सिर्फ स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि भारतीय खेती को भी बदलकर रख देंगे सुपरफूड्स

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सुपरफूड्स के कृषि और स्वास्थ्य लाभों को पहचानते हुए भारत सरकार ज्वार, मोती बाजरा, रागी, छोटा बाजरा, कुट्टी, जौं, साहा, काग्गी और चीना जैसे न्यूट्री-अनाजों की खेती को बढ़ावा दे रही है।

सुपरफूड्स बेहतर स्वास्थ्य का वायदा तो करते ही हैं साथ ही वे कई बीमारियों के जोखिम को भी कम करने में काफी मददगार साबित होते हैं। वे प्रोटीन, वसा, विटामिन सहित कई अन्य पोषक तत्वों का एक प्रमुख स्त्रोत भी होते हैं।

आज की तारीख में हम जिन सब्जियों, फलों और अनाज का सेवन कर रहे हैं वे अधिक पैदावार और उसके चलते होने वाले आर्थिक लाभ के चलते अधिकांशतः रसायनों और उर्वरकों से बुरी तरह संक्रमित हैं. कई रिपोर्टों से या बात सामने आई है कि ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से कैंसर होने का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है.

भारत में भी खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है और हम भी अब धीरे-धीरे ही सही लेकिन रसायन मुक्त और जैविक (आॅर्गेनिक) खाने की मांग में वृद्धि होते देख रहे हैं. जैविक खाद्य उत्पादों का अनुमानित बाजार करीब 1,500 करोड़ रुपये का है और अगले तीन सालों में इसके दोगुना होकर 3,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार करने की उम्मीद है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबलूएचओ) की 2018 कर एक रपट से पता चलता है कि 2020 तक होने वाली सभी मौतों में से 75 प्रतिशत के पीछे गैर-संक्रमणीय पुरानी बीमारियां प्रमुख कारण होगा. हालांकि अपनी जीवनशैली में बदलाव लाकर इनमें से अधिकतर को रोका जा सकता है. साथ ही स्वस्थ आहार और संतुलित जीवन शैली पर ध्यान केंद्रित करते हुए मूल कारण पर नजर डालने की भी आवश्यकता है.

भारत के प्रमुख राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास संगठन, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के निदेशक प्रोफेसर राम राजशेखरन कहते हैं, ‘‘हम अपने भोजन में हर चीज को उबालकर प्रयोग करते हैं. भारत में बड़े स्तर पर पोषण संक्रमण है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिली है. कुपोषण, ग्रामीण और शहरी, दोनों ही क्षेत्रों में एक सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है. सुपरफूड (अपने उच्च पोषण मूल्य के लिये मशहूर) दोनों ही स्थितियों को हल करने वाले समाधानों में से एक है.’’

सुपरफूड के कृषि और स्वास्थ्य लाभों को पहचानते हुए भारत सरकार ज्वार, मोती बाजरा, रागी, छोटा बाजरा, कुट्टी, जौं, साहा, काग्गी और चीना जैसे न्यूट्री-अनाजों की खेती को बढ़ावा दे रही है.

कृषि सहयोग और किसान कल्याण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव अशोक दलवाई कहते हैं, ‘‘सरकार ने मोटे अनाज को बढ़ावा देने और उनके क्षेत्र और उत्पादन में वृद्धि को हासिल करने के लिये एक रोडमैप तैयार किया है. वह इसके 17 टन के मौजूदा उत्पादन को वर्ष 2022-23 तक 46 मिलियन टन तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं. कृषि मंत्रालय ने इस साल 300 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ ‘‘एनएफएसएम - न्यूट्री-अनाज’’ नामक एक मिनी मिशन भी लॉन्च किया है.’’

स्वस्थ विकल्प

तेल और वसा के साथ अच्छा प्रोटीन और जटिल कार्बोहाइड्रेट अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सूक्ष्म पोषक तत्व की उतने ही अधिक महत्वपूर्ण हैं. एक तरफ जहां ओमेगा फैट अच्छे स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण हैं वहीं दूसरी तरफ ठीक अनुपात में कुछ अन्य प्रकार के ओमेगा फैट अच्छे स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती को बढ़ावा देने में कारगर साबित होते हैं. वेजिटेबल आॅयल यानि वनस्पति तेल ओमेगा 6 फैट से समृद्ध होते हैं.

प्रोफेसर राजशेखरन आगे कहते हैं, ‘‘हम पौधों पर आधारित स्त्रोत के जरिये भी ओमेगा-3 फैटी एसडि से समृद्ध खाद्य पदार्थ उत्पन्न कर सकते हैं. कई लोग पहुच न होने या फिर उनके काफी महंगे होने के चलते ओमेगा-3 फैट से परिपूर्ण मछली यानि समुद्री भोजन को वहन नहीं कर सकते. शाकाहारियों के लिये चिया सीड्स यानि तुलसी के बीज इन चिंताओं का समाधान साबित हो सकते हैं. इन्हें खान बेहद आसान होता है - आपको करना यह है कि बस एक गिलास पानी में एक चम्मच चिया के बीज मिलाएं - इससे यह जेल जैसा बन जाता है और कोई भी इसे बड़ी आसानी से खा सकता है.’’

सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएफटीआरआई) की पूर्व वैज्ञानिक और स्कूली बच्चों को स्वस्थ भोजन प्रदान करवाने वाली स्आर्टअप एसकूलमील की संस्थापक दीपा प्रकाश कहती हैं, ‘‘ऐसे में चिया के बीजों जैसे सुपरफूड महत्वपूर्ण साबित होते हैं. ये ऐसी एकल फसलें हैं जो विभिन्न पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिये बेहद महत्वपूर्ण होते हैं.’’

इसके अलावा मोटा अनाज के स्वास्थ्य लाभ की एक पूरी श्रृंखला भी है. ये पोषक तत्वों से युक्त होन के अलावा उच्च फाइबर सामग्री से युक्त होते हैं और इनका उच्च ग्लाईसेमिक सूचकांक इन्हें मोटापे और मधुमेह से लड़ने के लिये आदर्श बनाता है. इसके अलावा ये ग्लुटेन मुक्त भी होते हैं. इसके अलावा रागी, कैल्शियम से भरपूर होता है जबकि ज्वार में पोटैशियम और फाॅस्फोरस होता है जबकि कंगनी रेशेदार होता है और बाजरा लौह तत्वों से भरपूर होता है.

इन फसलों से स्वास्थ्य लाभों और इनतक होने वाली आसान पहुंच के चलते प्रोफेसर राजशेखरन को भरोसा है कि यह सुपरफूड आज के समय में प्रचलित महंगे हेल्थकेयर उत्पादों के बेहतरीन विकल्प हैं.

वे आगे कहते हैं, ‘‘भविष्य का समाधान सिर्फ भोजन के माध्यम से है - स्वस्थ भोजन लेना शुरू करें. हमारी कोशिश यह सुनिश्चित करना है कि देश इलाज के बजाय रोकथाम को प्राथमिकता बना ले. या तो हम एक देश के रूप में सुपरक्राॅप्स को अपने दैनिक भोजन में शामिल कर लें या फिर एक हेल्थकेयर पाॅलिसी को अपनाएं, जो काफी महंगी है.’’

मुनाफेवाली फसल

सुपरफूड उन अनिश्चितताओं को कम करता है जो वर्तमान में कृषि क्षेत्र पर पूरी तरह से हावी हैं. बाजरा और चिया के बीजों जैसी फसलों को संसाधन-हीन और कृषि-जलवायु वाले क्षेत्रों में, और पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों में और बरसात भरी स्थितियों में आसानी से उगाया जा सकता है. बेहद कठोर फसल होने के चलते ये जलवायु परिवर्तन की प्रतिकूल परिस्थितियों के लिये भी बिल्कुल उपयुक्त हैं. इसी के चलते ये सूखे को झेलने वाली, फोटो-असंवेदनशील और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीली होती हैं तिसके चलते इन्हें कम बरसात वाले (200-600 मिमि) शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है जहां गेहूं और चावल जैसे अनाज को उगाना बेहद नुकसानदायक होता है.

इसके अलावा चिया की जल प्रतिरक्षात्मक प्रकृति इसे कृषि समुदाय के लिए एक बेहद अनुकूल विकल्प बनाती है.

कर्नाटक स्थित राईता मित्रा फार्मर प्रोड्यमसर कंपनी से जुड़े किसान देवराज बताते हैं, ‘‘कर्नाटक जैसे सूखा प्रभावित राज्य मेंखेती की लागत बहुत अधिक आती है. इसके अलावा यहां के मौसम का कोई भरोसा नहीं. ऐसे में, हमने इस चक्र को तोड़ने के लिये चिया के बीजों की तरफ रुख किया. किसानों की सबसे बड़ी मदद यह हुई कि सरकार और किसान उत्पादन कंपनी ने इसके बीज निशुल्क उपलब्ध करवाए.’’

सुपरफूड की खेती भारत के लिये कोई नई बात नहीं है. यह हमारी प्राचीन फसलें हैं जिनकी खेती का इतिहास 500 वर्षों से भी अधिक पुराना है. 1960 के दशक के मध्य की हरित क्रांति से भी काफी पहले यह गेहूं और चावल की तुलना में कहीं अधिक क्षेत्र में उगाई वाली फसलें थीं.

अशोक दलवाई बताते हैं, ‘‘बीते पांच दशकों के दौरान, उच्च पैदावार वाली किस्मों के बढ़ते चलन के चलते और एमएसपी के रूप में मूल्य समर्थन के साथ आश्वासन खरीद के चलते गेहूं और चावल के साथ-साथ मोटे अनाज की फसल उगाना भी फायदे का सौदा रहा है.’’

हाल के दिनों में देश के सिंचित क्षेत्रों में धान की खेती में काफी कमी आई है, नतीजतन इसका उत्पादन भी काफी घटा है. सिंचाई, आधारभूत संरचना और और सिंचाई के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में निवेश निरंतर बढ़ रहा है जिससे गेहूं और धान की खेती कम हो रही है.

अशोक दलवाई कहते हैं, ‘‘फिलहाल बाजरे का एमएसपी काफी बढ़ा दिया गया है जिससे किसान को उत्पादन की लागत का कम से कम 50 प्रतिशत लाभ के रूप में प्राप्त हो सके. इसके अलावा एक मजबूत खरीद प्रणाली भी जल्द ही स्थापित की जाएगी जिससे किसान बाजरे की खेती को प्रोत्साहित होंगे. इसके अलावा सरकार ने बाजरे की खेती को प्रोत्साहन देने के इरादे से वर्ष 2018 को न्यूट्री-सीरियल्स वर्ष भी घोषित किया है.’’

इसके अलावा प्रोफेसर राजशेखरन मानव उपभोग के लिये ओमेगा-3 फैटी एसिड के एक स्त्रोत के रूप में पोर्टुलाका ओलेरेशिया की जन-खेती की दिशा में भी काम कर रहे हैं. फिलहाल यह फसल केवल हिमाचल प्रदेश में ही पाई जाती है वे इसे मैसुरू और उसके जैसे कुछ अन्य क्षेत्रों में उगाने का प्रयास कर रहे हैं.

‘‘अगर हम इस फसल को सभी मौसमी पैर्टन्स के में अनुकूलित करने में सफल रहे तो, हम एक ओमेगा-3 क्रांति का रास्ता तैयार कर सकते हैं, जिसके चलते आम जनता को सस्ती कीमतों पर वसा का एक अच्छा और बेहतर स्त्रोत प्राप्त हो सकेगा.’’

जड़ों की ओर वापस

सुपरफूड के लाभों के साथ पूर्ण रूप में जैविक होने के मूल्य को समझते हुए, हाल ही में सिक्किम गैर-जैविक सब्जियों की बिक्री को पूर्णतः प्रतिबंधित करने वाला भारत का पहला राज्य बना है.

सिमफेड सिक्किम और सिक्किम गवर्नमेंट फूड प्रिजर्वेशन फैक्ट्री के प्रबंध निदेशक पवन अवस्थी कहते हैं, ‘‘इसके पीछे हमारा विचार लोगों को स्वस्थ बनाना औश्र ऐसा करते हुए किसानों को वापस खेतों की ओर जाने को प्रेरित करना है ताकि वे एक बार फिर अपनी प्राचीन फसलो का रुख करें. हमारे पास सीएफटीआई का तकनीकी सहयोग भी है, और हमने चिया बीज के कुछ नमूनों को लेकर सिक्किम में कदम बढ़ाने की कोशिश की. इसके अलावा हमनें एक प्रसंस्करण और विपान इकाई की भी स्थापना की है.’’

दीप आगे कहती हैं, ‘‘अगर लोग बड़े पैमाने पर इन सुपरफूड्स की खेती की तरफ आकर्षित हों तो निश्चित ही इनके दामों में भी भारी कमी आएगी. हम चिया के बीजों के साथ पहले ही ऐसा होते देख चुके हैं. भारतीय किसान राइता मित्र, इसके किसान सहयोगियों और सीएसअईआर की सहायता से इसके कृषि मूल्य को तीन गुना से भी अधिक कम चुके हैं.’’

सुपरफूड की खेती की वकालत करते और किसानों को उत्पादन के लिये सहायता प्रदान करने वाले दिल्ली स्थित साईयम फूड्स और एककूलमील जैसे स्आर्टअप, सिक्किम राज्य सरकार का उपक्रम सिक्किम सुप्रीम के चलते सुपरफूड्स की कीमत में काफी कमी आई है. इसके अलावा बेंगलृरु स्थित खुदरा श्रंखला एमटीआर भी अब चिया आधारित शीतल पेय तैयार करने और बेचने की तैयारी कर रही है.

वर्तमान में भारत सरकार अन्य राज्यों, विशेषकर उत्तर पूर्वी राज्यों से जैविक खेती को अपनाने की अपील कर रही है. सरकार ने उत्तर पूर्वी राज्यों के लिये दो योजनाएं - ‘परंपरागत कृषि विकास योजना’ (पीकेवीवाई) और ‘मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट’ (एमओवीसीडी) शुरू की हैं. इन योजनाओं में क्लस्टर-आधारित खेती, उत्पादों का प्रमाणीकरण और मूल्य श्रृंखला विकास को बढ़ावा देना शामिल है, ताकि जैविक उत्पादक अपने उत्पाद पर प्रीमियम मूल्य प्राप्त कर सकें.

अंत में अशोक दलवई कहते हैं, ‘‘सरकार का इरादा आने वाले कुछ वर्षों में दूश की कुल खेती के 10 प्रतिशत क्षेत्र को जैविक खेती के अंतर्गत लाना है.’’

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