34 सरकारी स्कूलों में शौचालय से लेकर स्पोर्ट्स के कपड़ों तक, सबकुछ उपलब्ध करा रहा है ये शख्स

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श्रीधर रेड्डी सामाजिक कार्य पर अपनी सैलरी का 40% खर्च करते हैं। इसके अलावा वे अपने फेसबुक पेज 'मन्ना मिरियालागुडा' के माध्यम से क्राउड फंडिंग भी कर रहे हैं।

श्रीधर (फोटो साभार- द न्यूज मिनट)
श्रीधर (फोटो साभार- द न्यूज मिनट)
इसके अलावा श्रीधर वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले कौशिक और शंकर, दोनों की छात्रों एजुकेशन को स्पॉन्सर कर रहे हैं। ये दोनों दिहाड़ी मजदूरों के बेटे हैं।

देश में सरकारी स्कूलों की हालत क्या है इसको लेकर आए दिन हम अखबारों में पढ़ते रहते हैं। देश में ऐसे कई सरकारी स्कूल हैं जहां कि बिल्डिंग बुरी हालत में खड़ी है। बरसात में पानी टपकता रहता है। बच्चे स्कूल जानें तक डरते हैं। यहां तक कि स्कूलों में शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का बेहद आभाव रहता है। हालांकि कुछ समर्थ लोग हैं जो अभी भी सरकारी महकमें का इंतजार किए बिना बच्चों के लिए मिसाल पेश करने वाले काम कर रहे हैं। इन्हीं लोगों में एक नाम है श्रीधर रेड्डी का। श्रीधर रेड्डी सामाजिक कार्य पर अपनी सैलरी का 40% खर्च करते हैं। इसके अलावा वे अपने फेसबुक पेज 'मन्ना मिरियालागुडा' के माध्यम से क्राउड फंडिंग भी कर रहे हैं।

अगस्त 1999 में, एक सरकारी स्कूल का टीचर श्रीधर रेड्डी के घर गया और उन्हें स्वतंत्रता दिवस के लिए अपने स्कूल आने का निमंत्रण दिया। ये स्कूल तेलंगाना के एडुलगुडेम में था जहां से श्रीधर के पिता का खासा नाता रहा है। जिस सरकारी टीचर ने श्रीधर को निमंत्रण दिया था वो उनके स्वर्गीय पिता के परिचित थे इसलिए वह स्वतंत्रता दिवस पर जाने के लिए तुरंत सहमत हो गए। स्कूल विजिट के दौरान, श्रीधर ने पाया कि कैसे उनके पिता स्कूल में बच्चों के लिए हर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर गतिविधियों की व्यवस्था करते थे और स्कूल में कुछ वंचित बच्चों की शिक्षा का वहन भी वे खुद उठाते थे। हालांकि न तो श्रीधर और न ही उनके परिवार को इसके बारे में कुछ पता था। जब श्रीधर को स्कूल जाने पर ये पता चला तो वे काफी भावुक और आश्चर्यचकित हो गए।

द न्यूज मिनट के मुताबिक, श्रीधर याद करते हुए कहते हैं, "ये काफी भावनात्मक पल था, क्योंकि हम हमारे पिता के इस पक्ष को कभी नहीं जानते थे। वे 1998 में एक माओवादी हमले में मारे गए थे। मेरे पिता सरकारी कर्मचारी थे। वे यदागिरिगुट्टा की तीर्थ यात्रा पर थे, जब उन्हें माओवादियों ने मार डाला। यह एक गलत पहचान का मामला था। मेरे पिता अपने दोस्त के घर गए थे जो यदागिरिगुट्टा में पुलिस निरीक्षक थे।" श्रीधर याद करते हैं कि माओवादियों ने उन्हें भी एक पुलिस अधिकारी समझ लिया और उन्हें मौके पर ही मार दिया। मिरलागुडा के पास, एडुलगुडेम के स्कूल की विजिट ने श्रीधर को प्रेरित किया और उन्होंने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का फैसला किया। 41 वर्षीय श्रीधर बताते हैं, "15 अगस्त 1999 को, मैंने स्कूल में बच्चों को कुछ किताबें और चित्रकारी सामग्री दान की। बाद में, जब मैंने पाया कि छात्रों के पास बैठने के लिए एक भी बेंच या कुर्सी नहीं है, तो मैंने अपनी बचत से 90,000 रुपये निकाले और ये सारा सामान मंगाया।" तब से, मेदक जिले के एक सरकारी कर्मचारी मानम श्रीधर रेड्डी ने मिर्यालागुडा के आसपास के 34 सरकारी स्कूलों को गोद ले चुके हैं।

41 वर्षीय श्रीधर कहते हैं, "मैं स्कूली बैग, किताबें, फूड प्रोविजन, प्रोजेक्टर, स्टडी मटेरियल, पेंटिंग किट, बेंच, शीलिंग फैंस, शौचालयों का निर्माण, खेल उपकरण और बुनियादी ढांचे के अन्य पहलुओं की व्यवस्था से जुड़ी हर चीज उपलब्ध कराता हूं।" श्रीधर मुस्कुराते हुए आगे कहते हैं, "मैं खुद हर स्कूल में जाता हूं, बच्चों के साथ बातचीत करता हूं और उनकी प्रतिभाओं की पहचान करता हूं। कुछ बच्चों की खेल में दिलचस्पी होती है, कुछ की किताबों में, जबकि कई ने मुझे उचित प्रयोगशाला बनाने के लिए भी कहा है। मैं हर रविवार अलग-अलग स्कूलों का दौरा करने में बिताता हूं। मेरे ऑफिस में मेरी एक भी कैजुअल लीव पेडिंग नहीं है।"

‘मन्ना मिरयलागुड़ा’

2009 में, दो स्कूलों को गोद लेने के बाद, श्रीधर को प्रिंसिपल से कई रिक्वेस्ट मिलीं कि वे उनके स्कूलों को गोद लें। एक दशक के सामाजिक कार्य के बाद, श्रीधर को एहसास हुआ कि वह अकेले ऐसा नहीं कर सकते। इससे उनके बैंक बैलेंस भी खत्म होता जा रहा था। श्रीधर बताते हैं, "यही वह समय था जब मैंने एक फेसबुक पेज शुरू करने के विचार किया। जहां मैं मिर्यालागुडा के निवासियों से जुड़ सकता था। इसमें मेरे कई दोस्त, रिश्तेदार शामिल थे जो विदेश में बस गए थे और कुछ बेहतर नौकरी की तलाश में शहर छोड़ चुके थे।" आज, मन्ना मिरयलागुड़ा के पास गर्व से 23,000 से अधिक की लोगों की सदस्यता है और इसके जरिए मिर्यालागुडा के आसपास ही नहीं, बल्कि पड़ोसी शहरों और गांवों में भी बहुत सारे सकारात्मक विकास हुए हैं।

श्रीधर कहते हैं, "उदाहरण के लिए, मिर्यालागुडा से करीब 20 किमी दूर मुकुलापुरम सरकारी स्कूल में, मेरे दोस्तों और मैंने सभी बच्चों के लिए स्पोर्ट्स शूज, स्पोर्ट्स ड्रेस, डिजिटल क्लासेस को सक्षम करने के लिए एक प्रोजेक्टर दिया, और स्कूल परिसर में सभी झाड़ियों हटा कर साफ खेल का मैदान तैयार किया। बच्चे वहां वॉलीबॉल खेलते हैं, और उनमें से कुछ को अंडर-14 राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए भी चुना गया है। यहां तक कि, तेलंगाना सांस्कृतिक संघ पोर्टलैंड की मदद से, हमने स्कूल की दो वॉलीबॉल खिलाड़ी उमा और शिल्पा की इंटरमीडिएट एजुकेशन को स्पोन्शर भी किया है।" मुकुंदपुरम में, श्रीधर और उनकी टीम ने छात्रों को परिसर में कार्बनिक खेती के तरीकों का उपयोग करके सब्जियां उगाना भी सिखाया है। श्रीधर और उनकी टीम ने हर स्कूल में सभी झाड़ियों को साफ कर उसे काम योग्य बनाया है। वे कहते हैं, "कई मौकों पर, छात्र स्कूल में उगाई गई उनकी खुद की सब्जियों का लंच करते हैं।"

इसके अलावा श्रीधर वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले कौशिक और शंकर, दोनों की छात्रों एजुकेशन को स्पॉन्सर कर रहे हैं। ये दोनों दिहाड़ी मजदूरों के बेटे हैं। श्रीधर कहते हैं, "कुछ साल पहले शंकर के पिता के साथ हुई एक भयंकर दुर्घटना के बाद शंकर को अपनी शिक्षा छोड़नी पड़ी। जब मैंने उसके स्कूल शिक्षक से उसके बारे में सुना तो, हमने उसकी एजुकेशन को फंड करने का फैसला किया। दोनों बच्चे अब स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते हैं।" केवल शैक्षणिक जरूरतें ही नहीं, श्रीधर और उनकी टीम स्कूलों में स्वास्थ्य और मानसिक जागरूकता से जुड़ी कक्षाएं भी आयोजित कर रही है। इसके अलावा मिर्यालगुडा के आसपास लोगों की वित्तीय सहायता भी कर रहे हैं।

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