विश्व की टॉप-50 बिज़नेस वुमन में शामिल हुई ये इनवेस्टमेंट बैंकर करती थीं कभी पिज्ज़ा डिलीवरी

जो करती थी कभी पिज़्जा डिलीवरी अब उसकी गिनती होती है विश्व की टॉप-50 महिलाओं में...

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जैसे-जैसे समय बदला वैसे-वैसे महिलाओं ने अपनी छवि को बदलने के साथ-साथ अपनी पहचान को भी बदला है। औरतें अब किसी सहारे की मोहताज नहीं। समाज में आये इस बदलाव के पीछे कई ऐसी महिलाओं की कहानी है, जिन्होंने दशकों पहले इस परिवर्तन की नींव रखनी शुरू की थी। उन्हीं में से एक हैं मनीषा गिरोत्रा। मनीषा ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक मोलिस (इंडिया) की सीईओ हैं और 6 सालों तक लगातार बिज़नेस टुडे में भारत की 25 सबसे शक्तिशाली बिज़नेस वुमन की सूची में शामिल रह चुकी हैं।

ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक मोलिस (इंडिया) की सीईओ मनीषा गिरोत्रा
ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक मोलिस (इंडिया) की सीईओ मनीषा गिरोत्रा
मनीषा ने अपने फ़ाइनेंशियल सर्विस के करियर की शुरूआत ग्रिंडलेज़ बैंक (लंदन) से की थी। इनवेस्टमेंट बैंकिंग के क्षेत्र में 25 साल से भी ज़्यादा का अनुभव रखने वाली 44 वर्षीय मनीषा, कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मर्जर ऐंड ऐक्वीजिशन डील्स का अहम हिस्सा रही हैं। वह फ़िलहाल अशोक लेलैंड, माइंडट्री और जियो पेमेंट्स बैंक के बोर्ड मेंबर्स में से एक हैं।

एक वक़्त था, जब देश में हर बड़े सेक्टर के ईको-सिस्टम में महिलाओं की प्रतिभागिता न के बराबर हुआ करती थी, जिसका आधार उनकी योग्यता नहीं, बल्कि उनका 'महिला' होना था। समय बदला और अब महिलाओं की छाप किसी उदाहरण की मोहताज नहीं। इस बदलाव के पीछे कई ऐसी महिलाओं की कहानी है, जिन्होंने दशकों पहले इस परिवर्तन की नींव रखनी शुरू की थी। परिवर्तन तो सामने आया, लेकिन ये कहानियां एक बड़े वर्ग तक पहुंचने से वंचित रह गईं। आज हम आपके सामने इनमें से एक कहानी को रखने जा रहे हैं, जिसमें अब भी दकियानूसी सोच से प्रताड़ित लोगों के लिए ढेर सारे सबक हैं।

हम बात कर रहे हैं, ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक मोलिस (इंडिया) की सीईओ मनीषा गिरोत्रा की। वह 6 सालों तक लगातार बिज़नेस टुडे की भारत की 25 सबसे शक्तिशाली बिज़नेस वुमन की सूची में शामिल रह चुकी हैं। साथ ही, 2014 और 2015 में वह फ़ॉर्चून इंडिया की 50 सबसे शक्तिशाली बिज़नेस वुमन की सूची का भी हिस्सा रह चुकी हैं। मोलिस ऐंड कंपनी से पहले वह यूबीएस (इंडिया) की सीईओ और कंट्री हेड थीं। उन्होंने अपने फ़ाइनेंशियल सर्विस के करियर की शुरूआत ग्रिंडलेज़ बैंक (लंदन) से की थी। इनवेस्टमेंट बैंकिंग के क्षेत्र में 25 साल से भी ज़्यादा का अनुभव रखने वाली 44 वर्षीय मनीषा, कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मर्जर ऐंड ऐक्वीजिशन डील्स का अहम हिस्सा रही हैं। वह फ़िलहाल अशोक लेलैंड, माइंडट्री और जियो पेमेंट्स बैंक के बोर्ड मेंबर्स में से एक हैं।

नौकरी के साथ-साथ की थी पिज़्जा डिलीवरी

मनीषा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स (डीएसई) से पोस्ट-ग्रैजुएट हैं। वह बताती हैं कि डीएसई से गोल्ड मेडलिस्ट होने के नाते उनके दिमाग में बड़े कामों की तस्वीर बना करती थी और उनके अंदर बदलाव लाने की लालसा भी तेज़ी से बढ़ रही थी, लेकिन शुरूआत आमतौर पर सामान्य ही होती है। कॉलेज से उनका प्लेसमेंट ग्रिंडलेज़ बैंक में हुआ और उन्हें इनवेस्टमेंट बैंकिंग का काम मिला। वह कंपनियों के स्टॉक स्टेटमेंट्स बनाया करती थीं। पुराने दिनों के संघर्ष को याद करते हुए उन्होंने बताया कि नौकरी के साथ-साथ वह कभी-कभी पिज़्जा डिलीवरी का काम भी करती थीं। मनीषा किसी भी सूरत में पीछे हटने वाली नहीं थीं। उन्होंने अपने काम को भरपूर वक़्त दिया। उन्होंने बताया कि मैंने इस संघर्ष से सीखा कि एक बिज़नेस को बनाने में कितनी मेहनत और वक़्त लगता है।

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अपनी शुरूआती सफलताओं के लिए मनीषा अपने पिता और घर के माहौल को क्रेडित देती हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने उन्हें हमेशा बेहतर काम करने की प्रेरणा दी और उनके परिवार में महिलाओं पर किसी तरह की पाबंदी नहीं थी।

कॉर्पोरेट वर्ल्ड में महिलाओं के प्रति लोगों की मानसिकता के संबंध में बात करते हुए मनीषा कहती हैं, कि लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते थे और उनके साथ अजीब तरह से पेश आते थे। ग्रिंडलेज़ में काम करने के दौरान उन्हें नियमित तौर पर दिल्ली और लंदन के बीच आना-जाना पड़ता था। उन्होंने अच्छा और बुरा दोनों ही तरह का समय देखा। उन्होंने बताया कि मीटिंग्स के दौरान लोग उनसे हाथ तक नहीं मिलाया करते थे और नमस्ते कर लेते थे। इतना ही नहीं उनसे अक्सर उनकी शादी के बारे में भी सवाल किए जाते थे, जिनके जवाब उन्होंने कभी नहीं दिए।

पति ने दिया भरपूर साथ

24 साल की उम्र में ही मनीषा की शादी हो गई थी। ऑफ़िस में काम करते हुए घर के लिए लेट हो जाना, उनके पति के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। उनके पति संजय अग्रवाल भी कॉर्पोरेट फ़ाइनैंसिंग के काम से जुड़े हैं। मनीषा ने बताया कि उनके पति दिल्ली में काम करते थे और उन्हें कुछ दिन काम के सिलसिले में मुंबई रहना पड़ा। मनीषा के पति ने किसी भी तरह के विरोध के बजाय उन्हें मुंबई में ही समय बिताने के लिए कहा, ताकि उनका प्रमोशन न रुके। कुछ साल ग्रिंडलेज़ में बिताने के बाद वह यूबीएस बैंक से जुड़ गईं, जहां पर उन्होंने दो दशकों की लंबी पारी खेली। 33 साल की उम्र तक मनीषा यूबीएस बैंक की सीईओ बन चुकी थीं। अपनी सफलता की वजह बताते हुए मनीषा कहती हैं कि उन्होंने कभी रुकने के बारे में नहीं सोचा।

मनीषा की ज़िंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण वक़्त

मनीषा अपनी बेटी तारा के जन्म के बाद के समय को अपने 25 सालों के करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण वक़्त मानती हैं। उनका कहना है कि काम का दबाव और दिन का एक बड़ा हिस्सा काम पर खर्च करने के बाद, छोटे बच्चे को पालना लगभग असंभव सा हो जाता है। इसके बावजूद उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने काम और बेटी की परवरिश के बीच पूरा तालमेल बिठाने की कोशिश की और वह काफ़ी हद तक सफल भी हुईं।

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घर और ससुराल, दोनों ही पक्षों की तरफ से मनीषा के ऊपर कभी काम को लेकर दबाव नहीं डाला गया, लेकिन बेटी पैदा होने के बाद कुछ चीज़ों पर उनकी सास को आपत्ति होने लगी। मनीषा उन दिनों के सबसे दर्दनाक पलों को याद करते हुए बताती हैं कि कई बार उन्हें काम के सिलसिले में देश से बाहर जाना होता था और उनकी बेटी घर पर बुखार से जूझ रही होती थी। इस समय में भी उन्होंने कभी समझौता नहीं किया और काम के वक़्त सिर्फ़ काम को प्राथमिकता दी। हालांकि, इसके पीछे वह परिवार की मौजूदगी को अहम पक्ष मानती हैं, जिनकी वजह से वह अपनी बेटी को बुखार की हालत में भी छोड़कर जा सकीं, क्योंकि उन्हें उसकी अच्छी देखभाल का पूरा भरोसा था।

मनीषा मानती हैं कि पति और पत्नी दोनों की जिम्मेदारी घर और परिवार के लिए बराबर की होती है। साथ ही, वह इस बात से भी इत्तिफ़ाक़ रखती हैं कि उस दौर में घर के बुजुर्गों को ऐसी सोच के लिए सहज बनाना, बड़ी टेढ़ी खीर था।

'किसी भी मायने में पुरुषों से कम नहीं महिलाएं'

यूबीएस में 20 सालों की सेवा के बाद उन्होंने पूर्व बॉस के साथ मिलकर मोलिस इंडिया का सेटअप जमाने की शुरूआत की। उन्होंने कहा कि यह वक़्त प्रोफेशनली उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योंकि फ़ाइनैंशल सर्विस सेक्टर एक बड़े स्लो-डाउन से जूझ रहा था। उन्होंने बताया कि मोलिस की इंडिया यूनिट, इंडस्ट्री के लिए पूरी तरह से नई थी और उन्हें ग्राउंड ज़ीरो से शुरूआत करनी थी।

मनीषा मानती हैं कि इस वक़्त तक वह ईको-सिस्टम की चुनिंदा महिलाओं में से नहीं थी क्योंकि अब महिलाएं कॉर्पोरेट वर्ल्ड का अहम हिस्सा बनने लगी थीं। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि कोई भी सेक्टर हो महिलाएं, पुरुषों से बेहतर साबित हो रही थीं। वह मानती हैं कि महिलाएं, पुरुषों की अपेक्षा काम और घर के बीच में बेहतर तालमेल बना सकती हैं और इस वजह से ही उन्हें प्राथमिकता भी मिल रही है।

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