाबला बढ़ता जा रहा था, मैंने अपना पूरा ध्यान अब इसी कारोबार पर लगाने की ठान ली। उस समय सभी के पास छोटी गाड़ियां थी , सो मैंने कारोबार को बढ़ाने के मकसद से बड़ी गाड़ियां यानी लक्ज़री कारें खरीदना शुरू किया।

जोखिम भी उठाये

जब मैंने 2004 में पहली बार लक्ज़री कार खरीदी, तब सभी ने कहा कि मैं बहुत बड़ी गलती कर रहा हूँ। 2004 में चालीस लाख ख़र्च करना बहुत बड़ी बात थी। खर्च चाहे एक लक्ज़री कार के लिए ही क्यों न हो, चालीस लाख वाकई बहुत बड़ी बात थी। वैसे सच कहूँ तो मेरे मन में भी कुछ संदेह थे ,दुविधा भी थी। लेकिन, कारोबार को बढ़ाने के लिए जोखिम तो उठाना था , सो उठा लिया। साथ ही ये भी सोच लिया था कि अगर मामला बिगड़ गया तो लक्ज़री कार बेच दूंगा। लेकिन, बेचने की नौबत नहीं आयी। किसी और कारोबारी के पास नयी लक्ज़री कार नहीं थी, ये मेरे लिए फायदेमंद साबित हुआ। कुछ लोगों के पास सेकण्ड हैण्ड कारें थीं, लेकिन लोगों की पसंद मेरी नयी लक्ज़री कार बन गयी। बेंगलुरु में मैं ही ऐसा पहला शख्स था जिसने अपने रुपये से एक नयी लक्ज़री कार किराये पर लगाये थे।

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