13 साल का बच्चा कोरियर सर्विस के लिए कर रहा मुंबई के ‘डब्बावाला’ नेटवर्क का इस्तेमाल

बड़ों-बड़ों पर भारी इस 13 साल के बच्चे का बिज़नेस आइडिया...

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 इस करिश्माई दुनिया में कई शख़्सियतें ऐसी भी होती हैं, जो उम्र के पैमानों से ऊपर उठकर ज़िंदगी जीती हैं। ऐसे ही हैं, मुंबई के रहने वाले तिलक मेहता। नाम और तारीफ़ पढ़कर आपको लग रहा होगा कि जैसे यहां पर किसी वयस्क की बात हो रही है, लेकिन आपको बता दें कि तिलक अभी 8वीं कक्षा में पढ़ते हैं और उनकी उम्र महज़ 13 साल है।

तिलक शाह मेहता
तिलक शाह मेहता
तिलक ने एक टेक स्टार्टअप की शुरूआत की है, जो मुंबई के लोकप्रिय डब्बावाला नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए, बेहत कम दामों पर बाक़ी सामानों की डिलिवरी की सुविधा भी सुनिश्चित करता है।

हम सभी के सामने उम्र के हर पड़ाव पर अलग-अलग तरह की चुनौतियां और समस्याएं पेश आती हैं। आमतौर पर कम उम्र में लोग और हम ख़ुद भी समझ की दुहाई देकर इन समस्याओं को या तो नज़रअंदाज़ कर देते हैं या फिर इन्हें दूर करने के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। लेकिन इस करिश्माई दुनिया में कई शख़्सियतें ऐसी भी होती हैं, जो उम्र के पैमानों से ऊपर उठकर ज़िंदगी जीती हैं। ऐसे ही हैं, मुंबई के रहने वाले तिलक मेहता। नाम और तारीफ़ पढ़कर आपको लग रहा होगा कि जैसे यहां पर किसी वयस्क की बात हो रही है, लेकिन आपको बता दें कि तिलक अभी 8वीं कक्षा में पढ़ते हैं और उनकी उम्र महज़ 13 साल है।

तिलक ने एक टेक स्टार्टअप की शुरूआत की है, जो मुंबई के लोकप्रिय डब्बावाला नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए, बेहत कम दामों पर बाक़ी सामानों की डिलिवरी की सुविधा भी सुनिश्चित करता है। तिलक ने पेपर्स ऐंड पार्सल्स (Papers N Parcels) नाम से इस स्टार्टअप की शुरूआत की है।

हम में से लगभग सभी के साथ अक्सर यह वाक़या होता है कि हम अपना कोई ज़रूरी सामान अपने किसी दोस्त के घर पर या फिर ऑफ़िस वगैरह में भूल जाते हैं, लेकिन कितने लोग हैं जिन्होंने इस समस्या को व्यापक स्तर पर देखा हो और इसका कोई प्रभावी उपाय ढूंढ निकालने की कोशिश की हो। तिलक अपने स्टार्टअप के माध्यम से मुंबई के अंदर 4-8 घंटों के भीतर आपके सामान की डिलिवरी की सुविधा दे रहे हैं। तिलक के पिता लंबे समय से लॉजिस्टिक के बिज़नेस से जुड़े हुए हैं और उन्होंने अपने बेटे का पूरा साथ दिया।

तिलक मेहता मुंबई के गरोडिया इंटरनैशनल स्कूल में 8वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे हैं। दरअसल, एक बार तिलक अपने ही रिश्तेदार के घर पर अपनी किताबें भूल गए थे। तिलक को घर आकर जब यह बात ध्यान आई, तब उनका मन हुआ कि काश कोई ऐसी कोरियर सर्विस होती, जो जल्द से जल्द उन तक उनकी किताबें पहुंचा देती। इसके बाद ही तिलक ने 'पेपर्स ऐंड पार्सल्स' के आइडिया पर काम करना शुरू किया।

तिलक बताते हैं, "मैं कई दिनों तक इस बारे में सोचता रहा। इस घटना के बाद जब एक दिन मैंने अपनी बिल्डिंग में डब्बे वाले को देखा तो मेरे दिमाग में पेपर्स ऐंड पार्सल्स का आइडिया आया। मैं हमेशा से ही डब्बावाला फ़ूड डिलिवरी नेटवर्क की सर्विस का मुरीद रहा हूं और तभी मेरे दिमाग़ में ख़्याल आया कि क्या इस नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए नॉन-फ़ूड आइटम्स की डिलिवरी नहीं की जा सकती?"

तिलक मानते हैं कि इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मेरी उम्र कम है और मैं अभी स्कूल में पढ़ता हूं। तिलक का कहना है कि यह एक गंभीर समस्या थी, जो लोगों की आम ज़रूरतों से जुड़ी हुई थी और इसे दूर करना भी ज़रूरी था। तिलक ने अपने आइडिया के बारे में अपने पिता विशाल मेहता को बताया और उन्हीं की मदद से तिलक ने अपने आइडिया को साकार करते हुए मार्केट में अपनी ऐप लॉन्च की।

डब्बे वालों को ऐंड्रॉयड फ़ोन दिए गए हैं, जिनमें पीएनपी ऐप मौजूद है। यूज़र्स को सुविधाएं लेने के लिए गूगल प्लेस्टोर या अपने ऐप स्टोर से पार्सल्स ऐंड पेपर्स की ऐप डाउनलोड करनी होती है, जिसके माध्मय से वह अपनी मनचाही लोकेशन से पिकअप शेड्यूल करा सकते हैं और साथ ही, ऐप के माध्यम से पिकअप का ऑर्डर देने वाले की लोकेशन भी डब्बे वालों के पास मौजूद स्मार्टफ़ोन्स पर आ जाती है। डब्बे वाला सेंडर की लोकेशन से पार्सल लेता है और फिर रिसीव करने वाली कंपनी के मेन हब तक पार्सल पहुंचाता है। यहां से पार्सल को फ़ाइनल अड्रेस पर डिलिवर कर दिया जाता है। पिकअप और डिलिवरी के इस किफ़ायती मॉडल के माध्यम से पैसे और समय दोनों की बचत होती है।

पार्सल्स ऐंड पेपर्स पिकअप की भी सुविधा देता है, जो अभी मार्केट की कोई भी कुरियर कंपनी नहीं देती। सबसे अच्छी बात यह है कि पार्सल की डिलिवरी 4-8 घंटों के भीतर ही हो जाती है और इस दौरान उपभोक्ता अपने पार्सल को पिकअप से लेकर ड्रॉप होने तक ट्रैक भी कर सकते हैं। डब्बेवालों को इस काम के लिए पेपर्स ऐंड पार्सल्स की तरफ़ से निर्धारित वेतन मिलता है। तिलक चाहते हैं कि आने वाले कुछ महीनों में डब्बे वालों को प्रत्येक पार्सल पर एक निर्धारित राशि दी जाए। अभी तक 300 डब्बेवाले तिलक की कंपनी के साथ जुड़ चुके हैं। तिलक ने बताया कि उपभोक्ता अपनी सहूलियत के हिसाब से डिलिवरी का समय चुन सकते हैं। यूज़र्स के लिए तीन टाइम स्लॉट्स विकल्प के तौर पर मौजूद रहते हैं। इतना ही नहीं भुगतान से जुड़ी सहूलियत के लिए यूज़र्स पेटीएम के माध्यम से पेपर्स ऐंड पार्सल्स के वॉलेट को सीधे ऑपरेट कर सकते हैं।

फ़िलहाल पेपर्स ऐंड पार्सल्स, बृहन्मुंबई नगर पालिका की सीमाओं के अंतर्गत अपनी सुविधाएं दे रहा है। कंपनी, रिहायशी इलाकों समेत कॉर्पोरेट यूनिट्स तक अपनी सुविधाएं पहुंचा रही है। तिलक ने बताया, "बीटा टेस्टिंग फेज़ के दौरान हमने सफलतापूर्वक कई लेन-देन किए। हमारे पास हज़ारों की संख्या में रीटेल और कॉर्पोरेट सेक्टर के बड़े क्लाइंट्स हैं और कंपनी के पास रोज़ाना 1000-1200 ऑर्डर्स आते हैं। हमारा लक्ष्य है कि आने वाले 6 महीनों में इस आंकड़े को 2-5 हज़ार तक पहुंचाया जा सके।"

तिलक बताते हैं कि कस्टमर्स और वेंडर्स को जोड़ने की कोशिश में उनकी उम्र कभी भी आड़े नहीं आई। वह कहते हैं, "जो वेंडर्स पहले कुछ ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे, बाद में वे मेरी लगन और काम की गुणवत्ता देखकर काफ़ी प्रभावित हुए और हमारे साथ आए। हमारे कस्टमर्स भी हमारी सुविधाओं से पूरी तरह संतुष्ट रहते हैं।" आपको बता दें कि पेपर्स ऐंड पार्सल्स पर बात करने के लिए तिलक को सूरत विश्वविद्यालय से बुलावा भी आ चुका है।

तिलक के स्टार्टअप में अभी तक पूरा निवेश उनके परिवार ने ही किया है। तिलक चाहते हैं कि कंपनी जब मुनाफ़े में जाएगी, वह निवेश का पैसा वापस कर देंगे। साथ ही, कंपनी की ग्रोथ को ध्यान में रखते हुए फ़िलहात तिलक बाहरी निवेश जुटाने की जुगत में भी लगे हुए हैं। कंपनी के फ़ाउंडर तिलक ने फ़ाइनैंस से जुड़े सभी मामलों की जिम्मेदारी अपने रिश्तेदार घनश्याम पारेख को दे रखी है और उन्हें कंपनी का सीईओ बनाया है। इसके अलावा, वैशाली नंदु के पास प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेशन की जिम्मेदारी है और मोबाइल ऐंड वेब-आधारित इनोवेशन के क्षेत्र में सालों का अनुभव रखने वाले जिग्नेश ब्रह्मखत्री कंपनी के सीटीओ हैं। फ़िलहाल कंपनी के पास 180 लोगों की टीम है।

तिलक ने अपनी पढ़ाई और स्टार्टअप के बीच कमाल का संतुलन बनाकर रखा हुआ है। वह शाम 4 बजे तक स्कूल में रहते हैं और इसके बाद वह सीधे अपने ऑफ़िस जाते हैं। अगर कभी किसी वजह से वह स्कूल के बाद सीधे ऑफ़िस नहीं जा पाते तो वह फ़ोन के ज़रिए ही काम संभालते हैं। हफ़्ते के आख़िरी दो दिनों में वह अपना आधा दिन ऑफ़िस में टीम के साथ मीटिंग्स आदि में खर्च करते हैं और इसके बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं।

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