सम्मान से जी रहे लाखों अजन्मी बेटियों के भ्रूण हत्यारे!

देश में लिंग परीक्षण विरोधी कानून होने बावजूद चोरी-छिपे बड़े पैमाने पर क्यों हो रही हैं बेटियों की भ्रूण हत्याएं? आप भी पढ़ें कन्या भ्रूण हत्या पर विशेष रिपोर्ट...

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लाखों अजन्मी बेटियों के हत्यारे समाज में सम्मान से जी रहे हैं। यह पूरी भारतीय अस्मिता के साथ एक बेहद शर्मनाक और विक्षुब्ध कर देने वाला सच है। एक नए अनुसंधान से पता चला है कि भारत में पिछले तीन दशक में लगभग 40 लाख अजन्मी बेटियों की हत्याएं कर दी गईं। यह मामला कितना संवेदनशील है, इसे विदेशियों से सबक लेकर जहन में उतारा जा सकता है कि फिल्म ‘सायलेंट क्रीज’ में गर्भस्थ शिशु की हत्या, उसके चीखने-चिल्लाने, असह्य वेदना के दृश्य देखकर अमेरिकी सरकार ने अपने यहां भ्रूण हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
 समाजशास्त्रियों के मुताबिक जीवन के तमाम क्षेत्रों में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बावजूद आज भी बेटी के जन्म को बराबरी की निगाह से नहीं देखा जा रहा है। देश में लिंग परीक्षण विरोधी कानून होने बावजूद चोरी-छिपे बड़े पैमाने पर बेटियों की भ्रूण हत्याएं हो रही हैं।

केंद्र सरकार की ख्वाहिश है, देश का नारा है - 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'। और धरातल की सच्चाई क्या है, देश के लोग उस नारे को, आह्वान को, कितनी गंभीरता से ले रहे हैं? संभवतः ऐसे ही हालात के मद्देनजर पीएम नरेंद्र मोदी ने 'बेटी बचाओ' मिशन को इतनी शिद्दत से अपने प्राथमिक दायित्वों में शामिल किया होगा। जिस भारतीय समाज में प्रतिदिन लगभग दो हजार कन्याओं की जन्म से पहले ही भ्रूण हत्याएं कर दी जा रही हों, वहां के लोगों को इतना भयानक नरमेध विचलित क्यों नहीं कर रहा है? एक नए अनुसंधान के मुताबिक भारत में पिछले 30 सालों में कम से कम 40 लाख बच्चियों की भ्रूण हत्याएं कर दी गईं।

यह मामला कितना संवेदनशील है, इसे विदेशियों से सबक लेकर जहन में उतारा जा सकता है कि फिल्म ‘सायलेंट क्रीज’ में गर्भस्थ शिशु की हत्या, उसके चीखने-चिल्लाने, असह्य वेदना के दृश्य देखकर अमेरिकी सरकार ने अपने यहां भ्रूण हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था। हाल ही में भारत सरकार के नीति आयोग की एक रिपोर्ट आई है, जिसमें बताया गया है कि लिंगानुपात में गिरावट के मामले में गुजरात ने हरियाणा और राजस्थान जैसे बदनाम राज्यों को भी पीछे छोड़ दिया है। गुजरात में प्रति एक हजार लड़कों के अनुपात में मात्र 848 लड़कियां जन्म ले पा रही हैं। इससे पूर्व वर्ष 2011-2013 के वक्त ये अनुपात 911 का था।

वर्ष 2016-2017 में इस लिंगानुपात में और ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है। जन्म के समय लिंगानुपात देश की आबादी के संतुलन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण संकेत होता है। इससे पता चलता है कि भ्रूण के लिंग परीक्षण के बाद होने वाले गर्भपात के चलते लड़कियों की तादाद में कितनी गिरावट आई है। लाखों अजन्मी बेटियों के हत्यारे समाज में सम्मान से जी रहे हैं। यह पूरी भारतीय अस्मिता के साथ एक बेहद शर्मनाक और विक्षुब्ध कर देने वाला सच है। नीति आयोग की ‘हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया' यानी ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत' शीर्षक 104 पन्नों की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के 21 बड़े राज्यों में से 17 में हजारों अजन्मी बेटियां रोजाना जघन्य कंस-करतूतों की भेंट चढ़ जा रही हैं। जन्म के समय लैंगिक अनुपात में गिरावट के मामले में गुजरात के बाद हरियाणा की स्थिति शर्मनाक है। वहां प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की तादाद में भारी कमी आई है। इसके बाद राजस्थान, उत्तराखंड राज्य इस दागदार सूची में शुमार हुए हैं।

नीति आयोग और समाजशास्त्री हाल के वर्षों में लिंगानुपात में इस तेज गिरावट की वजह कन्याओं की भ्रूण हत्या मान रहे हैं। समाजशास्त्रियों के मुताबिक जीवन के तमाम क्षेत्रों में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बावजूद आज भी जन्म के समय उनको बराबरी की निगाह से नहीं देखा जा रहा है। देश में लिंग परीक्षण विरोधी कानून होने बावजूद चोरी-छिपे बड़े पैमाने पर बेटियों की भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। प्राइवेट क्लीनिकों के लिए तो यह अवैध कमाई का एक अच्छा-खासा धंधा बन चुका है। भ्रूण लिंग परीक्षण में आजकल ज्यादातर मां-बाप को जैसे ही पता चलता है कि अजन्मी संतान बेटी है, वे बेहिचक गर्भपात करा दे रहे हैं।

ऐसा नहीं कि ऐसा देश के सिर्फ पिछड़े वर्गों में हो रहा है। शहरातियों में भी ये नृशंस प्रवृत्ति गंभीर तरीके से घर कर चुकी है। लिंगानुपात में भारी गिरावट इस बात का साफ संकेत है कि लोगों की मानसिकता में कत्तई बदलाव नहीं आया है। ऐसा सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम देशों में अजन्मी बेटियों को इस सामाजिक जघन्यता का सामना करना पड़ रहा है। इसे एक ताजा आकड़े के माध्यम से और विश्वसनीय ढंग से जाना जा सकता है। गत माह अप्रैल 2018 की एक ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अनुपात किस तरह औंधे मुंह गिरता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की इस जनसंख्या रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं की तादाद कम हो रही है।

यह अनुपात भारत में 107.6, चीन में 106.3 और भूटान में 113.4 है, जबकि कई देशों में तो कन्या जन्म जीरो अनुपात में है, मसलन, कुवैत 135.0, इक्वेटोरियल गिनी 123.0 आदि। तीन-चार महीने पहले संयुक्त राष्ट्र की बाल संस्था यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में मां-बाप बीमारी के समय लड़कों की तुलना में लड़कियों के इलाज की चिंता कम करते हैं। इसीलिए जन्म के बाद पहले महीने में मरने वाले शिशुओं में लड़कियों की तादाद ज्यादा है। बताया गया है कि भारत में सबसे ज्यादा नवजात बच्चों की मौत हो रही है। हर साल यहां छह लाख से ज्यादा नवजात अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं और पूरी दुनिया में मरने वाले शिशुओं का यह करीब एक चौथाई है नवजात शिशुओं की मृत्यु दर भी लड़कों की तुलना में लड़कियों के लिए ज्यादा है। यहां तक कि पांच साल से कम उम्र में होने वाली बच्चों की मौत में भी लड़कियां ज्यादा हैं।

यूनिसेफ की भारत प्रतिनिधि यास्मीन अली हक कहती हैं कि लड़कियों के पास जैविक रूप से मजबूत होने की श्रेष्ठता है लेकिन यह दुखद है कि वे सामाजिक रूप से बेहद असुरक्षित हैं। उनके साथ यह भेदभाव उनके पैदा होने से पहले ही शुरू हो जा रहा है। रिपोर्ट में एक और सच्चाई का खुलासा किया गया है। बताया गया है कि भारत भर के सात से ज्यादा सरकारी अस्पतालों भी सिर्फ बच्चों का ही इलाज ज्यादा हो रहा है। इन अस्पतालों में साठ फीसदी से ज्यादा नवजात बच्चों के भर्ती होने की जानकारी मिली है। इससे पता चलता है कि लड़कियों के साथ कितनी भयावह किस्म की गैरकानूनी ज्यादतियां हो रही हैं। ज्यादातर अभिभावकों के लिए जैसे कन्याएं बोझ हो गई हैं। उनके इलाज तक में ऐसी बेशर्म कोताही हो रही है। यह उस हालात में हो रहा है, जबकि कन्याओं के अभिभावक उनकी शिक्षा-दीक्षा के नाम पर सरकार से विशेष आर्थिक मदद भी ले रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक नवजात लड़कियों की सबसे ज्यादा मौतें राजस्थान में हो रही हैं। वहां के कुपोषण केंद्रों में भी लड़कियों की तुलना में लड़के ही ज्यादा लाए जा रहे हैं।

हैरत की बात है कि भारत के सबसे समृद्ध राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में लिंगानुपात सबसे कम है, जबकि भारत सरकार प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण एवं कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगा चुकी है। अजन्मी कन्याओं के प्रति इस अन्याय, असमानता पर कैसे काबू पाया जाए, समाजशास्त्रियों और विशेषज्ञों का कहना है, सरकार को सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या संबंधी कानूनों को और ज्यादा कड़ाई से लागू करना होगा। पूरे भारतीय समाज के दिमाग में पुरुष वर्चस्व का भूत घुसा हुआ है। वही भूत अजन्मी बेटियों की जान का दुश्मन है। जब तक वह भूत लोगों के दिमाग से निकाल बाहर नहीं कर दिया जाता है, यह सिलसिला थमने वाला नहीं है चाहे जितने कानून लागू किए जाएं, अथवा सियापा पीटा जाए।

अंदेशा जताया गया है कि हालात काबू नहीं होते हैं तो आगामी एक दशक के भीतर ही यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो सकती है यानी हमारे समाज में आधी आबादी और अधिक संकटापन्न हो सकती है। मौजूदा स्थितियों पर अंकुश लगाने के लिए भ्रूण का लिंग परीक्षण कराने के बाद होने वाले गर्भपात के मामलों के प्रति कड़ा रुख अख्तियार करने के लिए प्री कंसेप्शन एंड प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम, 1994 के प्रावधानों को कड़ाई से लागू करना जरूरी हो गया है। 

केंद्र सरकार इसी दिशा में मिशन जारी रखते हुए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' पर लगातार जोर देने लगी है। ये हालात इस बात के संकेत हैं कि हमारी आर्थिक समृद्धि और शिक्षा के बढ़ते स्तर का इस समस्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। फिर भी अजन्मी कन्याओं का जीवन बचाने वाली आधुनिक प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग रोकने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। बहुत जरूरी हो गया है कि भ्रूण हत्याएं रोकने के लिए राज्य सरकारें, खासकर निजी क्लीनिकों का लगातार औचक निरीक्षण कराएं। जांच रिपोर्ट में ईमानदारी और सतर्कता बरतते हुए दोषी क्लीनिक बेहिचक सील कर दिए जाएं। साथ उन्हें आर्थिक रूप से भी दंडित किया जाए।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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