नेहरू होने के मायने

भारतवर्ष के लिये पं. जवाहर लाल नेहरू के मायने हैं राष्ट्रवाद, लोकतंत्रवाद एवं धर्म निरपेक्षतावाद के वैचारिक मूल्यों के साथ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शांति एवं सहयोगी की प्रतिबद्धता परिपूर्णता प्रदान करना।

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पंडित नेहरू की विरासत के बिना आधुनिक भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज आधुनिक, प्रगतिशील, औद्योगिक और वैज्ञानिक तरक्की वाले मुल्क के रूप में दुनिया में पहचाना जा रहा है, तो इसके पीछे प्रथम प्रधानमंत्री की दूरंदेशी ही थी। नेहरू ने 1947 में आजादी के बाद अगले 17 साल तक देश को संवारा और उसे आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

आधुनिक भारत के शिल्पकार, धर्मनिरपेक्षता के परस्तार, तरक्कीपसंद जम्हूरियत के पैरोकार पंडित जवाहरलाल नेहरू को दुनिया-ए-फानी को अलविदा कहे हुये पांच दहाइयां गुजर चुकी हैं, लेकिन नजरिये की तासीर देखिये कि आधुनिक भारत को बनाने वाले इस दूरदर्शी नेता की विरासत आज भी देश को आगे बढऩे की प्रेरणा दे रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हॉल में दिए अपने भाषण में कहा है, कि देश में आजादी के बाद अब तक जितनी भी सरकारें आई हैं उन्होंने देश को आगे बढ़ाया है। हम उनका सम्मान करते हैं, लेकिन भारतवर्ष के लिये पं. जवाहर लाल नेहरू के मायने हैं राष्ट्रवाद, लोकतंत्रवाद एवं धर्म निरपेक्षतावाद के वैचारिक मूल्यों के साथ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शांति एवं सहयोगी की प्रतिबद्धता परिपूर्णता प्रदान करना। पिछली सदी के अंतिम दो दशक दुनिया में लोकतंत्रों एवं प्रगतिशील शासन व्यवस्थाओं के चरमराने एवं टूटने के शोर के दशक थे। परिस्थितिजन्य सामंजस्य और हर चुनौती से उबरकर पल्लवित होने की लोकतंत्र के पीछे है उसकी नींव और उस नींव से भी कहीं अधिक हैं पं. नेहरू। इन्होंने भारतीय लोकतंत्र को लोककल्याण के लक्ष्य का माध्यम होने का अमिट संस्कार दिया। बेशक, पंडित नेहरू की विरासत के बिना आधुनिक भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज आधुनिक, प्रगतिशील, औद्योगिक और वैज्ञानिक तरक्की वाले मुल्क के रूप में दुनिया में पहचाना जा रहा है, तो इसके पीछे प्रथम प्रधानमंत्री की दूरंदेशी ही थी। नेहरू ने 1947 में आजादी के बाद अगले 17 साल तक देश को संवारा और उसे आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

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कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अभी हाल ही में कहा है, कि नेहरू जी की विरासत सारे देश की संपत्ति है। कुछ लोग नेहरू जी की इस विरासत और उनके सपनों को मिटाने की कोशिश में लगे हैं। सवाल ये है कि आखिर नेहरू की वो विरासत है क्या, जिसे आज खतरे में बताया जा रहा है?

इसमें शक नहीं है कि नेहरू की विरासत सिर्फ वो नीतियां ही नहीं हैं, जिसे आजादी के बाद अगले 17 साल में नेहरू सरकार ने लागू किया, बल्कि नेहरू की विरासत वो विचार हैं, जिसकी आत्मा संविधान में बसती है। वो अभियान है, जिसे पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 की आधी रात को शुरू किया था। 15 अगस्त 1947 की आधी रात को देश ने पंडित नेहरू के नेतृत्व में आधुनिक राष्ट्र बनने का सपना देखा था। इस सपने को साकार करना आसान नहीं था, क्योंकि ये वो दौर था जब देश बंटवारे के दर्द से गुजर रहा था। सांप्रदायिकता और अलगाववादी सोच चरम पर थी। ऐसे वक्त में नेहरू उन विचारों को लेकर मजबूती से खड़े हुए, जिस पर वो पूरी शिद्दत के साथ विश्वास करते थे। जिसे वो आजादी की लड़ाई के वक्त से ही संवार रहे थे। आजादी के बाद जब देश का नेतृत्व नेहरू के हाथ में आया, तब उन्होंने नए भारत के निर्माण में सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे परंपरावादियों, सी राज गोपालाचारी और अंबेडकर जैसे विरोधियों को भी जगह दी। मौलाना आजाद जैसे वामपंथी सोच वाले कांग्रेसी को भी साथ ले कर चले। अगले 17 साल नेहरू ने ऐसे राष्ट्र के निर्माण की कोशिश की जिसमें मजहब, जाति, रंग या लिंग के आधार पर भेदभाव न होता हो। ये विचार ही नेहरू की विरासत है जिसने आजादी के बाद देश पर शासन करने वाली हर सरकार का मार्गदर्शन किया है।

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आजादी के समय भारत में करीब 600 से अधिक रियासतों के विलय के लिए कुछ नियम बनाए गए थे। करीब दर्जन भर रियासतों को छोड़कर सभी का विलय तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की मंशा के अनुसार भारत में हो गया था। कश्मीर रियासत का मामला नेहरू ने अपने पास रख लिया, जबकि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। कश्मीर के मामले में प्रधानमंत्री के तौर पर नेहरू के तीन फैसलों ने कश्मीर का मामला और ज्यादा उलझा दिया।

नेहरू के तीन गलत फैसले

-कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना।
-1948 में भारत-पाक की जंग के बीच अचानक सीजफायर का एलान कर देना।
-आर्टिकल 370 के तहत कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देना।

दरअसल नेहरू खुद कश्मीरी थे और इसी वजह से कश्मीर मामले में वह दखल देते थे। उन्होंने इसमें अपनी मदद के लिए एन गोपालस्वामी अय्यंगार को बिना पोर्टफोलियो का मंत्री बना दिया। अय्यंगार कश्मीर के मामलों में सीधे नेहरू से निर्देश लेते थे। सरदार पटेल को इस बात का अंदाजा नहीं था। एक बार सरदार पटेल ने अय्यंगार के किसी फैसले पर सवाल उठाया, तो उसके जवाब में उन्हें नेहरू का पत्र मिला। पत्र का असर ये हुआ, कि पटेल ने खुद को कश्मीर मामले से अलग कर लिया।

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माउंटबेटन की सलाह पर 31 दिसंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के खिलाफ शिकायत भेजी। इसके बाद कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया। यह नेहरू की सबसे बड़ी भूल थी। क्या इसी भूल की वजह से आज तक कश्मीर समस्या का कोई हल नहीं निकल पाया है?

सुरक्षा परिषद में अमेरिका और ब्रिटेन अपने राजनीतिक हितों को साधने में लग गए। उन्होंने कश्मीर पर भारत की शिकायत को दरकिनार करते हुए दोनों देशों को एक ही तराजू पर तौला। नतीजा यह हुआ, कि नेहरू को भी अपने फैसले पर अफसोस होने लगा। यही वजह थी कि कई सालों के बाद जब नेहरू से कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बारे में सवाल किया गया, तो वह इससे इंकार करने लगे। 1948 में संयुक्त राष्ट्र ने भारत और पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी सेना वापस बुला कर सीजफायर लागू करने का प्रस्ताव पास किया। नेहरू ने इसे मानते हुए 1 जनवरी, 1949 को सीजफायर लागू कर दिया। लेकिन पाकिस्तान ने अपनी सेना वापस नहीं बुलाई। फैसले का विरोध हुआ, क्योंकि जब सीजफायर हुआ, उस वक्त तक भारतीय सेना ने पश्चिम में पुंछ, उत्तर में कारगिल और द्रास से कबायलियों को खदेड़ दिया था। इसके आगे का हिस्सा अब भी पाकिस्तान के कब्जे में था। इसके फलस्वरूप आज तक एक-तिहाई कश्मीर पाकिस्तानी के अधिकार में है।

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यहां ये जानना भी दिलचस्प और आवश्यक है कि पं.नेहरू ने ही शेख अब्दुल्ला से कहा था कि कश्मीर के स्वायत्तता संबंधी प्रस्ताव को संविधान में शामिल करने के लिए वो खुद कानून मंत्री डॉ. भीमराव अंबेडकर से बात करें। बलराज मधोक ने अपनी किताब कश्मीर- जीत की हार में दावा किया है कि अंबेडकर ने खुद उन्हें यह बताया कि शेख ने उनके सामने यह प्रस्ताव रखा था। इसके जवाब में अंबेडकर ने कहा, 'आप चाहते हैं कि भारत कश्मीर की रक्षा करे। इसकी सारी जरूरतें पूरी करे, लेकिन उसका कश्मीर पर कोई अधिकार न हो। मैं भारत का कानून मंत्री हूं, आपके प्रस्ताव को मानना देश के साथ विश्वासघात होगा। मैं इसके लिए तैयार नहीं हो सकता।'

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लेखक / पत्रकार

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