गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत: दुर्घटना या मैन मेड त्रासदी

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गोरखपुर के अस्पताल में जिंदगी, मौत का मातम मना रही है। एक बूढ़ी दादी अपने पोते को खोने के गम में खुदा से खुद को भी उठा लेने की दुआ कर रही है। तो एक मां सामने लेटे अपने लख्तेजिगर के बे-रूह हो जाने की खबर पर यकीन न कर भगवान से प्रार्थना करते बे-सुध हो जाती है।

सांकेतिक तस्वीर: फोटो साभार, Shutterstock
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 इस बार फिजा कुछ बदली सी नजर आ रही है। मौजूदा मंजर कुछ ऐसा है कि मासूमों की दर्दनाक-खामोश मौत की चीत्कार का सन्नाटा अस्पताल के कोने-कोने तक पसरा हुआ है।

 रोशन हुये बिना ही बुझे चिरागों की बेबस आहों और लाचार कराहों में कहीं उस मां का दर्द भी तड़प रहा है जिसके लिये यह बेजान हो चुका बच्चा, तमाम मजारों पर फरियाद और अनेक मंदिरों की चौखटों पर मांगी गई मन्नतों का हासिल था।

जनाजों पर फूलों की बारिश तो एक दस्तूरी चलन है लेकिन फूलों का जनाजा तो शायद ही किसी ने देखा या तसव्वुर किया होगा। गोरखपुर का बीआरडी अस्पताल पांच दर्जन से ज्यादा फूलों के जनाजों का गवाह बन कर अपने वजूद पर आंसू बहा रहा है। हालांकि यह अस्पताल हर साल मासूमों की मौत के दाग को अपने दिल पर बर्दाश्त करता रहा है लेकिन इस बार फिजा कुछ बदली सी नजर आ रही है। मौजूदा मंजर कुछ ऐसा है कि मासूमों की दर्दनाक-खामोश मौत की चीत्कार का सन्नाटा अस्पताल के कोने-कोने तक पसरा हुआ है। जिंदगी, मौत का मातम मना रही है। एक बूढ़ी दादी अपने पोते को खोने के गम में खुदा से खुद को भी उठा लेने की दुआ कर रही है। तो एक मां सामने लेटे अपने लख्तेजिगर के बे-रूह हो जाने की खबर पर यकीन न कर भगवान से प्रार्थना करते बे-सुध हो जाती है। बाप, अपने बुढ़ापे की लाठी को खुद कब्र तक पहुंचाने के ख्याल से सिसकियां ले रहा है तो बूढ़े दादा की कमजोर आंखों से बह रहे आंसुओं में पूरी कायनात डूब जाना चाहती है। रोशन हुये बिना ही बुझे चिरागों की बेबस आहों और लाचार कराहों में कहीं उस मां का दर्द भी तड़प रहा है जिसके लिये यह बेजान हो चुका बच्चा, तमाम मजारों पर फरियाद और अनेक मंदिरों की चौखटों पर मांगी गई मन्नतों का हासिल था। उसके कहकहों की वजह और उसके अरमानों की उड़ान था। उसकी लोरियों का नायक, उसकी कहानियों का प्रमुख किरदार तो उसकी ख्वाहिशों का अंजाम था। बच्चा हंसे तो वह हंसती थी, बच्चा रोये तो वह रोती थी। पूरी जिंदगी उस हंसते-खिलखिलाते बच्चे की हरकतों से बावस्ता थी, लेकिन अचानक लोरी में चंदा मामा को बुलाते-बुलाते एक दिन वह राजदुलारा/राजदुलारी खुद चला जाता/जाती है चंदा मामा के पास...फिर कभी न वापस आने के लिये। कितनी मन्नतें ऊपर वाले से मांगी, कितनी चौखटों पे हाजिरी लगाई, कितने मजारों पे सजदे किये, कितनी बार डाक्टरों से भीख मांगी लेकिन कुछ न हुआ। सब तरफ से वो अभागिन बस ठगी गयी। हाय रे मौत! तेरा नाश हो, उसके कलेजे का टुकड़ा उसकी गोद से खींच ही लिया तूने।

बहन अब कभी न लड़ऩे का वास्ता दे कर, हमेशा के लिये सो चुके अपने जिद्दी भाई को जगाने की आंसुओं में डूबी नाकाम कोशिश कर रही है। वह रोते हुये कहती है कि भगवान जी सारे खिलौने ले लो लेकिन भइया को जगा दो। लेकिन न खुदा का दिल पसीजा, न भगवान के आंसू निकले, न कोई फरिश्ता बचाने आया, न कोई देवता संजीवनी लेकर आया और धरती के भगवान तो पत्थर बन चुके थे, उनके मोम जैसे दिलों में तो जैसे जल्लाद की रूह ने कब्जा कर लिया था। बेहया इतने हुए कि कागज के चंद टुकड़ों के लिए बच्चों की सांसे ही खींच लीं। यमराज की शक्ल में भगवान अस्पताल में घूमते रहे और मुस्कुराते हुए बचपन की गर्दन मरोड़ दी। गोरखपुर हादसा चीख-चीख के सवाल कर रहा है कि इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?

सांकेतिक तस्वीर
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क्या ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी के लिए 69 लाख रुपए इतनी बड़ी रकम थी कि उसने सप्लाई बंद करने जैसा फैसला ले लिया? या फिर इसके लिए मुनाफे पर आधारित व्यवस्था जिम्मेदार है?

आखिर किस पर विश्वास किया जाए? एक बार अगर बकाये वाली बात को मान भी लिया जाए, तो क्यों नहीं इस बकाये की गम्भीरता को समझा गया? आखिर क्या मजबूरी थी कि भुगतान नहीं किया गया? किस स्तर पर भुगतान की फाइल रुकी हुई थी और इसके पीछे कारण क्या था? क्या वह कारण मासूमों की जिन्दगी से ज्यादा मूल्यवान था? क्या ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी के लिए 69 लाख रुपए इतनी बड़ी रकम थी कि उसने सप्लाई बंद करने जैसा फैसला ले लिया? या फिर इसके लिए मुनाफे पर आधारित व्यवस्था जिम्मेदार है? खबरें बताती हैं कि बकाये के रिमाइंडर वाले पत्र प्रिंसिपल के साथ-साथ गोरखपुर के जिलाधिकारी और यूपी के चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा विभाग के महानिदेशक को भी भेजी गयी थीं। ताज्जुब की बात है किसी ने भी उन पर ध्यान नहीं दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि 9 अगस्त को जब वो अस्पताल के दौरे पर थे तो उन्होंने पूछा था- 'और कोई आवश्यकता तो नहीं है? तो क्या उसके बाद भी, किसी को भी ऑक्सीजन की सप्लाई ठप होने की आशंका नहीं हुई? '

मुख्यमंत्री के दौरे में तो हर अधिकारी होगा जिस पर प्रशासनिक जिम्मेदारी है। तो क्या किसी का ध्यान नहीं गया या सच में सब मिले हुए थे? पेमेंट रोक रखने में भी कोई टीम वर्क काम कर रहा था क्या? क्या जिलाधिकारी को वस्तुस्थिति की कोई जानकारी नहीं रही? क्या पेमेंट रुके होने के पीछे कोई वजह या किसी पर उन्हें कभी शक भी नहीं हुआ? क्या चिकित्सा मंत्री वास्तव में ऑक्सीजन की सप्लाई और पेमेंट बकाया होने की बातों से बेखबर रहे? अगर नहीं तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? अगर ऐसा किया तो क्यों न उन्हें भी इसका कसूरवार समझा जाये? वैसे अब भी यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि चार महीनों की ही सत्ता में योगी का इकबाल इतना कम हो गया कि उनके गृहनगर के मेडिकल कॉलेज तक में थोड़े ज्यादा कमीशन के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी का भुगतान रोके रखा गया, कॉलेज को प्राचार्य के बजाय उनकी पत्नी चलाती रहीं और वस्तुस्थिति से अवगत होने के बावजूद कॉलेज प्रशासन या जिलाधिकारी किसी ने भी इस बड़ी त्रसदी को टालने के लिए समय रहते कोई कदम नहीं उठाया। तब भी जब ज्वर के मरीजों के लिए बना वार्ड मरीजों से भर गया और उसके फर्श व सीढ़िय़ों तक पर मरीज नजर आने लगे।

मौत की खबरें आनी शुरू हुईं तो भी मेडिकल कॉलेज का जोर इसी पर था कि उनके लिए ऑक्सीजन की कमी को वजह न बताया जाए। आम लोगों को यह जानकर भी गुस्सा आ रहा है कि अभी दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री मेडिकल कॉलेज के दौरे पर गए तो उन्हें वहां 'सब कुछ सामान्य मिला था। यह इसलिए भी हैरत में डालने वाली बात है कि वे मुख्यमंत्री बनने से पहले भी खुद के गोरखपुर में मस्तिष्क ज्वर के उन्मूलन के लिए समर्पित होने का दावा करते रहे हैं।

हालांकि यूपी सरकार इस मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। इसके लिये भी कोई आयोग बनेगा। जो इन मौतों की जांच करेगा, रिपोर्ट आएगी, रिपोर्ट में किसे गुनहगार ठहराया जाएगा, नहीं ठहराया जाएगा, क्लीन चिट दे दी जाएगी, जो होगा सो होगा, जो नहीं होगा वह यह कि ऐसी घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया जाएगा, स्वास्थ्य सेवा सरीखे क्षेत्र में लापरवाही के मामले जारी रहेंगे। यही नहीं प्रख्यात केजीएमयू में भी ऑक्सीजन के अभाव में गईं कई जानें लील चुका है। केजीएमयू में वर्ष 2016 से पहले ऑक्सीजन आपूर्ति की अव्यवस्था से कई मरीजों की जान जा चुकी है। यहां पूर्व में ऑक्सीजन सिलिंडर सिस्टम मरीजों पर भारी पड़ा। मगर अब प्लांट व पांच टैंक से सेंट्रलाइज ऑक्सीजन सप्लाई से कुछ सुधार हुआ है।

मगर अब भी कई वार्डों में ऑक्सीजन सिस्टम सिलिंडरों के सहार है। वरिष्ठ पत्रकार अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि सूबे के अस्पतालों को शासन, कमीशनबाजी के चक्कर में फण्ड जारी करने में हमेशा लेट-लतीफी करता है, जो ऐसे दुर्घटनाओं का कारण बनता है। सूबे के चिकित्सा मंत्री जिन नोडल सेन्टर्स सीएचसी और पीएचसी के दम पर गोरखपुर में जेई/इंसेफलिटिस को नियंत्रण करने की बात करते हैं, वहां का बजट लखनऊ के ज्यादातर अस्पतालों से कम है। इस साल गोरखपुर के सीएमओ को केवल 4.81 करोड़ रूपये दिये गये जिसमें सभी अस्पतालों और सीएचसीऔर पीएचसी को पैसा दिया जाएगा। वही लखनऊ में सचिवालय के डिस्पेंसरी को 2.64 करोड़, सिविल अस्पताल को 17.34 करोड़, लोहिया अस्पताल को 11.57 करोड़ रूपये, बलरामपुर अस्पताल को करोड़ रूपये, अवंतीबाई अस्पताल को 2.24 करोड़ रूपये, दिया गया है।

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने इन मौतों को हादसा मानने से इन्कार करते हुए 'सामूहिक हत्याओं' की संज्ञा दी और कहा है कि आजादी के सत्तर सालों बाद भी बच्चों का ऐसी मौतों के लिए अभिशप्त होना बेहद शर्मनाक है। इतने कम समय में इतनी मौतों के आंकड़े को स्वाभाविक बताना संवेदनहीनता के अलावा और कुछ नहीं। राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि एक बड़े हादसे की जिम्मेदारी लेने के बजाय लीपापोती की कोशिश कर रहे लोग कठोर दंड के भागीदार बनाए जाएं। ऐसा करते समय यह अवश्य देखा जाना चाहिए कि निचले स्तर के कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाने का काम न होने पाए। इस मामले में ऐसी कार्रवाई आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है जो मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ अन्य सभी सरकारी अस्पतालों के प्रशासन के लिए नजीर बन सके। यह समझने की जरूरत है कि ऐसे हादसे जवाबदेही के अभाव का नतीजा हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अभी पिछले माह लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ट्रामा सेंटर में आग लगने से लगभग एक दर्जन मरीजों की जान चली गई थी। बाद में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी यह विचित्र दलील देकर चलते बने कि आग लगने से किसी की मौत नहीं हुई, जबकि सबके समक्ष यह स्पष्ट था कि मरीजों की जान जल्दबाजी में उन्हें अन्यत्र ले जाने के कारण हुई थी। यह शर्मनाक है कि कुछ ही ऐसी दलीलों का सहारा गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के अधिकारी भी लेते दिख रहे हैं।

फोटो साभार: हिंदुस्तान
फोटो साभार: हिंदुस्तान

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में जो अनर्थ हुआ उससे यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की तमाम सख्ती के बाद भी प्रशासनिक तंत्र सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। यह तय है कि बिना सख्ती दिखाए और जानलेवा साबित हुई अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को वास्तव में जवाबदेह बनाए बात बनने वाली नहीं है। मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य अथवा अस्पतालों के मुख्य चिकित्साधिकारी सरीखे पद भले ही डॉक्टर संभालते हों, लेकिन वे एक तरह से प्रशासनिक पद ही होते हैं। चूंकि व्यवस्था दुरुस्त करना इन पदों पर बैठे लोगों की ही जिम्मेदारी होती है इसलिए किसी भी तरह की अव्यवस्था के लिए उन्हें ही कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।

यह भी वक्त की मांग है कि योगी सरकार मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ अन्य छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था को भी दूर करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए। दुर्भाग्य से मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों की जैसी असंतोषजनक स्थिति उत्तर प्रदेश में है वैसी ही अन्य अनेक राज्यों में भी। दरअसल इसी कारण सरकारी स्वास्थ्य ढांचा लगातार सवालों के घेरे में है और आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। अभी तक हमारे सरकारी अस्पताल उपचार की उचित व्यवस्था न होने के लिए ही चर्चा में रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे वे उस तरह के गंभीर हादसों के लिए भी सुर्खियों में आने लगे हैं जैसा गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में देखने को मिला। बेहतर हो कि केंद्र सरकार भी अपने स्तर पर यह देखे कि सरकारी स्वास्थ्य तंत्र लाइलाज क्यों होता चला जा रहा है? भाजपा के घोषणा पत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था को विज्ञान के मूल सिद्धान्तों की पहुंच बढ़ाना, गुणवत्ता में सुधार लाना, लागत कम करना के रूप में लिखा गया है। पर अब देखना यही है कि पूरे देश में भाजपा का विजय रथ चल रहा है, लेकिन इन गैर राजनीतिक मोर्चों, लोगों को राहत देने वाले तरीकों और उनकी जीवन को आसान करने वाली पराजयों पर उनकी जय होना कब शुरू होता है।

स्ट्रेचर पर है राजधानी के अस्पतालों में ऑक्सीजन आपूर्ति सिस्टम

राजधानी लखनऊ के अस्पतालों में ऑक्सीजन आपूर्ति सिस्टम गड़बड़ी का शिकार है। यहां भी बगैर नियम-कानून के गैस की खरीदारी हो रही है। और मेडिकल गैस का बैकअप सिस्टम भी कमजोर है। ऐसे में यदि आपूर्तिकर्ता कंपनी का जरा भी मन बिगड़ा तो गोरखपुर मेडिकल कॉलेज जैसी घटना का दोहराना तय है। राजधानी में स्वास्थ्य विभाग के करीब 11 अस्पताल हैं। इसके अलावा नौ ग्रामीण व आठ शहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल को छोड़कर किसी अस्पताल की ऑक्सीजन खरीदारी टेंडर के जरिए नहीं हो रही है। सभी सिविल अस्पताल के टेंडर से तय दर पर एक कंपनी से ऑक्सीजन की खरीदारी कर रहे हैं। ऐसे में इन अस्पतालों में बगैर नियम कानून के ऑक्सीजन की हो रही खरीद से कंपनी को जवाबदेही से छूट दे दी है। लिहाजा, यदि कंपनी ने कभी भी सप्लाई में आनाकानी की तो अस्पताल प्रशासन के पास ठोस जवाब नहीं होगा। ऐसे में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज जैसी घटना होना तय है।

गौरतलब है कि राजधानी के लोहिया अस्पताल, बलरामपुर और सिविल अस्पताल में प्रदेश के कई जनपदों से मरीज इलाज के लिए आते हैं। 451 से 750 बेड की क्षमता वाले इन अस्पतालों में ऑक्सीजन का बमुश्किल 24 घंटे का बैकअप है। मसलन आपूर्तिकर्ता कंपनी की आनाकानी या कोई हादसे की वजह से सिलिंडर नहीं पहुंचे तो अस्पताल में आफत आनी तय है। स्थिति यह है कि अस्पताल में अधिकतम 24 घंटे का ही बैकअप है। वहीं यदि गंभीर मरीजों की संख्या अधिक हो गई तो मुसीबत का खतरा और बढ़ जाता है। राजधानी के महिला अस्पतालों में भी खरीदारी सिविल अस्पताल की कंपनी से हो रही है। इनमें भी ऑक्सीजन का बैकअप 24 घंटे का ही है।

अस्पतालों में ऑक्सीजन स्टोर के कर्मी व कंपनी की साठगांठ से भी मरीजों की जान दांव पर लगा रही है। यहां सिलिंडर में गैस कम आना तो आम बात है। वहीं कर्मचारी स्टॉक में भी खेल कर रहे हैं। आलम, यह है कि रजिस्टर पर इंट्री व भुगतान तो अधिक का कर रहे हैं, लेकिन आपूर्ति कम ले रहे हैं। इसका मामला बलरामपुर व लोहिया में पकड़े जाने पर 13 जनवरी 2017 को डीजी हेल्थ डॉ. पदमाकर सिंह ने जांच के आदेश दिए थे। अस्पतालों में सिलेंडर की आपूर्ति के वक्त सिलिंडर की प्रेशर मीटर से जांच नहीं की जाती है। ऐसे में सिलिंडर में गैस पूरी है या आधी इसका कुछ पता नहीं चलता है। सभी सिलिंडर को प्लांट में लगाते वक्त लाइन में लगे प्रेशर मीटर देखकर ऑक्सीजन की स्थिति देखी जाती है। प्लांट में एक साथ आठ-दस सिलिंडर लगने से किस में गैस कम है, इसका आकलन नहीं हो पाता है।

सिविल अस्पताल में 400 बेड की क्षमता है। वहीं चार वार्डो में बंटी इमरजेंसी में कुल 30 बेड हैं, इसमें से शनिवार (12 अगस्त) को सिर्फ छह बेड पर ऑक्सीजन व्यवस्था थी। वार्ड ए में नौ बेड हैं, इनमें पांच पर पाइप सिस्टम है। वहीं इनमें भी दो पर ही ह्यूमिडी फायर है। वार्ड बी में छह बेडों में से चार पर पाइप लगी है और दो जगह ह्यूमिडी फायर है। ऐसे सी वार्ड में पांच पर ऑक्सीजन है, मगर ह्यूमिडी फायर किसी में नहीं। वहीं बर्न के गंभीर मरीजों के लिए आठ बेड हैं इनमें से सिर्फ दो पर ह्यूमिडी फायर लगे हैं, शेष में सॉकेट तो किसी में ह्यूमिडी फायर नहीं हैं। लोहिया अस्पताल 475 बेड का है। इसमें में से मुख्य इमरजेंसी 37 बेड व ट्रॉमा आठ बेड का है। वहीं महिला इमरजेंसी में 28 के करीब बेड हैं। दोनों इमरजेंसी में ऑक्सीजन की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है, जबकि इसमें स्वाइन फ्लू वार्ड से लेकर हाईडिपेंडेंसी यूनिट है। इसमें छह बेड पीडियाटिक वार्ड में, जिसमें दो पर ह्यूमिडी फायर, छह बेड के स्वाइन फ्लू वार्ड में दो पर, छह बेड की हाई डिपेंडेंसी वार्ड में चार पर, 10 बेड के वार्ड में चार व 11 बेड के वार्ड में पांच पर ह्यूमिडी फायर लगे मिले। शेष से ऑक्सीजन सॉकेट ही गायब मिले।

बलरामपुर अस्पताल में 750 बेड की क्षमता है। यहां 40 बेड की इमरजेंसी में सभी पर ऑक्सीजन सुविधा दुरुस्त मिली। वहीं हॉल में पड़े 12 स्टेचर पर भी ऑक्सीजन सप्लाई पाइप लाइन से है। मगर वार्डो में ऑक्सीजन सिस्टम दुरुस्त नहीं है। अभी कुछ ही वार्ड में ऑक्सीजन की पाइप डाली गई है। इससे प्लांट से ऑक्सीजन के बजाए सीधे सिलिंडर से मरीजों को दी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में खुली सीएचसी पर ऑक्सीजन व्यवस्था बेहद खराब है। यहां कोई कंपनी सिलिंडर देने नहीं आती, बल्कि स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी खुद कर्मी को भेजकर कंपनी से गैस भरवाते हैं। वहीं 30-30 बेड की सीएचसी पर सिलिंडरों का स्टॉक भी बेहद कम है। 

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लेखक / पत्रकार

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