सूखे के बावजूद महाराष्ट्र का यह किसान 1 एकड़ की जमीन से कमाता है लाखों

जो इलाके किसानों की आत्महत्या के लिए जाने जाते हैं, वहीं एक किसान खेती से कमा रहा है लाखों...

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अमेरिकी विद्वान कॉलिन पॉवेल का एक कथन है कि, 'कोई सपना किसी जादू के सहारे हकीकत में तब्दील नहीं हो सकता, उसके लिए पसीना, मेहनत और लगन की जरूरत होती है।' महाराष्ट्र के एक किसान विश्वननाथ बोबाडे ने शायद इस कथन को सही से पकड़ा और उसे अमल में लाकर आज देशभर के किसानों के लिए एक नजीर बन गए।

साभार: बेटर इंडिया
साभार: बेटर इंडिया
महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र को अब सूखाप्रभावित इलाका माना जाता है। साल 2013 को अगर हम छोड़ दें तो 2011 से लेकर अब तक वहां ढंग से बारिश नहीं हुई है। मराठवाड़ा जिले में एक इलाका बीड है जो किसानों की आत्महत्या के लिए कुख्यात है। उस इलाके में 2012 से लेकर अब तक कुल 702 से भी ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।

किसानों की रोजी-रोटी पर संकट आता है और उनके खाने के लाले पड़ते हैं। इस हालत में उनपर भारी कर्ज हो जाता है जिसके चलते उन्हें आत्महत्या करने की नौबत आती है। हालांकि इसी जिले में भैरावाडी गांव के किसान विश्वनाथ बोबाडे ने जो हासिल किया है उसकी कल्पना करना थोड़ा मुश्कल है।

अमेरिकी विद्वान कॉलिन पॉवेल का एक कथन है कि, 'कोई सपना किसी जादू के सहारे हकीकत में तब्दील नहीं हो सकता, उसके लिए पसीना, मेहनत और लगन की जरूरत होती है।' महाराष्ट्र के एक किसान विश्वननाथ बोबाडे ने शायद इस कथन को सही से पकड़ा और उसे अमल में लाकर आज देशभर के किसानों के लिए एक नजीर बन गए। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र को अब सूखाप्रभावित इलाका माना जाता है। साल 2013 को अगर हम छोड़ दें तो 2011 से लेकर अब तक वहां ढंग से बारिश नहीं हुई है। मराठवाड़ा जिले में एक इलाका बीड है जो किसानों की आत्महत्या के लिए कुख्यात है। उस इलाके में 2012 से लेकर अब तक कुल 702 से भी ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।

पूरे मराठवाड़ा में लगभग 2,450 किसानों ने अब तक मौत को गले लगा लिया। इन आत्महत्याओं की सिर्फ एक ही वजह है और वह है बारिश का न होना। बारिश न होने की वजह से सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है और इससे किसानों की फसलें चौपट होती हैं। फिर किसानों की रोजी-रोटी पर संकट आता है और उनके खाने के लाले पड़ते हैं। इस हालत में उनपर भारी कर्ज हो जाता है जिसके चलते उन्हें आत्महत्या करने की नौबत आती है। हालांकि इसी जिले में भैरावाडी गांव के किसान विश्वनाथ बोबाडे ने जो हासिल किया है उसकी कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है।

इस भयावह स्थिति के बावजूद वो अपने एक एकड़ के खेतों से हर साल 7 लाख रुपये की आमदनी कमा लेते हैं। विश्वनाथ ने केवल 5वीं तक की पढ़ाई की है। वे अपने खेतों में अपने बड़े भाई के साथ मिलकर मसूर की दाल और बाजरे जैसी फसलों की पारंपरिक खेती करते हैं। उनके पिताजी का देहांत हो जाने के बाद उन्हें अपनी 6 एकड़ जमीन बेचनी पड़ गई। इससे मिले पैसों से उन्होंने अपना मकान बनवाया। जिसके बाद उनके पास केवल 4 एकड़ खेती की जमीन बची। खेती से अच्छी कमाई न होने के कारण वे खेतों में मजदूरी करने लगे। 1992 में सड़क बनाने के लिए उनसे 2 एकड़ जमीन ले ली। बाकी बची 2 एकड़ जमीन उन दोनों भाइयों ने आपस में बांट ली।

अब विश्वनाथ के हिस्से में केवल एक एकड़ जमीन बची। वे मजदूरी से बचाए पैसों से खाद-बीज की व्यवस्था करते थे और पारंपरिक रूप से खेती करते थे। लेकिन सूखे जैसे कठिन हालात की वजह से उन्हें कोई फायदा नहीं मिलता था। इस स्थिति से हारकर विश्वनाथ ने सोचा कि खेती का कोई नया तरीका निकाला जाए। इसमें वे सफल भी हुए और खेती की बदौलत उनकी आय बढ़ती गई। विश्वनाथ को लगा कि सालभर में एक या दो फसलों से उतनी कमाई नहीं की जा सकती इसलिए उन्होंने मल्टी क्रॉपिंग आनी बहुफसलीय सिस्टम के सहारे खेती करनी शुरू की।

उन्होंने तुरई की फसल लगानी शुरू की। इससे वे एक साथ कई फसलें लगा सकते थे। इस प्रयोग से उन्हें हौसला मिला और वे साथ में गोभी, खीरा और भिंडी की भी फसल उगाने लगे। इसके बाद सिर्फ 6 महीने में उन्हें करीब 3 लाख रुपयों की आमदनी हुई। लेकिन अभी भी उनके सामने एक समस्या थी पानी के प्रबंध की। उन्होंने वॉटर सिस्टम को मजबूत करने के लिए कोशिश करना शुरू कर दिया। खेती से जो पैसे उन्होंने कमाए थे उन्होंने उन पैसों से अपने खेतों के पास एक कुआं बनवाया। उनके गांव के पास से ही बिंदुसार नदी बहती है। वहां से पाइपलाइन खींचकर वे अपना कुआं भरने लगे। कुएं से फव्वारों के जरिए वे सिंचाई करते हैं। इस विधि से सिंचाई करने पर एक तो पानी की बचत होती है दूसरी ओर पैसे भी न के बराबर खर्च होते हैं।

पानी की उचित व्यवस्था होने के बाद उन्होंने तरबूज और टमाटर भी लगाना शुरू कर दिया। विश्वनाथ ने मौसम के मुताबिक फसल लगाना शुरू किया और अब वे सालभर में 6-7 फसलें उगा लेते हैं। मई में वे गोभी, खीरा, ककड़ी, और गोभी की खेती करते हैं तो वहीं अगस्त में की तुरई की खेती करते हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए वे कहते हैं, 'मैंने जून में 4 लाख रुपये के टमाटर बेचे और जनवरी में 1 लाख की तुरई। गोभी से ज्यादा आमदनी नहीं हुई इसलिए अगले साल से कोई नई फसल लगाने के बारे में सोच रहा हूं।'

विश्वनाथ बताते हैं कि वे एक सीजन में 50,000 रुपये लगाते हैं और एक साल में उन्हें लगभग 5 लाख रुपये का मुनाफा होता है। उन्होंने अगले साल से पूरी तरह से जैविक खेती करने के बारे में सोचा है। इससे उनकी खेती करने की लागत में और कमी आएगी। वे बाकी सभी किसानों से कहना चाहते हैं कि कुछ भी नामुमिन नहीं है बस मार्केट पर नजर बनाए रखना है और अपने पास मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए मेहनत से काम करना है। सफलता जरूर मिलेगी।

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