'कॉलेज ड्राप आउट' से 'मिल्यनेर हैकर' बनने का अनोखा सफर है शशांक का

न बड़ी डिग्री थी, न मोटी रकम, फिर भी काबिलियत से किया कारोबारकौशल और मेहनत के बल पर कंपनी को दिया विस्तारपाँच हज़ार से शुरू कंपनी का कारोबार पहुंचा सालाना पाँच करोड़ के पारसफलता से बदली समाज की 'कॉलेज ड्राप आउट' के प्रति नज़र

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बिल गेट्स , स्टीव जॉब्स, मार्क ज़ुकेरबर्ग ये वो तीन शख्सियतें हैं जो आज दुनिया-भर में मशहूर हैं। शायद ही कोई देश होगा जहाँ इनके नाम की चर्चा ना होती हो। इन तीनों की कंपनियों के प्रोडक्ट और इनके आविष्कार दुनिया के कोने-कोने में सुप्रसिद्ध हैं। इन तीनों ने अपने जीवन में जो कामयाबियां हासिल की हैं , वो कामयाबियां मौजूदा दौर की सबसे बड़ी कामयाबियां मानी जाती हैं। इन तीनों की सफलता की कहानी बेमिसाल है। इन तीनों की गिनती दुनिया के सबसे अमीर , ताकतवर और प्रभावशाली लोगों में होती हैं। इतना ही नहीं लोगों को प्रेरित करने के मकसद से इन तीनों के संघर्ष की दास्ताँ सुनायी-समझायी जाती हैं। वैसे तो इन तीनों में कई समानताएं हैं लेकिन, एक बड़ी और लोगों में चर्चित समानता ये है कि ये तीनों "कॉलेज ड्रॉप आउट" हैं। यानी इन तीनों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी और अपने-अपने सपनों को साकार करने में पूरी ताकत के साथ जुट गए।

बिल गेट्स ने हारवर्ड को बीच में छोड़ा और आगे चलकर "माइक्रोसॉफ्ट" की शुरुआत की। स्टीव जॉब्स ने रीड कॉलेज को बीच में अलविदा कह दिया और "ऍपल" की स्थापना की। मार्क ज़ुकेरबर्ग ने भी कालेज की पढ़ाई बीच में ही रोकी और आगे चलकर दुनिया को "फेसबुक" दिया। "माइक्रोसॉफ्ट" , "ऍपल" और "फेसबुक" … ये वो नाम हैं जो दुनिया के हर कोने में हर दिन बोले-सुने और इस्तेमाल किये जाते हैं।

भले ही बिल गेट्स , स्टीव जॉब्स और मार्क ज़ुकेरबर्ग "कॉलेज ड्रॉप आउट" होने के बाद भी बेहद कामयाब हुए और महान बने , लेकिन भारत में "कॉलेज ड्रॉप आउट" को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता। माता-पिता ही नहीं बल्कि रिश्तेदार, दोस्त और दूसरे भी ये मानने लगते हैं कि "कॉलेज ड्रॉप आउट" होने का मतलब तरक्की और कामयाबी की राह से हट जाना है। कई लोगों की नज़र में स्कूल या फिर कॉलेज की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ने का मतलब हार है।

लेकिन , अब भारत में भी बदलाव आ रहा है। "कॉलेज ड्रॉप आउट" कामयाबी की नयी-नयी कहानियाँ लिख रहे हैं। स्कूल-कॉलेज को बीच में ही छोड़कर कई युवा अपने सपने साकार करने में जुट गए हैं। खेल-कूद, विज्ञान-प्रोद्योगिकी, उद्योग, कारोबार, अनुसंधान, आविष्कार और खोज जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व विजय हासिल हर रहे हैं। "कॉलेज ड्रॉप आउट" भी अपने नए-नए प्रयोगों, आविष्कारों, कामयाबियों से नयी मिसाल बन रहे हैं। इन्हीं कामयाब "कॉलेज ड्रॉप आउट" में एक हैं मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के शशांक चौरे। शशांक चौरे ने भी कामयाबी की अपनी अनोखी कहानी लिखी है। एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे शशांक ने अपनी प्रतिभा के बल पर सपने देखे और सपनों को साकार करने लिए जोखिम उठाया। राह मुश्किल थी, लेकिन हौसले बुलंद थे। शशांक कामयाब होते गए और दुनिया-भर में अपनी अलग पहचान बना ली। शशांक चौरे की गिनती अब दुनिया के सबसे कामयाब, काबिल और मशहूर हैकरों में होती है। कुछ लोग उन्हें "करोड़पति हैकर" के नाम से बुलाते हैं।

एक सामान्य बालक से मशहूर कम्प्यूटर एक्सपर्ट और हैकर बनने की शशांक की कहानी दिलचस्प भी है।

१३ साल की उम्र में शशांक का परिचय कम्प्यूटर से हुआ। परिचय भी ऐसा हुआ कि रिश्ता ज़िंदगी-भर का हो गया। पहले परिचय से ही शशांक ने

कम्प्यूटर में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था। दिलचस्पी दिन-बी-दिन बढ़ती ही गयी। कुछ ही दिनों में शशांक के लिए कम्प्यूटर ही सब कुछ हो गया।

कम्प्यूटर शशांक का सबसे प्यारा साथी बन गया। बचपन से ही शशांक ने घंटों कम्प्यूटर पर बिताना शुरू कर दिया था। शशांक घंटों कंप्यूटर पर गेम्स खेलते। हालत ऐसे बने कि कम्प्यूटर ने नज़र ही नहीं हटती थी।

कम्प्यूटर में शशांक की दिलचस्पी को देखकर उनके माता-पिता भी हैरान थे। कम्प्यूटर पर काम करते-करते शशांक बहुत कुछ सीखने लगे। पहले कम्प्यूटर से दोस्ती की। फिर उसको अच्छी तरह समझा-परखा। आगे चलकर कम्प्यूटर की बारीकियां जानी। और फिर इसी क्रम में शशांक को कोडिंग का चस्का लग गया। शशांक ने हैकिंग के बारे में सीखना-समझना शुरू किया। और धीरे-धीरे शशांक के लिए हैकिंग सबसे प्रिय विषय और काम बन गया। कुछ ही महीनों में शशांक के लिए हैकिंग नया शौक था । अपने इसी नए शौक की वजह से उन्होंने क्रैकपाल डॉट कॉम नाम की एक वेबसाइट के लिए काम करना शुरू किया। यहाँ से उन्हें एक ईमेल अकाउंट को हैक करने के लिए 50 डॉलर मिलते।

इसी दौरान शशांक ने कम्प्यूटरों के वायरस के बारे में जानना-समझना शुरू किया। दिन-रात की मेहनत से शशांक ने वाइरस को ढूंढ़ने, पहचाने और उसे दूर करने में दक्षता हासिल कर की। शशांक के एल्गोरिदम बंनाने भी शुरू किये। एक के बाद एक एल्गोरिदम लिखे।

शशांक की प्रतिभा के बारे में जानकारी हासिल करने के बाद इंदौर शहर की पुलिस ने भी उसकी सेवाएं ली। शशांक ने करीब दो साल तक इंदौर पुलिस के लिए बतौर साइबर सिक्योरिटी कंसल्टेंट काम किया। हालांकि मेहनत ज्यादा थी और आय काम , फिर भी उन्होंने पूरी निष्ठा से काम किया।

इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला लेने के बाद भी शशांक ने एथिकल हैकिंग का काम जारी रखा।

इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई-लिखाई के दौरान शशांक में कई बदलाव आये। धीरे-धीरे पढ़ाई-लिखाई से उनकी दिलचस्पी ख़त्म होने लगी। पाठ्यक्रम बेकार और उबाऊ लगने लगे। उन्होंने ठान लिया कि कम्प्यूटर एक्सपर्ट के रूप में लोगों को अपनी सेवाएं देंगे और दुनिया-भर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाएंगे।

सेकंड ईयर में उन्होंने इंजीनियरिंग कालेज छोड़ दिया। अपने फैसले के मुताबिक कम्प्यूटर एक्सपर्ट के रूप में अपनी पहचान बंनाने के लिए मौकों की तलाश शुरू की। उन्होंने उस समय इंदौर शहर की सबसे जानी-मानी कंपनी के कर्ता-धर्ताओं को प्रभावित करने की सोची। शशांक ने इंदौर की सबसे नामचीन सॉफ्टवेयर कंपनी में वेब सिक्योरिटी कंसल्टेंट के रूप के जगह पाने में कामयाबी हासिल की। यहाँ शशांक ने कंपनी के क्लाइंट्स की वेबसाइट को हैक किया। इन वेबसाइट्स की सुरक्षा संबंधी खामियों के बारे में अपनी कंपनी को बताया और बिजनेस को बढ़ाने के लिए नए-नए सुझाव दिए।

करीब डेढ़ साल तक शशांक ने इस कंपनी में काम किया। इस दौरान प्रतिभा और सफलता की वजह से उन्हें नौकरी में तीन बार तरक्की भी मिली।

लेकिन, एक अन्य कंपनी ने बड़ी तनख्वा देने की पेशकश की तो शशांक ने ये नौकरी छोड़ दी। नयी जगह ४५ दिन काम करने के बाद फिर अचानक शशांक ने फैसला किया कि वो किसी दूसरे के यहाँ तनख्वा पर नौकरी नहीं करेंगे। बल्कि अपनी खुद की कंपनी शुरू करेंगे। इस कंपनी ने शशांक से किये वायदे भी पूरे नहीं किये थे।

२३ फरवरी २००९ को शशांक ने नौकरी छोड़ दी। जब वो इस्तीफ़ा देकर दफ्तर से बाहर निकले तब उनके पास कोई डिग्री नहीं थी और न ही थी एक बड़ी रकम जिससे अपनी कंपनी खोल सकें । जेब में सिर्फ ५००० रुपये थे।

शशांक ने घर लौटकर इंटरनेट का सहारा लिया। ऑनलाइन काम ढूंढा। काम मिला भी और कमाई भी शुरू हुई। कमाई बढ़ती गयी और इतने रुपये जमा हो गए जिससे कंपनी की शुरुआत की जा सके।

अक्टूबर, २००९ में शशांक ने एक छोटी टीम के साथ "इंडिया इंफोटेक" नाम से एक कंपनी खोली।

कंपनी ने काम भी शुरू किया। जैसे-जैसे काम आगे बढ़ता गया शशांक को एहसास हुआ कि कंपनी को बड़े पैमाने पर विस्तार करने के लिए उत्पादन के क्षेत्र में उतरना जरूरी है। कम पूंजी के साथ उत्पादन के क्षेत्र में उतरना मुश्किल था, लेकिन शशांक ने सेवा को ही उत्पाद की तरह बेचने की तरकीब अपनाई। शशांक की कंपनी जल्द ही एक स्पेशलाइज्ड ई-कॉमर्स वेबसाइट डेवलपमेंट कंपनी में तब्दील हो गयी।

शशांक ने अपनी कंपनी के ज़रिये सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन सर्विस यानी एसईओ सर्विसेज उपलब्ध कराना शुरू किया। इस सर्विस की वजह से शशांक को दुनिया-भर से क्लाइंट मिलने लगे। लोग शशांक और उनकी कंपनी से बहुत प्रभावित हुए। अक्टूबर, २००९ में शुरू हुई कंपनी के लिए फरवरी, २०१४ में १०,००० प्रोजेक्ट्स हाथ में थे । कंपनी सालाना ५ करोड़ रुपये कमाने लगी।

शशांक ने अपनी कंपनी के ज़रिये पांच साल में ५ हजार से ५ करोड़ रुपए का सफर तय किया था । एक कॉलेज ड्रॉपआउट का ये सफर कामयाबी की मिसाल बन गया।

कंपनी खूब चल रही है। दुनिया-भर से काम मिल रहा है। कारोबार भी खूब हो रहा है। लोगों की नज़र में शशांक "रोल मॉडल" भी बन गए हैं। वो कईयों के लिए प्रेरणा के स्रोत भी हैं। इन सब से बावजूद शशांक ने अपना मनपसन्दीदा काम करना नहीं छोड़ा है। वो अब भी हैकिंग और कंप्यूटर सेक्युरिटी पर काम करते ही रहते हैं।

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